अगर ईरान-अमेरिका के बीच हुआ युद्ध, तो क्या मुस्लिम देश होंगे एक जुट, जानें कौन देगा खामनेई का साथ? x
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अगर ईरान-अमेरिका के बीच हुआ युद्ध, तो क्या मुस्लिम देश होंगे एक जुट, जानें कौन देगा खामनेई का साथ?

ईरान (Iran) और अमेरिका (America) के बीच विवाद अब थमने का नाम नहीं ले रहा है। दिन प्रतिदिन दोनों देशों के बीच ज़ुबानी जंग जारी है।

Author : न्यूज़ग्राम डेस्क

ईरान (Iran) और अमेरिका (America) के बीच विवाद अब थमने का नाम नहीं ले रहा है। दिन प्रतिदिन दोनों देशों के बीच ज़ुबानी जंग जारी है। ईरान में जिस तरीके से पिछले कई दिनों से आंदोलन ज़ारी है और जिस तरीके से अमेरिका ने बीच में हस्तक्षेप किया है, ऐसा लगता है अब दोनों देशों के बीच ज़ुबानी जंग, सैन्य युद्ध में तब्दील हो जाएगा। 

ईरान में पिछले कई दिनों से आंदोलन जारी है, खामनेई सरकार के ख़िलाफ़ आम जनता में काफ़ी आक्रोश है। इसी बीच अमेरिका ने ईरान को धमकियां देना शुरू कर दिया है। ईरान(Iran) की तरफ से भी अमेरिका (America) के लिए काफी कुछ बयानबाज़ी हो चुकी है। पिछले दिनों ही अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ऐलान किया है कि जो देश इस्लामिक गणराज्य ईरान के साथ व्यापार में साझेदार होंगे वो संयुक्त राज्य अमेरिका से होने वाले सभी व्यापार पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ देंगे। यह  ऐलान होते ही विश्व व्यवस्था में बहस छिड़ गयी है। इसका असर भारत ,संयुक्त अरब अमीरात,तुर्की जैसे अन्य देशों पर भी पड़ सकता है । ऐसे में सभी राष्ट्र कूटनीतिक समाधान में लगे हुए हैं। 

अमेरिका(America) का ईरान के प्रति जिस तरीके से रवैया है , पिछले कई दिनों के रिकार्ड को देखा जाये तो ऐसा लगता है अमेरिका, ईरान पर सैन्य कार्रवाई की तैयारी में है। ऐसा होता है तो क्या ईरान इस विश्व व्यवस्था में अलग थलग पड़ जाएगा या ईरान का साथ कई राष्ट्र अमेरिका के ख़िलाफ़ जाकर दे सकते हैं। 

अमेरिका नाटो (NATO) का सदस्य है जबकि ईरान इसका सदस्य नहीं है

अमेरिका नाटो (NATO) का सदस्य देश है जिसमें अमेरिका (America) सहित 32 देश शामिल हैं। अगर ऐसा होता है कि अमेरिका के ऊपर ईरान की तरफ से हमला होता है तो नाटो के आर्टिकल 5 के हिसाब से ईरान को इन सभी राष्ट्रों का सामूहिक विरोध देखना पड़ सकता है। अगर ऐसा होता है तो ईरान के लिए यह युद्ध बहुत चुनौती भरा हो सकता है। 

नाटो सामूहिक सुरक्षा सिद्धांत पर बना एक सैन्य और राजनीतिक गठबंधन है। आसान भाषा में इसके नियम को समझा जाए तो यह है कि यदि किसी एक सदस्य देश पर किसी अन्य देश का हमला होता है तो यह हमला सभी देश के ऊपर माना जाता है। यह सैन्य गठबंधन 1949 में सोवियत संघ के संभावित खतरे से बचने और सामूहिक सुरक्षा के उद्देश्य से बनाया गया था। 

क्या इस्लामिक देशों का समर्थन ईरान को मिल सकता है

प्रायः ये माना जाता है कि विश्व के सभी इस्लामिक (Islamic) राष्ट्रों में एक आम सहमति है परन्तु यह काफी संदेहास्पद है, ऐसा कई बार अवसर आया है जब कोई इस्लामिक देश राजनीति के अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उलझा हुआ था तब भी इस्लामिक देश आपसी सहमति नहीं बना पाए और जवाबी कार्रवाई में कुछ विशेष देखने को नहीं मिला है। साल 2003 के समय इराक़ पर हमले हुए थे जो कि एक इस्लामिक राष्ट्र था और खुले तौर पर कुवैत ,क़तर ,बहरीन,सऊदी अरब जैसे इस्लामिक देशों ने अमेरिका का सहयोग किया था।  तो यह समझ लेना कि ईरान एक इस्लामिक देश है सिर्फ इसलिए अन्य इस्लामिक देश उसका साथ देंगे ,तो यह गलतफहमी होगी। वास्तविकता यही है कि राजनीति  के अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर हर देश सबसे पहले राष्ट्र हित को सबसे ऊपर रखता है और राष्ट्रीय हित  को देखते हुए कूटनीतिक ,व्यापारिक और राजनैतिक गठबंधन को अंजाम देते हैं।

अगर इस्लाम के नाम पर इस्लामिक देशो का समर्थन मिले तो क्या होगा 

अगर ऐसा होता है कि ईरान (Iran) को इस्लाम के नाम पर सभी इस्लामिक देशों का समर्थन मिलता है तो इस  युद्ध में नॉन इस्लामिक देशों की आपसी गुटबंदी देखने को मिल सकती है।  जिस तरीके से अमेरिका और अन्य देश अप्रत्यक्ष तौर पर इस्लाम को आतंकवाद से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं वैसे में नॉन इस्लामिक देशों का इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ एक होना कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। पीछे कई बार अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, रेडिकल इस्लामिक आतंकवाद जैसे शब्द का इस्तेमाल कर चुके हैं। 

अगर ऐसा होता है कि सभी इस्लामिक (Islamic) देश एक हो जाएँ तो फिर यह कहना गलत नहीं होगा की सैमुअल पी हंटिंग्टन की कही गयी बात अंततः सही साबित होगी। सैमुअल पी हंटिंग्टन ने क्लैश ऑफ़ सिविलाइज़ेशन थ्योरी (Clash of Civilization Theory) के माधयम से सभ्यताओं के टकराव की व्याख्या की थी और फ्रांसिस फुकुयामा के एन्ड ऑफ़ हिस्ट्री (The End of History and the Last Man) के जवाब में यह थ्योरी बताई और नए तरीके से विश्व व्यवस्था को व्याख्यायित करने का प्रयास किया था।

भारत और अन्य एशियाई देशों का रुख 

वैसे भारत कभी भी वैश्विक युद्ध के पक्ष में नहीं रहा है।  वैश्विक मंचों पर भारत ने हमेशा शांतिपूर्वक बातचीत के माध्यम से समाधान निकालने की वकालत की है। भारत के सम्बन्ध दोनों देशो से रहे हैं। ईरान के साथ भारत के सम्बन्ध काफी समय से रहे हैं।  ईरान, भारत के लिए ऊर्जा संसाधन के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में रहा है। चाबहार पोर्ट भारत और ईरान के बीच रणनीतिक सहयोग का महत्वपूर्ण प्रोजरक्ट रहा है।ईरान ,भारत बहुत सारे मंचों पर साथ दिखाई देते है हैं जैसे शंघाई सहयोग संगठन (SCO) ,ब्रिक्स प्लस (BRICS+) आदि। 

वहीं दूसरी तरफ अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते भी काफी मायने रखते हैं भारत अमेरिका के साथ QUAD (Quadrilateral Security Dialogue) में साझेदार है, जिससे हिन्द -प्रशांत क्षेत्र में चीन के एकक्षत्र सत्ता को चुनौती दी जा सके। ऐसे अनेक मंच हैं जहाँ अमेरिका-भारत साथ दिखाई देते हैं। दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के साथ भी अमेरिका के सम्बन्ध काफी पुराने व अच्छे रहे हैं।

सार रूप में कहा जाए तो वर्तमान की विश्वव्यस्था में राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर ही राष्ट्रों के द्वारा हाथ बढ़ाये जा रहे हैं। कोई भी राष्ट्र निःस्वार्थ किसी राष्ट्र का समर्थन कर पायेगा यह कहना मुश्किल होगा। ऐसे में युद्ध के समय संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका भी काफी मायने रखेगा। देखना यह है कि शीत युद्ध के पश्चात जिस तरीके से विश्वव्यवस्था में समय -समय पर टकराहट देखने को मिल रही है, उससे संपूर्ण वैश्विक राजनैतिक व्यवस्था पर क्या असर पड़ता है . .    
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