अहं ब्रह्मास्मि : रामायण और मानव शरीर क्रिया विज्ञान

“अहं ब्रह्मास्मि”, अर्थात मैं ब्रह्म हूँ – “अहं ब्रह्मास्मि” शायद यह पढ़ने के बाद आप मुझे सनकी समझने की गलती कर सकते हैं। मगर क्या पता मेरे इस लेख को पढ़ने के उपरांत, संभवतः आपके विचारों में सकारात्मक ऊर्जा का संचार देखने को मिले। क्योंकि इस ओर गंभीरता से विचार करने पर हमें बोध होगा कि
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अहं ब्रह्मास्मि : रामायण और मानव शरीर क्रिया विज्ञान

“अहं ब्रह्मास्मि”, अर्थात मैं ब्रह्म हूँ – “अहं ब्रह्मास्मि”

शायद यह पढ़ने के बाद आप मुझे सनकी समझने की गलती कर सकते हैं। मगर क्या पता मेरे इस लेख को पढ़ने के उपरांत, संभवतः आपके विचारों में सकारात्मक ऊर्जा का संचार देखने को मिले। क्योंकि इस ओर गंभीरता से विचार करने पर हमें बोध होगा कि असल में “अहं ब्रह्मास्मि” कह कर हम अपने अस्तित्व के थोड़ा और समीप पहुंचते हैं।

उपनिषदों में कुल चार महावाक्य हैं। हर महावाक्य आध्यात्मिक शास्त्रों का सार है। उन्हीं में एक महावाक्य है- “अहं ब्रह्मास्मि”

वेद भी यही कहता है कि सम्पूर्ण ज्ञान हमारे भीतर ही है। परम सत्य ब्रह्म ने इस सृष्टि की रचना भी की है और वो स्वयं इसमें विराजते हैं। हम उन्हीं के अंश हैं। श्री कृष्ण ने भी कहा है,”सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो” अर्थात “मैं सभी प्राणीयों के दिल में बसता हूँ।” यानी हमारे यथार्थ की खोज हमसे शुरू हो कर हम पर ही खत्म हो जाती है।

वेद, दुनिया के प्रथम धर्मग्रंथ कहे जाते हैं। संस्कृत में वेद का अर्थ है ‘ज्ञान’। वैदिक साहित्य को जीवन और रचना का पूर्ण ज्ञान माना जाता है। यह ‘ज्ञान’ सागर भी हमारी आंतरिक चेतना में कहीं विद्यमान है। रामायण उसी सर्वव्यापी ज्ञान (वेद) का एक हिस्सा है।

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डॉ टोनी नादेर (Dr Tony Nader) जो पेशे से न्यूरो-वैज्ञानिक (Neuro-scientist) हैं, उनका कहना है कि रामायण किसी एक धर्म या जाति से संबंधित नहीं बल्कि यह तो प्राकृतिक कहानी है जो हर व्यक्ति और ब्रह्मांड में परत दर परत खुलती जाती है।

डॉ टोनी नादेर ने अपनी किताब “Ramayan in Human Physiology” में मानव शरीर और रामायण के पात्रों के बीच जो सामंजस्य बिठाया है, उसे जानने के बाद आप भी हैरत में पड़ जाएंगे। प्रकृति के प्रति आपका आदर और बढ़ जाएगा। उदाहरण के तौर पर उन्होंने वानर मंडली को हमारे शरीर में मौजूद हॉर्मोन्स (Hormones) की तुलना दी है। देवी सीता को उन्होंने मानव शरीर क्रिया विज्ञान (Human physiology) के तहत हृदय की उपमा से नवाज़ा है। वानर सेना के राजा सुग्रीव और बालि को उन्होंने पीयूष ग्रंथि (pituitary gland) में अंकित किया है।

लोग इसे चमत्कार भी कह सकते हैं। कुछ लोग विज्ञान। अब यह चमत्कार है या विज्ञान, यह तो उनके अध्ययन को थोड़ा समझने के बाद ही तय हो सकता है। जिसके उपरान्त हम स्वयं को “अहं ब्रह्मास्मि” के अर्थ के थोड़ा और समीप पाएंगे।

सुग्रीव और बालि

कहते हैं कि ब्रह्म पुत्र ऋक्षराज के सिर से बालि (संस्कृत में वाली) का जन्म हुआ था; बालि को हिंदी शब्द ‘बाल’ से जोड़ कर देखा जा सकता है और उनकी गर्दन से सुग्रीव पैदा हुए थे; सु का अर्थ है अच्छा, और ग्रीव या ग्रीवा का अर्थ है गर्दन।

डॉ टोनी नादेर ने रामायण के उन पात्रों को पीयूष ग्रंथि (pituitary gland) में अंकित किया है। पीयूष ग्रंथि शरीर में हर तरह के हॉर्मोन्स को नियंत्रित करती है। तभी इसे मास्टर ग्लैंड (Master Gland) कहा जाता है।

अहं ब्रह्मास्मि : रामायण और मानव शरीर क्रिया विज्ञान
वानर सेना रामसेतु का निर्माण कर रही है। (Wikimedia Commons)

पीयूष ग्रंथि (pituitary gland) को दो भागों में विभाजित किया जाता है; एंटीरियर पिट्यूटरी लोब (anterior lobe) और पोस्टीरियर पिट्यूटरी लोब (posterior lobe), इसमें डॉ नादेर के अनुसार एंटीरियर लोब को सुग्रीव समझ सकते हैं और पोस्टीरियर लोब को बालि।

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अपने तर्क को रखते हुए डॉ नादेर कहते हैं कि पोस्टीरियर पिट्यूटरी (posterior lobe) सिर से आता है (बालि ऋक्षराज के सिर से पैदा हुए) और एंटीरियर पिट्यूटरी (anterior lobe) गर्दन की ऊपरी भाग से आता है (सुग्रीव ऋक्षराज की गर्दन से पैदा हुए) और फिर यह दोनों लोब आपस में आकर जुड़ जाते हैं।

सीता

देवी सीता को डॉ टोनी नादेर (Dr Tony Nader) ने ह्रदय की उपमा दी है। देवी सीता, लक्ष्मी माता का मानवीय अवतार हैं। जिस तरह हमारा ह्रदय हमारे शरीर का पोषण करने में सहायक है, ठीक उसी तरह लक्ष्मी माता मानवता को पोषित करती हैं। ह्रदय के चार भागों को लक्ष्मी माता के चार हाथों का प्रतीक समझा जा सकता है।

यह कुछ सामान्य उदाहरण थे जिसके तहत हम अपने शरीर की सात्विकता का अनुमान लगा सकते हैं। प्रकृति के ब्रह्म रूप को समझने की इस कोशिश में, मैं आपके सामने कुछ और तथ्य भी रखना चाहूंगा।

अहं ब्रह्मास्मि : रामायण और मानव शरीर क्रिया विज्ञान
मानव मस्तिष्क के कुछ मुख्य भाग। (Wikimedia Commons)

हमारे मस्तिष्क की रचना को तीन भागों में बांटा गया है। मस्तिष्क का सबसे ऊपरी भाग- सेरीब्रम (Cerebrum), उसके ठीक नीचे का भाग- सेरिबैलम (Cerebellum) और फिर सबसे निचला भाग- ब्रेनस्टेम (Brainstem)।

सेरीब्रम, मस्तिष्क का सबसे बड़ा भाग है। यह ऐसे कार्यों का उत्तरदायी है जिसके बिना हम अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते जैसे हमारे देखने, सुनने और बोलने की शक्ति, किसी स्पर्श का अनुभव या हमारी भावनाएं आदि। अर्थात सेरीब्रम हमारी चेतना को नियंत्रित करता है। मस्तिष्क के इसी भाग की तुलना डॉ नादेर ने प्रभु राम से की है। जिन्हें मानवता अपना आदर्श मानती है।

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वो राम जिसका अपनी चेतना पर पूर्ण नियंत्रण है। जिनके इर्द गिर्द पूरी रामायण रची गई है। जिनकी क्रिया में संपूर्ण रामायण का आधार निहित है। जिस तरह सेरीब्रम हमारी मानव चेतना को नियंत्रित करता है उसी तरह रामायण में कई पात्र प्रभु राम के आदेशानुसार ही काम करते हैं।

डॉ टोनी नादेर (Dr Tony Nader) का मानना है कि रामायण ‘मानव चेतना (Human consciousness)’ की सर्वोच्च अवस्था है।

संभवतः इस सर्वोच्च अवस्था में मनुष्य “अहं ब्रह्मास्मि” को समझने के योग्य हो सकता है।

न्यूज़ग्राम किसी भी तरीके से डॉ टोनी नादेर की किताब के प्रचार में सम्मिलित नहीं है।