ऑटो चलाने से लेकर अपनी एयरलाइन शुरू करने तक, श्रवण कुमार की कहानी मेहनत और हौसले की मिसाल है।
देश में जहां कई एयरलाइंस बंद हो रही हैं, वहीं शंख एयर एक नई उम्मीद बनकर सामने आई है।
बिना प्रमाणित बायोग्राफी और सिर्फ 1–2 साल पुरानी कंपनी होने के कारण शंख एयर पर भरोसा करने को लेकर लोगों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक।
हवाई यात्रा किसी व्यक्ति के लिए परिवहन का एक सबसे सुलभ और प्रभावी माध्यम है, जिसकी मदद से लोग कम समय में और बिना अधिक थकान के किसी भी कार्यक्रम, काम या ज़रूरी स्थान पर समय पर पहुँच सकते हैं। भारत में हवाई यात्रा अब सिर्फ अमीरों तक सीमित नहीं रही। बीते एक दशक में आम आदमी भी फ्लाइट से सफर करने लगा है। लेकिन इसके बावजूद भारत का एविएशन (Aviation) सेक्टर हमेशा स्थिर नहीं रहा है। आज देश में सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो (IndiGo) है, जो बाजार के बड़े हिस्से पर कब्जा किए हुए है। इसके अलावा एयर इंडिया (Air India-अब टाटा ग्रुप के पास), विस्तारा (Vistara), अकासा एयर (Akasa Air) जैसी एयरलाइंस भी मौजूद हैं।
लेकिन अगर पीछे देखें तो जेट एयरवेज (Jet Airways), किंगफिशर एयरलाइन्स (Kingfisher Airlines) और हाल ही में गो फर्स्ट (Go First) जैसी एयरलाइंस या तो बंद हो चुकी हैं या गंभीर संकट में आकर उड़ानें रोक चुकी हैं। इन सभी एयरलाइन के बंद होने का कारण एक सा ही रहा है —भारी कर्ज, महंगे ईंधन के दाम, खराब मैनेजमेंट और लगातार घाटा। कई बार यात्रियों को बिना सूचना के फ्लाइट कैंसिल होने का सामना करना पड़ा, इतना ही नहीं टिकट के पैसे फंस गए और यात्रियों का भरोसा डगमगा गया। यही कारण है कि भारत में नई एयरलाइन का नाम सुनते ही लोग उत्साह के साथ-साथ शंका भी करते हैं।
इसी अस्थिर माहौल के बीच भारत सरकार ने कुछ नई एयरलाइंस को मंजूरी दी है। हाल के समय में अलहिंदी एयर (Alhind Air) और शंख एयर (Shankh Air) को उड़ान शुरू करने की अनुमति (NOC) मिली है। इसके अलावा एक और नई क्षेत्रीय एयरलाइन स्टार एयर (Star Air) भी धीरे-धीरे अपनी पकड़ बना रही है। सरकार का मकसद साफ है—उड़ान (UDAN - Ude Desh Ka Aam Nagrik) जैसी योजनाओं के जरिए छोटे शहरों को हवाई नेटवर्क से जोड़ना और प्रतिस्पर्धा बढ़ाना, ताकि टिकट सस्ते हों और विकल्प ज्यादा मिलें।
शंख एयरलाइन और इसके मालिक श्रवण कुमार विश्वकर्मा
इन नई एयरलाइंस में सबसे ज्यादा चर्चा शंख एयर (Shankh Air) को लेकर हो रही है, और इसकी वजह सिर्फ एक और एयरलाइन का आना नहीं है, बल्कि इसके मालिक की कहानी है। शंख एयर के मालिक श्रवण कुमार विश्वकर्मा का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लगता। उत्तर प्रदेश के कानपुर से ताल्लुक रखने वाले श्रवण कुमार ने जिंदगी की शुरुआत बेहद साधारण हालात में की। एक समय ऐसा भी था जब वह ऑटो और टेम्पो चलाकर घर का खर्च चलाते थे। रोज़ की कमाई और जरूरतें—यही उनकी दुनिया थी। लेकिन उन्होंने यहीं रुक जाना स्वीकार नहीं किया।
धीरे-धीरे उन्होंने छोटे कारोबार शुरू किए, कई बार नुकसान भी हुआ, लेकिन हार नहीं मानी। ट्रांसपोर्ट, सीमेंट, स्टील और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में काम करते-करते उन्होंने अपना नेटवर्क और पूंजी को मजबूत किया। आज वही शख्स, जो कभी ज़मीन पर ऑटो चलाता था, अब लोगों को आसमान में उड़ाने की नीति और योजना बना रहा है।
शंख एयर को उत्तर प्रदेश की पहली घरेलू एयरलाइन के तौर पर पेश किया जा रहा है। कंपनी का दावा है कि उसका फोकस छोटे शहरों, धार्मिक और क्षेत्रीय रूट्स पर होगा, ताकि आम लोगों को किफायती हवाई सफर मिल सके। नाम भी प्रतीकात्मक है—“शंख”, जो भारतीय संस्कृति में शुभ और नई शुरुआत का संकेत माना जाता है। लेकिन सवाल यही है कि क्या सिर्फ एक प्रेरणादायक कहानी किसी एयरलाइन की सफलता की गारंटी बन सकती है?
यहीं से इस पूरी कहानी की आलोचनात्मक जांच जरूरी हो जाती है। भारत में एयरलाइन चलाना आसान काम नहीं है। यह पूंजी-प्रधान उद्योग है, जहां शुरुआती निवेश ही हजारों करोड़ में होता है। जहाजों की लीज़, ईंधन, मेंटेनेंस, पायलट और क्रू की सैलरी, एयरपोर्ट चार्ज—हर कदम पर खर्च है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या शंख एयर लंबे समय तक इस दबाव को झेल पाएगी? क्या यह सिर्फ शुरुआती उत्साह तक सीमित रह जाएगी, या वाकई एक मजबूत विकल्प बनकर उभरेगी?
आलोचनाएँ
गौर करने की बात है की शंख एयर के मालिक श्रवण कुमार विश्वकर्मा का कोई सत्यापित (Verified) और विस्तृत इंटरव्यू सामने नहीं आया है, न ही उनकी कोई आधिकारिक या प्रमाणित जीवनी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है। दूसरी ओर, कंपनी खुद भी बेहद नई है—महज़ दो से तीन साल पुरानी—और अभी तक उसने व्यावसायिक उड़ानें शुरू नहीं की हैं। ऐसे में आलोचक मानते हैं कि इतनी कम उम्र की कंपनी, बिना किसी ठोस पब्लिक रिकॉर्ड और पारदर्शी प्रोफाइल के, यात्रियों से तुरंत भरोसा कैसे मांगेगी, यह एक बड़ा सवाल है। भरोसा बनाने के लिए सिर्फ दावे नहीं, बल्कि समय, प्रदर्शन और स्पष्ट जानकारी ज़रूरी होती है।
यात्रियों के नजरिए से भरोसा सबसे बड़ा मुद्दा है। लोग तभी टिकट बुक करते हैं जब उन्हें लगे कि फ्लाइट समय पर चलेगी, कैंसिल नहीं होगी और पैसा सुरक्षित है। गो फर्स्ट (Go First) जैसे मामलों के बाद यात्रियों का भरोसा पहले ही हिला हुआ है। ऐसे में नई एयरलाइन को खुद को साबित करने में समय लगेगा। शुरुआत में सस्ती टिकट देना आसान है, लेकिन लगातार गुणवत्ता और भरोसे को बनाए रखना असली चुनौती है।
कई लोगों ने इस नई एयरलाइन को लेकर सवाल और आपत्तियाँ भी उठाई हैं। आलोचकों का कहना है कि सरकार ने इतनी जल्दी नई-नई बनी एयरलाइन को अनुमति कैसे दे दी, जबकि भारत में पहले ही सुरक्षा (Safety) से जुड़े कई मामले सामने आ चुके हैं। उनका सवाल है कि यात्रियों की सुरक्षा को लेकर क्या पुख़्ता इंतज़ाम किए गए हैं, क्या पायलटों की ट्रेनिंग, विमानों की मेंटेनेंस और टेक्निकल जांच (Technical Test) पूरी तरह मानकों पर खरी उतरती है या नहीं। लोगों को यह भी डर है कि कहीं ऐसा न हो कि जल्दबाज़ी में मंजूरी देकर बाद में यात्रियों की जान जोखिम में डाल दी जाए। भले ही सरकार यह कहे कि सभी नियम और प्रक्रियाएँ पूरी करने के बाद ही स्वीकृति दी गई है, लेकिन आलोचकों के मुताबिक सिर्फ काग़ज़ी मंजूरी काफी नहीं होती, ज़मीनी स्तर पर सुरक्षा का भरोसा बनना ज़रूरी है, वरना नई एयरलाइन होने के नाते लोगों का विश्वास जीतना आसान नहीं होगा।
निष्कर्ष
फिर भी, नई एयरलाइन को शक की नजर से देखना भी ठीक नहीं होगा। अगर शंख एयर मजबूत फाइनेंशियल प्लानिंग, पारदर्शी मैनेजमेंट और सीमित लेकिन व्यावहारिक रूट्स के साथ आगे बढ़ती है, तो उसके लिए जगह बन सकती है। भारत जैसे बड़े देश में अभी भी कई ऐसे शहर और इलाके हैं, जहां हवाई कनेक्टिविटी बेहद कमजोर है। अगर शंख एयर वहां ईमानदारी से काम करती है, तो यह सिर्फ एक बिजनेस नहीं, बल्कि क्षेत्रीय विकास का साधन भी बन सकती है।
अंत में यही कहा जा सकता है कि शंख एयर (Shankh Air) एक उम्मीद है—उस भारत की, जहां एक टेम्पो ड्राइवर भी एयरलाइन का मालिक बनने का सपना देख सकता है और उसे हकीकत में बदल सकता है। लेकिन सपना और सफलता के बीच का रास्ता कठिन होता है। अब यह आने वाला समय बताएगा कि शंख एयर सिर्फ एक प्रेरक कहानी बनकर रह जाती है या भारतीय एविएशन के आसमान में सच में अपनी मजबूत उड़ान भर पाती है।
(PO)