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NASA के साथ काम करने वाले शोधकर्ताओं का कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन(International Space Station) पर बढ़ने वाले बैक्टीरिया के तीन नए उपभेदों की खोज अंतरिक्ष में और शायद मंगल पर फसलों को उगाने में मददगार साबित हो सकती है। वैज्ञान सम्बन्धी जर्नल फ्रंटियर्स इन माइक्रोबायोलॉजी में सोमवार को प्रकाशित एक अध्ययन में, अमेरिका(America) और भारत(India) में NASA की जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी (जेपीएल) के साथ काम करने वाले शोधकर्ताओं ने ISS पर विभिन्न स्थानों में रहने वाले बैक्टीरिया(bacteria) के चार उपभेदों की खोज की है – और उनमें से तीन, अबतक विज्ञान के लिए अज्ञात थे।


सभी चार उपभेद मिट्टी और मीठे पानी में पाए जाने वाले बैक्टीरिया के परिवार से संबंधित हैं; वे नाइट्रोजन स्थिरीकरण और पौधे के विकास में शामिल हैं और पौधे के रोगजनकों को रोकने में मदद कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, वह ऐसे बैक्टीरिया हैं जो पौधों की वृद्धि के लिए सहायक होते हैं। ISS पर मिट्टी के जीवाणुओं को उगाना पूरी तरह से अचानक नहीं था। सालों से अंतरिक्ष स्टेशन(International Space Station) पर रहने वाले अंतरिक्ष यात्री शोध और भोजन के लिए पौधे उगाते रहे हैं।

अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में खोजे बैक्टीरिया फसलों को उगाने में मददगार साबित हो सकते हैं।(Unsplash)

तीन नए जीवाणुओं को रेखांकित किया गया और सभी को पहले के समान, अज्ञात प्रजातियों से संबंधित पाया गया। उत्पत्ति-संबंधी विश्लेषण के साथ उन्हें यह मिथाइलोबैक्टीरियम इंडिकम से मेल खाता दिखाई दिया है। शोधकर्ताओं ने प्रसिद्ध भारतीय जैव विविधता वैज्ञानिक अजमल खान के सम्मान में मैथिलोबैक्टीरियम अजमली नामक नए प्रजाति को बुलाने का प्रस्ताव रखा। एक बयान में, जेपीएल शोधकर्ताओं कस्तूरी वेंकटेश्वरन (वेंकट) और नितिन कुमार सिंह ने कहा कि अंतरिक्ष में फसलों के बढ़ने के लिए उपभेदों में “जैव-प्रौद्योगिकीय रूप से उपयोगी आनुवंशिक निर्धारक” हो सकते हैं। हालांकि, प्रायोगिक जीव विज्ञान को यह साबित करने की आवश्यकता है कि यह वास्तव में अंतरिक्ष खेती के लिए एक संभावित गेम-चेंजर है।

यह भी पढ़ें: मंगल पर पानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ग्रह की पपड़ी में खनिजों के बीच है फंसा!

वेंकट और सिंह ने अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी(American Space Agency) के साथ एक दिन मंगल ग्रह की सतह पर मनुष्यों को ले जाने की तलाश करते हुए कहा – और संभवतः इससे परे – अमेरिकी राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद ने अंतरिक्ष एजेंसी को “सूक्ष्मजीवों के सर्वेक्षण के लिए परीक्षण-बिस्तर” के रूप में आईएसएस का उपयोग करने की सिफारिश की है। जेपीएल शोधकर्ताओं के साथ, दक्षिणी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, लॉस एंजिल्स के वैज्ञानिक; कॉर्नेल विश्वविद्यालय और भारत में हैदराबाद विश्वविद्यालय ने अध्ययन में योगदान दिया।(VOA)

(हिंदी अनुवाद: शान्तनू मिश्रा)

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डब्ल्यूएचओ यानीं विश्व स्वास्थ्य संगठन का मुख्यालय (wikimedia commons)

पूरी दुनिया एक बार फिर कोरोना वायरस अपना पांव पसार रहा है । डब्ल्यूएचओ यानीं विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि कोरोना वायरस का जो डेल्टा कोविड वैरिएंट संक्रामक वायरस का वर्तमान में प्रमुख प्रकार है, अब यह दुनिया भर में इसका फैलाव हो चूका है । इसकी मौजूदगी 185 देशों में दर्ज की गई है। मंगलवार को अपने साप्ताहिक महामारी विज्ञान अपडेट में वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसी ने कहा, डेल्टा वैरिएंट में अब सेम्पल इकट्ठा करने की डेट जो कि 15 जून -15 सितंबर, 2021 के बीच रहेंगीं । जीआईएसएआईडी, जो एवियन इन्फ्लुएंजा डेटा साझा करने पर वैश्विक पहल के लिए है, एक ओपन-एक्सेस डेटाबेस है।

मारिया वान केरखोव जो विश्व स्वास्थ्य संगठन में कोविड-19 पर तकनीकी के नेतृत्व प्रभारी हैं , उन्होंने डब्ल्यूएचओ सोशल मीडिया लाइव से बातचीत करते हुए कहा कि , वर्तमान में कोरोना के अलग अलग टाइप अल्फा, बीटा और गामा का प्रतिशत एक से भी कम चल रहा है। इसका मतलब यह है कि वास्तव में अब दुनिया भर में कोरोना का डेल्टा वैरिएंट ही चल रहा है।

\u0915\u094b\u0930\u094b\u0928\u093e \u0935\u093e\u092f\u0930\u0938 कोरोना का डेल्टा वैरिएंट हाल के दिनों में दुनियाभर में कहर बरपाया है (pixabay)

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ऑस्ट्रेलिया का नक्शा (Wikimedia Commons)

ऑस्ट्रेलिया की शार्क प्रजातियों पर एक खतरा आ गया है। वहाँ 10 प्रतिशत से अधिक शार्क प्रजाति विलुप्त होने ही वाली है। समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय पर्यावरण विज्ञान कार्यक्रम (एनईएसपी) समुद्री जैव विविधता हब ने सभी ऑस्ट्रेलियाई शार्क, किरणों और घोस्ट शार्क (चिमेरा) के विलुप्त होने का मूल्यांकन प्रकाशित किया है।


ऑस्ट्रेलिया दुनिया की कार्टिलाजिनस मछली प्रजातियों के एक चौथाई से अधिक का घर है, इसमें 182 शार्क, 132 किरणें और 14 चिमेरे ऑस्ट्रेलियाई जलमार्ग में हैं। पीटर काइन जो चार्ल्स डार्विन विश्वविद्यालय (सीडीयू) के एक वरिष्ठ शोधकर्ता है और रिपोर्ट के प्रमुख लेखक है उन्होंने कहा कि तुरंत कार्रवाई की जरूरत है। पीटर काइन कहा, "ऑस्ट्रेलिया का जोखिम 37 प्रतिशत के वैश्विक स्तर से काफी कम है। यह उन 39 ऑस्ट्रेलियाई प्रजातियों के लिए चिंता का विषय है, जिनके विलुप्त होने का खतरा बढ़ गया है।"

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ब्रिटेन में पढ़ने के लिए राज्य छात्रवृत्ति मिली 6 आदिवासी छात्रों को।(Unsplash)

भारत के झारखंड राज्य में कुछ छात्रों का भविष्य उज्व्वल होने जा रहा है । क्योंकि झारखंड राज्य में छह छात्रों को राज्य के छात्रवृत्ति कार्यक्रम के तहत विदेश में मुफ्त उच्च शिक्षा मिलने जा रही है। राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कल्याण मंत्री चंपई सोरेन राजधानी रांची में गुरुवार कोआयोजित होने वाले एक कार्यक्रम में छात्रवृत्ति योजना मारंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा के तहत लाभार्थियों छात्रोंऔर उनके अभिभावकों को सम्मानित करने जा रहे है।

आप को बता दे की यह योजना राज्य सरकार द्वारा यूके और आयरलैंड में उच्च अध्ययन करने हेतु अनुसूचित जनजातियों के छात्रों के लिए शुरू की गई है। छात्रवृत्ति के पुरस्कार प्राप्त करने वाले छात्रों को विविध खर्चो के साथ-साथ ट्यूशन फीस भी पूरी तरह मिलेगी । इस योजना के अनुसार झारखंड राज्य में हर साल अनुसूचित जनजाति से 10 छात्रों का चयन किया जाएगा।

सितंबर में ब्रिटेन के 5 विभिन्न विश्वविद्यालयों में अपना अध्ययन कार्यक्रम शुरू करंगे 6 छात्र जिनको को चुना गया हैं।

अगर बात करे चयनित छात्रों की सूचि के बारे में तो इसमें से हरक्यूलिस सिंह मुंडा जो कि "यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन " के "स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज" से एमए करने जा रहे हैं। "मुर्मू यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन" से छात्र अजितेश आर्किटेक्चर में एमए करने जा रहे हैं। और वंहीआकांक्षा मेरी "लॉफबोरो विश्वविद्यालय" में जलवायु परिवर्तन, विज्ञान और प्रबंधन में एमएससी करेंगी, जबकि दिनेश भगत ससेक्स विश्वविद्यालय में जलवायु परिवर्तन, विकास और नीति में एमएससी करेंगे।

\u0938\u094d\u091f\u0942\u0921\u0947\u0902\u091f विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए छात्र (pixabay)

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