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7 ऐसे मुस्लिम लेखक जिन्होंने ने कट्टर इस्लामिकता के खिलाफ कलम उठाई

आज हम ऐसे मुस्लिम(Muslim) लेखकों की बात करेंगे, जिन्होंने इस्लाम और इस्लामिक समाज की आलोचना की है और जिनमें से कुछ को इस्लामिक समूहों द्वारा ईश निंदा' के रूप में बताया गया है।

देश विदेश में बढ़ते इस्लामिक कट्टरता(Islamic Extremism) और वैश्विक आतंकवाद(terrorism) की घटना लगातार बढ़ती जा रही है। (Pixabay)

By: Nithin Sridhar

देश विदेश में बढ़ते इस्लामिक कट्टरता(Islamic Extremism) और वैश्विक आतंकवाद(terrorism) की घटना लगातार बढ़ती जा रही इसके साथ, इस्लामी धर्मशास्त्र, शरिया कानून(Shariya Law) और मुस्लिम(Muslim) समाज में वर्तमान प्रथाओं के विभिन्न बुनियादी सिद्धांतों के बारे में गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। आज हम ऐसे मुस्लिम(Muslim) लेखकों की बात करेंगे, जिन्होंने इस्लाम और इस्लामिक समाज की आलोचना की है और जिनमें से कुछ को इस्लामिक समूहों द्वारा ईश निंदा' के रूप में बताया गया है।


1. सलमान रुश्दी(Salman Rushdie): ब्रिटिश भारतीय उपन्यासकार जिन्होंने 1981 में अपनी पुस्तक 'मिडनाइट्स चिल्ड्रन' के लिए बुकर पुरस्कार जीता था, जब 1988 में उनकी पुस्तक 'द सैटेनिक वर्सेज' प्रकाशित हुई थी, तब यह एक बड़े विवाद में उतरा था। इस पुस्तक में पैगंबर मोहम्मद(Prophet Mohammad) के बारे में एक किंवदंती लिखी है, जो कथित तौर पर कुछ छंदों की व्याख्या करते हैं। जिसमे पूर्व-इस्लामिक मक्का की देवी के पूजा की अनुमति दी थी, लेकिन बाद में शैतान द्वारा छल किए जाने के पैगंबर(Prophet Mohammad) ने यह फैसला वापस ले लिया गया।

पुस्तक के लिए मुस्लिम समुदाय की प्रतिक्रिया बहुत कड़ी थी,एकाएक थी, और जल्द ही हिंसक हो गई थी। मुसलमानों(Muslims) ने इस पुस्तक को इस्लाम(Islam) के लिए अत्यधिक अपमानजनक माना और इस पुस्तक को इस अर्थ में लिया कि लेखक पूरे कुरान(Quran) को शैतान के शब्द के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। इस्लामिक देशों ने पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया, अमेरिका में किताबों की दुकानों पर हमला किया गया और 1989 में ईरान के अयातुल्ला खुमैनी ने ईश निंदा करने के लिए रुश्दी(Salman Rushdie) की हत्या का फतवा जारी किया। इसके बाद, रुश्दी(Rushdie) को कुछ सालों तक छिपने के लिए मजबूर होना पड़ा। रुश्दी, जो खुद को अनीश्वरवादी के रूप में पहचानते हैं, मुस्लिम सुधार और इस्लाम पर बहस के लिए तत्पर रहते हैं।

सलमान रुश्दी(VOA)

2. तस्लीमा नसरीन(Taslima Nasreen): 1993 में मुस्लिम कट्टरवाद(Muslim Extremism) के खिलाफ लड़ने वाले एक हिंदू(Hindu) परिवार के बारे में अपना उपन्यास 'लज्जा' प्रकाशित करने के बाद इस बांग्लादेशी(Bangladesh) लेखक को 1994 में अपने देश से भागने के लिए मजबूर होना पड़ा था। इस उपन्यास को इस्लाम(Islam) विरोधी माना गया और बाद में बांग्लादेश(Bangladesh) में इसे प्रतिबंधित कर दिया गया। उन्हें लज्जा के प्रकाशन के बाद कई शारीरिक हमलों और मृत्यु के खतरों का सामना करना पड़ा, जिससे वह देश से भागने को मजबूर हो गई। नसरीन ने खुद कोअनीश्वरवादी के रूप में पहचाना और मुस्लिम समाज में बढ़ती कट्टरवाद और असहिष्णुता की कड़ी आलोचना की। उन्होंने धर्मनिरपेक्ष मानवतावाद, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लैंगिक समानता की वकालत करती हैं।

3. तारेक फतह(Tarek Fatah): कनाडाई लेखक और प्रसारक ने इस्लामी चरमपंथ(Islamic Extremism), इस्लामिक स्टेट(Islamic State) और पाकिस्तान(Pakistan) के मुद्दे पर विस्तार से लिखा है। उनका जन्म और पालन-पोषण पाकिस्तान(Pakistan) में हुआ, लेकिन बाद में उन्हें कनाडा(Canada) भेज दिया गया। वह इस्लामिक कट्टरपंथ(Islamic radicalism) का एक मजबूत आलोचक है लेकिन वह यह मानते हैं कि इस सब जहर की जड़ शरिया कानून है न की कुरान। अपनी पुस्तक 'चेज़िंग ए मिराज: द ट्रेजिक इल्यूजन ऑफ ए इस्लामिक स्टेट' में, उन्होंने तर्क दिया है कि पिछले एक हज़ार वर्षों से इस्लामिक स्टेट की मृगतृष्णा का पीछा करने के लिए मुसलमानों(Muslims) को किस तरह बनाया गया है और वर्तमान संदर्भ में इस्लामिक स्टेट इस्लामिक व्यवहार के लिए केंद्रीय नहीं है, यह बताया गया है। फतह ने सोशल मीडिया के माध्यम से कई मौखिक हमलों और मृत्यु के खतरों का भी सामना किया है।

तारेक फ़तेह(Wikimedia Commons)

4. अयान हिरसी अली(Ayaan Hirsi Ali): सोमालिया में जन्मी डच-अमेरिकी कार्यकर्ता प्रसिद्ध पुस्तक 'हेरिटिक: व्हाई इस्लाम नीड्स रिफॉर्म नाउ' की लेखक हैं। अपनी किताब में, अली बताती हैं कि इस्लाम(Islam) और मुस्लिम(Muslim) समाज का सुधार समय की आवश्यकता क्यों है? और यह दावा करती हैं कि यह आतंकवाद(terrorism) के खतरे, महिलाओं और अल्पसंख्यकों(minorities) पर अत्याचार और सांप्रदायिक संघर्ष को समाप्त करने का एकमात्र तरीका है। उन्होंने अपनी किताब 'द कैज्ड वर्जिन: ए मुस्लिम वुमनज क्राई फॉर रीज़न' में इस्लाम(Islam) और मुस्लिम(Muslim) समाज के साथ अपने संघर्षों के बारे में बड़ी बारीकी से बताया है।

2004 में, अली ने एक लघु फिल्म के निर्माण में भाग लिया, जिसका शीर्षक 'सबमिशन' (इस्लाम शब्द का अंग्रेजी अनुवाद) था, जो इस्लामी समाज में महिलाओं के उत्पीड़न के बारे में था और बाद में उन्हें मौत की धमकी मिली थी। बाद में उसी वर्ष, थियो वैन गॉग, अली के फिल्म में सहयोगी की एक डच मुस्लिम द्वारा हत्या कर दी गई थी। अली, जो अब खुद कोअनीश्वरवादी के रूप में पहचानती हैं, वह इस्लाम में महिलाओं, समलैंगिकों के बर्ताव की आलोचना करती हैं और पैगंबर मोहम्मद(Prophet Mohammad) की उनके चरित्र और व्यक्तित्व लक्षणों पर आलोचना भी की है।

5. इब्न वर्राक़(Ibn Warraq): वह इस्लाम(Islam) और कुरान(Quran) के जाने-माने आलोचक हैं , जिन्हें उनके उपनाम से ही जाना जाता है, और एक भारतीय मूल(Indian Origin) के मुस्लिम(Muslim) हैं। जो विभाजन के दौरान भारत से पाकिस्तान(Pakistan) लाया गया था। वह वर्तमान में यूरोप(Europe) से रहते हैं और काम करते हैं और उन्होंने नौ पुस्तकें भी लिखी हैं, जिनमें प्रसिद्ध पुस्तक- 'व्हाई आई एम नॉट ए मुस्लिम 'शामिल है। इसके अलावा, उन्होंने 'द ऑरिजिन्स ऑफ द कुरान', 'द क्वेस्ट फॉर द हिस्टोरिकल मुहम्मद', और 'व्हाट द कुरान रियली सेज़: लैंग्वेज, टेक्स्ट एंड कमेंट्री', नाम से पुस्तकें लिखीं हैं।

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अपनी पुस्तक, 'व्हाई आई एम नॉट ए मुस्लिम', में वर्राक़ इस्लामी धर्मशास्त्र, इतिहास और संस्कृति की आलोचना कर रहे हैं। वह दावा करते हैं कि इस्लामी सिद्धांत अलग-अलग अधिकारों और धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देशों की स्वतंत्रता के साथ मेल नहीं खाता है। 2007 से पहले उन्होंने अपनी सुरक्षा के डर से सार्वजनिक रूप से सामने आने से इनकार कर दिया था, यही कारण है कि उन्हें अपने उपनाम 'इब्न वर्राक़' के नाम से यह किताब लिखना पड़ा। वह 'इंस्टीट्यूट फॉर द सेक्यूलराइजेशन ऑफ इस्लामिक सोसाइटी' के संस्थापक हैं और अयान हिरसी अली, वफ़ा सुल्तान और इरशाद मंजी के साथ, उन्होंने शरिया कानून और फ़तवा प्रणाली पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए दुनिया भर की सरकारों से एक दरख्वास्त को जारी किया था।

इब्न वर्राक़(Wikimedia Commons)

6. अनवर शेख(Anwar Sheikh): पाकिस्तान में जन्मे ब्रिटिश लेखक और इस्लाम के आलोचक था, जिनका निधन 2006 में हुआ था। उन्होंने इस्लाम, इसके धर्मशास्त्र और इतिहास की आलोचना करते हुए बड़ी संख्या में लेख और किताबें लिखीं। अपने सबसे प्रसिद्ध काम 'इस्लाम: द अरब इंपीरियलिज्म ', में इस्लाम और अरब के इतिहास का विश्लेषण करने के बाद, उन्होंने निष्कर्ष निकाला है कि इस्लाम अरब साम्राज्यवाद को लागू करने के लिए एक उपकरण से ज्यादा कुछ नहीं है। उनकी अन्य रचनाओं में 'इस्लाम एंड पीपुल्स ऑफ द बुक' और 'जिहाद एंड सिविलाइजेशन' शामिल है।

आपको बता दें कि शेख एक कट्टर जिहादी था जिसने भारत के विभाजन के दौरान दो सिखों को मार डाला था। 25 साल की उम्र में, उनका इस्लाम से मोहभंग हो गया और वह इसकी आलोचना करने लगे। बाद में, शेख ने हिंदू धर्म में परिवर्तित हो गए और अनिरुद्ध ज्ञान शिखा नाम को अपनाया। शेख ने बड़े पैमाने पर पैगंबर मोहम्मद, शरिया कानून, जिहाद, और आतंकवाद के बारे में लिखा है। 1995 में, पाकिस्तान में उनके खिलाफ फतवा जारी किया गया था और उन्हें इस्लाम धर्म छोड़ने के लिए कई मौत की सज़ा सुनाई गई थी।

7. अली सिना(Ali Sina): वह ईरानी पूर्व-मुस्लिम है, जो वर्तमान में कनाडा में रहता है और जो अपने उपनाम 'अली सिना' के तहत लेख लिखता है। वेबसाइट फेथ फ्रीडम इंटरनेशनल (एफएफआई) के संस्थापक हैं, जिसका मानना है कि वह पूर्व मुसलमानो के लिए जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं। वह इस्लामी सिद्धांतों की गहन आलोचक है, और उसने विभिन्न इस्लामी विद्वानों के साथ बहस की है, जिनमें प्रसिद्ध पाकिस्तानी विद्वान जावेद ए ग़ामिदी और खालिद ज़हीर भी शामिल है।

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सिना का दावा है कि हिंसा के बाद से इस्लाम में सुधार नहीं किया जा सकता है और गैर-विश्वासियों के प्रति अवमानना इस्लामी सिद्धांत के लिए केंद्र है और अगर इस्लाम को वास्तव में सुधार किया जाना था, तो कुरान और पैगंबर मोहम्मद के ऐतिहासिक खातों सहित इसके अधिकांश शास्त्रों को छोड़ देना चाहिए था। वह आगे अपनी पुस्तक 'अंडरस्टैंडिंग मुहम्मद: ए साइकोयोग्राफ़ी ऑफ़ अल्लाह प्रोफेट' में लिखता है कि पैगंबर मोहम्मद मानसिक रूप से बीमार थे।

(हिंदी अनुवाद: शान्तनू मिश्रा)

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