Summary
ईरान में महंगाई और आज़ादी की मांग पर बड़े प्रदर्शन चल रहे हैं।
अमेरिका खामेनेई के खिलाफ रेजा पहलवी का समर्थन कर रहा है।
खामेनेई रूस के करीब हैं, लेकिन देश नहीं छोड़ रहे।
बचपन में एक कहानी हर किसी ने सुनी होगी, 'दो बिल्लियों की लड़ाई में एक बंदर हमेशा बाजी मार जाता है।' इस समय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो राजनीति चल रही है, वो वाकई कुछ इससे ही मिलती है। ये कहानी इस समय ईरान (Iran) पर सटीक बैठ रही है जहाँ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) और ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई (Ali Khamenei) आमने सामने हैं।
ईरान (Iran) में इस समय हालत काफी ख़राब हैं। यहाँ के लोग अपने ईरान में बढ़ रहे महंगाई के चलते, अपने ही देश के सरकार के खिलाफ हैं और खामेनेई (Ali Khamenei) के खिलाफ जमकर प्रदर्शन कर रहे हैं। जनता का गुस्सा पूरी तरह से उग्र है और सुप्रीम लीडर को किसी भी हाल में हटाना चाहते हैं। हालत इतने बेकाबू हैं कि ईरान में पूरी तरह से इंटरनेट को बंद कर दिया गया है।
अब इसमें कई तरह की चीजें जो हैं, निकलकर सामने आ रही है। पहला ये कि इन सबके पीछे अमेरिका की साजिश है, दूसरा ये कि शाह वंश के चिराग रेजा पहलवी (Reza Pahlavi) फिर से ईरान (Iran) में वापस आकर सत्ता हासिल करना चाहते हैं और तीसरा ये कि खामेनेई को डर है कि जैसे वेनेज़ुएला में मादुरो को ट्रंप ने उठवा लिया था, तो कहीं ये उनके साथ भी ना हो जाए? ऐसे में वो रूस भागने की फ़िराक में हैं। तो चलिए आज हम इन सारे मामलों को अच्छे से समझने की कोशिश करते हैं।
28 दिसंबर 2025 को ईरान (Iran) में लोगों का गुस्सा काफी उग्र हो गया। तेहरान की बाजारों में आम जनता ने जमकर प्रदर्शन किया। इसके पीछे का मुख्य कारण महंगाई बताया जा रहा है। डॉलर के मुकाबले ईरानी मुद्रा 'रियाल' की कीमत रिकॉर्ड स्तर तक गिर गई है और नतीजा ये है कि खाने-पीने के सामानों की कीमत रातों-रात आसमान छूने लगे हैं। कई मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया है कि 1 अमेरिकी डॉलर, लगभग 9,94,055 ईरानी रियाल (IRR) के बराबर है। भारतीय मुद्रा में यह 11 हज़ार के करीब होता है।
वहीं, ईरान (Iran) में आर्थिक संकट के साथ-साथ आम जनता के भीतर सरकार के भ्रष्टाचार, सख्त धार्मिक कानूनों और नागरिक स्वतंत्रता की कमी के कारण काफी नाराजगी है। आलम ये है कि लोग सड़कों पर उतरकर 'तानाशाह मुर्दाबाद' जैसे नारे लगा रहे हैं और शासन बदलने की मांग कर रहे हैं। यह आंदोलन 100 से अधिक शहरों में फ़ैल चुका है जिसमे बिजमैन, छात्र से लेकर कई Gen-Z भी इस बड़ी संख्या में शामिल हैं। इसकी जानकारी बाहर ना जाए, इसके लिए वहां की सरकार ने इंटरनेट को पूरी तरह से बंद कर दिया है लेकिन ये इंटरनेट सिर्फ आम लोगों के लिए था, सरकारी कर्मचारियों के लिए नहीं। ऐसे में जब ये बात लोगों को पता चली तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर चला गया।
सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें जारी हैं और दावा किया जा रहा है कि पिछले 10 दिन से हो रहे इस प्रदर्शन में 217 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। अस्पतालों में लाशों का ढेर लगता ही जा रहा है। वहीं, ईरान (Iran) के अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों को 'अल्लाह का दुश्मन' बता दिया है और कहा है कि उन्हें मौत की सजा दी जाएगी।
ईरान (Iran) के कानून के अनुच्छेद 186 में लिखा है कि कोई भी अगर इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ हथियारबंद विरोध करता है, तो उसे मौत की सजा, दाहिना हाथ और बायां पैर काटने के साथ देश से बाहर किया जा सकता है। जबकि ईरान की सरकार इस प्रदर्शन को अमेरिका की साजिश बता रही है।
अगर आपको ये लग रहा है कि ये प्रदर्शन सिर्फ इसलिए हो रहा है क्योंकि ईरान (Iran) में आर्थिक संकट है। तो ऐसा बिल्कुल नहीं है। ईरान की सरकार इस समय 3 फ्रंट से लड़ाई कर रही है। पहला तो यह है कि आर्थिक संकट है, जनता त्रस्त है और वो खामनेई की सरकार को हटाना चाहती है। दूसरा फ्रंट महिलाओं का है।
दरअसल, साल 2022 में ईरान (Iran) की पुलिस ने वहां एक महिला जिसका नाम महसा अमीनी था, उसे गिरफ्तार किया था। आरोप था कि उसने सही ढंग से हिजाब नहीं पहना था। इसके बाद हिरासत में ही उस महिला की मृत्यु हो जाती है।
जब ये घटना सामने आती है, तो ईरानी महिलाओं के भीतर गुस्सा पनप उठता है। आज ये आंदोलन महिला जीवन और उनकी स्वतंत्रता के इर्द-गिर्द भी घूम रहा है, जो हिसाब की प्रथा से मुक्ति चाहती हैं। इसके लिए वहां की महिलाऐं खुलेआम अपने बाल काटकर और हिसाब को जलाकर विरोध प्रदर्शन कर रही हैं।
इस बार का आंदोलन इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि यह दुनिया का ऐसा पहला बड़ा आंदोलन है जिसका नेतृत्व महिलाएं और युवा लड़कियां कर रही हैं, और सबसे खास बात यह है कि पुरुष भी उनके पीछे खड़े होकर इस हक की लड़ाई में उनका साथ दे रहे हैं। यही कारण है कि इस बार का प्रदर्शन काफी उग्र हो चुका है।
ईरान में (Iran) हो रहे प्रदर्शन का दो फ्रंट आपने देखा। पहला आर्थिक, दूसरा महिलाओं की आज़ादी और तीसरा है शाह वंशज रेजा पहलवी (Reza Pahlavi)।
उन्होंने X जो पहले ट्विटर था, वहां पोस्ट करते हुए लिखा कि ईरान में लगातार तीसरी रात सड़कों पर उतरी जनता ने खामेनेई की सत्ता और दमनकारी तंत्र को कमजोर कर दिया है। कई सैनिक और सुरक्षाकर्मी अपने पद छोड़ चुके हैं या जनता पर कार्रवाई करने से इनकार कर रहे हैं। खामेनेई के साथ अब केवल कुछ हिंसक तत्व रह गए हैं, जिन्हें ईरान और ईरानी जनता का दुश्मन बताया गया है और कहा गया है कि उन्हें अपने कर्मों का परिणाम भुगतना होगा।
पहलवी ने आगे लिखा कि जान लीजिए कि आप अकेले नहीं हैं। दुनिया भर में आपके साथी गर्व से आपकी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं, जैसा कि आपने टीवी स्क्रीन पर उनकी बड़ी और व्यापक मौजूदगी की तस्वीरें देखी होंगी। आज पूरी दुनिया आपकी राष्ट्रीय क्रांति के साथ खड़ी है और आपके साहस की प्रशंसा करती है। खासकर स्वतंत्र दुनिया के नेता राष्ट्रपति ट्रंप ने आपकी अद्भुत बहादुरी को बारीकी से देखा है और उन्होंने घोषणा की है कि वे आपकी मदद करने को तैयार हैं। सड़कों को मत छोड़िए। मेरा दिल आपके साथ है। मुझे पता है कि मैं जल्द ही आपके साथ रहूंगा।
बता दें कि रेजा पहलवी, शाह के वंसज हैं और इस समय वो अमेरिका में ही हैं। वहीं, से सोशल मीडिया के जरिये आंदोलन को भड़काने का काम कर रहे हैं।
शाह वंश को समझने के लिए हमे इतिहास में काफी पीछे जाना होगा। बात 1925 की है जब ईरान (Iran) में रेज़ा शाह पहलवी ने पहलवी (Shah) वंश की नींव रखी। वे सेना से आए थे और देश को आधुनिक बनाना चाहते थे। “पहलवी डायनेस्टी (Pahlavi dynasty)” ने ईरान में 1925 से 1979 तक लगातार शासन किया। रेज़ा शाह पहलवी के बाद उनके बेटे मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी ईरान के शाह बने। उनका झुकाव अमेरिका और ब्रिटेन की तरफ ज्यादा था और वो अपने देश आधुनिक बनाना चाहते थे, इसलिए वो पश्चिमी देशों की ओर ज्यादा आकर्षित थे।
फिर होता यह है कि 1953 में ईरान के चुने हुए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग ने तेल कंपनियों को राष्ट्रीयकरण कर दिया और ये बात अमेरिका और रूस को पसंद नहीं आई। उन्हें यह भी डर था कि कहीं मोसादेग सोवियत यूनियन की ओर ना चले जाएं। इसके बाद अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA और ब्रिटेन की MI6 ने मिलकर एक गुप्त तख्तापलट (Operation Ajax) की योजना बनाई। इस योजना के तहत, उन्होंने विरोधी समूहों, सेना और मीडिया की मदद से मोसादेग की सरकार गिराई गई। फिर जो शाह देश छोड़कर चले गए थे, उन्हें वापस लेकर फिर से राजा बनाया गया।
वहीं, 60 से 70 के दशक के बीच शाह की तानाशाही काफी बढ़ गई। अमीरी-गरीबी का फर्क होने लगा, धार्मिक भावनाओं की अनदेखी और अमेरिकी समर्थन के कारण ईरान में विरोध बढ़ता ही चला गया। फिर 1979 में एंट्री होती है, आयतुल्लाह रूहोल्लाह खमैनी (Ayatollah Ruhollah Khomeini) की जो ईरान की सत्ता संभालते हैं। लगभग 14-15 तक वो देश से बाहर निकाले गए थे और फ़्रांस-इराक में रह रहे थे। वो 1 फरवरी 1979 को तेहरान लौटे।
हवाई अड्डे पर लाखों लोगों ने उनका ऐतिहासिक स्वागत किया। मार्च 1979 के अंत में एक जनमत संग्रह हुआ, जहाँ 98% से अधिक लोगों ने ईरान को एक 'इस्लामी गणराज्य' बनाने के पक्ष में वोट दिया। 1 अप्रैल 1979 को आधिकारिक तौर पर इसकी घोषणा की गई। फिर दिसंबर 1979 में एक नया संविधान बना जिसमे 'वेलायत-ए-फकीह' (Velayat-e Faqih) का सिद्धांत लागू किया गया। इसके तहत खमैनी ईरान (Iran) के पहले सुप्रीम लीडर (सर्वोच्च नेता) बने।
बता दें कि 1989 में आयतुल्लाह खमैनी की मृत्यु के बाद अली ख़ामेनेई (Ali Khamenei) को ईरान (Iran) का दूसरा सर्वोच्च नेता (Supreme Leader) चुना गया था। बताया जाता है कि वो खमैनी के शिष्य के साथ उनके बेहद करीबी थे। यही कारण है कि अब तक वो 86 वर्ष की उम्र में भी ईरान के सुप्रीम लीडर बने हुए हैं।
अब तक हमने समझा कि ईरान (Iran) में किन कारणों से आंदोलन हो रहे हैं। शाह वंश का मामला क्या है लेकिन यहाँ एक और मामला है जिसके बारे में कहा जा सकता है कि इसमें बाहरी तत्व भी शामिल हो सकते हैं। इसमें अमेरिका के आलावा शायद ही कोई हो सकता है। 3 जनवरी 2026 को अमेरिका ने वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के साथ जो किया, उसके बाद से ही खामनेई को इस बात का अंदाजा है कि ऐसा ही कुछ अमेरिका उनके साथ या उनके देश के साथ कर सकता है।
इसके लिए ईरान (Iran) की 'डिफेंस काउंसिल' ने 6 जनवरी को घोषणा कर दी कि वहां के कानून में एक बदलाव हुआ है, जिसके तहत अब ईरान हमले का इंतजार नहीं करेगा। अगर उसे पता चल गया कि कोई देश उसपर हमला करने वाला है, उससे पहले ही वो उसपर हमला कर देगा।
ईरान (Iran) का ये इशारा साफ़ अमेरिका की ओर था क्योंकि जबसे ये आंदोलन चल रहा है, तब से डोनाल्ड ट्रंप यह कह रहे हैं कि वो ईरान को खामेनेई से आज़ादी दिलवाने को तैयार हैं। इससे पहले भी ट्रंप ने चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर प्रदर्शनकारियों का खून बहाया जाता है तो उसका अंजाम बुरा होगा और किसी भी देश में घुसने के लिए अमेरिका को मौका चाहिए और ये मौका उन्हें दिख रहा है। हालांकि, यहाँ सवाल यह भी है कि अमेरिका क्यों ईरान पर कंट्रोल चाहता है?
इसके तीन कारण भी हैं। पहला ये कि ईरान के न्यूक्लियर कोड्स पर कब्जा करना ताकि वो हमास और हज़्बुल्लाह जैसे आतंकी संगठन के हाथ में ना चला जाए। आपको यह पता होगा कि ईरान न्यूक्लियर बम बनाने की पूरी कोशिश कर रहा है और यही कारण है कि पिछले साल जून 2025 में ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों पर अमेरिका और इजराइल ने भीषण बमबारी की थी।
दूसरा यह कि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर कब्जा करना क्योंकि यहाँ से ईरान का समुद्री तेल व्यापर होता है। ये ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाला एक संकरा समुद्री रास्ता है। अमेरिका चाहता है कि वो एक ऐसे व्यक्ति को ईरान में बिठाए, जो उनके इशारे पर काम करे और तेल उनके हवाले कर दे। ये काम रेजा पहलवी के जरिये ट्रंप करवाना चाहते हैं।
तीसरा यह कि इजराइल के इर्द गिर्द जो "रिंग ऑफ फायर" (Ring of Fire) ईरान (Iran) द्वारा बनाई गई है, उसे खत्म करना। ये एक रणनीतिक सैन्य घेराबंदी है, जिसमे गाजा पट्टी (दक्षिण-पश्चिम), लेबनान (उत्तर), सीरिया (उत्तर-पूर्व), यमन (दक्षिण) और इराक और वेस्ट बैंक (पूर्व) शामिल हैं। अमेरिका इजराइल को इससे मुक्त करना चाहता है।
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ईरान (Iran) में जिस तरह से हालत बने हुए हैं, उसको लेकर यह कयास लगाए जा रहे हैं कि खामनेई (Ali Khamenei) कहीं रूस ना चले जाएं, क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि उनका झुकाव रूस की तरफ ज्यादा है और यही चीज अमेरिका को पसंद नहीं है। पिछले साल 17 जनवरी 2025 को पुतिन और राष्ट्रपति मसूद पेजेशक्यान के बीच 20 वर्षों के लिए रक्षा, ऊर्जा और व्यापार के लिए संधि हुई थी।
वहीं, जनवरी 2026 में ईरान, रूस और चीन ने दक्षिण अफ्रीका के पास हिंद महासागर में "ब्रिक्स प्लस" (BRICS Plus) नौसैनिक अभ्यास आयोजित किया है। इसके साथ ही डॉलर पर निर्भरता खत्म करने के लिए दोनों देश आपस में 80% से अधिक व्यापार को रियाल और रूबल में कर रहे हैं जबकि रूस और ईरान मिलकर एक नया व्यापार मार्ग (INSTC) बना रहे हैं, जो भारत को रूस से जोड़ेगा और पश्चिमी समुद्री मार्गों का विकल्प प्रदान भी करेगा।
ऐसे में इन सारी बातों को ध्यान में रखकर ये कहा जाने लगा था कि खामनेई (Ali Khamenei) रूस में शरण ले सकते हैं। खबर थी कि ख़ामेनेई अपने करीब 20 वफादार सहयोगियों और परिवार के सदस्यों 'बेटे मोजतबा सहित' ईरान से निकलने का प्लान बना चुके हैं लेकिन 9 जनवरी को उनका एक बयान सामने आया, जिसमे उन्होंने कहा कि वे "पीछे नहीं हटेंगे"। मतलब साफ़ है खामनेई ईरान छोड़कर नहीं जा रहे हैं।
तो ये थी ईरान (Iran) में चल रहे आंदोलन की पूरी कहानी। 'अंकल सैम' यानी अमेरिका ईरान के साथ दो-दो हाथ करने के मूड में पूरी तरह है। राष्ट्रपति ट्रंप (Donald Trump) के हौसले बुलंद हैं क्योंकि जिस तरह से उन्होंने वेनेज़ुएला में मादुरो को उठा लिया, ग्रीनलैंड हथियाने की बात कर रहे हैं। इससे साफ़ है कि वो यही नहीं रुकेंगे।
ईरान (Iran) के लिए भी उनका प्लान तैयार ही होगा। अब वो कब अपने मकसद को अंजाम देंगे, इसके लिए दुनिया को अभी इन्तजार करना होगा क्योंकि ईरान में सरकार और जनता की लड़ाई में अमेरिका सरपंच बनकर फायदा उठाने की पूरी कोशिश करेगा।