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राजनीति

राजनीतिक पालने में इधर से उधर उछल-कूद करते नेता लोग!

चुनाव आते-आते नेताओं में बगावती तेवर तेज होने शुरू हो गए हैं। एक तरफ कैप्टेन और सिध्दू वहीं दूसरी तरफ गेहलोत और पायलट।

(NewsGramHindi, साभार: Wikimedia Commons)

राजनीति में एक दल से दूसरे दल में जाने का कमोवेश चलता रहता है। यदि नेताओं को चुनाव के दौरान अपनी पार्टी की हार दिखाई देती है तो वह इस पाले से उस पाले में कूद जाते हैं, और यदि नेताओं की बात नहीं मानी जाती है तो वह भी बगावती तेवर दिखाने में पीछे नहीं हटते। नवीनतम उदाहरण हैं, पश्चिम बंगाल चुनाव के समय तृणमूल से भाजपा में आए शुभेंदु अधिकारी का। जिन्होंने भाजपा के टिकट से चुनाव लड़ा और तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी को हराया।

बहरहाल, वर्तमान में उत्तर प्रदेश में विधान-सभा चुनाव निकट आ रहे हैं और दल-बदल का खेल शुरू भी हो गया है। कांग्रेस पार्टी और एक वक्त पर राहुल गाँधी के साथी नेता जितिन प्रसाद ने कांग्रेस का दामन छोड़ भाजपा का हाथ थाम लिया है। जितिन प्रसाद ने दो टूक कहा कि पार्टी आलाकमान उनकी बात को दरकिनार कर रही थी, और उनके ओहदे को गंभीरता से नहीं ले रही थी जस वजह से उन्होंने यह फैसला लिया। जितिन प्रसाद उत्तर-प्रदेश में बड़े ब्राह्मण चेहरे हैं, और इस बात का फायदा भाजपा यूपी चुनाव में जरूर उठाने वाली है। आखिर कोई भी राजनीतिक दल कितना भी विकास पर चुनाव की बात कहे, उन्हें जीतने के लिए जाति और धर्म का सहारा लेना ही पड़ता है।


पंजाब की गहमा-गहमी

यह तो थी भाजपा की बात, किन्तु कांग्रेस खेमे में कुछ और ही खिचड़ी पक रही है। एक तरफ पंजाब में गहमा-गहमी वहीं दूसरी तरफ राजस्थान में बगावती चिंगारी को हल्का धीमा कर दिया गया है। पहले बात करें पंजाब की तो, पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के खिलाफ नवजोत सिंह सिध्दू ने अलग ही बगावती सुर बुलंद किया हुआ है, जिसके बाद राज्य के सभी विधायकों को दिल्ली बुला कर उनसे बात की गई। अगले साल यानि 2022 पंजाब में भी विधानसभा चुनाव होने जा रहा है। अब सिध्दू अपना वर्चस्व और मौजूदगी दर्ज कराने के लिए बगावती अखाड़े में कूद पड़े हैं।

आपको बता दें की नवजोत सिंह सिध्दू वर्ष 2017 में भाजपा से कांग्रेस में आए थे जिसके बाद उन्होंने 2017 में ही पंजाब विधानसभा चुनाव में अमृतसर ‘पूर्व’ सीट से जीतकर अपनी मौजूदगी दर्ज की थी। किन्तु इसके बाद से ही मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और सिध्दू के बीच में खटपट की खबरें आती रही हैं, जो चुनाव आते-आते और तेज हो गई है। अब पंजाब में कैप्टेन और सिध्दू के बीच जमकर पोस्टर-वॉर चल रहे हैं। ‘कैप्टेन कौन’ के पोस्टर के जवाब में ‘कैप्टेन एक ही होता है’ जैसे पोस्टर पंजाब की सड़कों पर देखे जा रहे हैं। आखिर यह राजनीतिक गर्मी चुनाव तक रहने वाली है या कांग्रेस आलाकमान इस विषय पर नतीजे निकालने के मूड में है या नहीं? यह तो समय बताएगा।

राजस्थान में भी गर्मी कम नहीं हुई है!

सचिन पायलट एंड अशोक गेहलोत।(Wikimedia Commons)

राजस्थान की राजनीति की लौ लालटेन में जल रही बत्ती के समान है, कभी बगावती चिंगारी उठने लगती है तो कभी अंदर ही अंदर जलती रहती है। जब-जब पुराने साथी भाजपा का हाथ थामते हैं तब-तब पायलट को बगावती तेवर दिखाने का हौसला मिलता और फिर कुछ दिन सुर्खियों में बने रहने के बाद वह तेवर सुस्त पड़ने लगता है। हाल ही में कांग्रेस पार्टी के पुराने सदस्यों में से एक सचिन पायलट और उनके गुट के नेताओं ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और राजस्थान कांग्रेस पर उनकी शर्तें न मानने का आरोप लगाया।

इससे पहले भी साल 2020 में सचिन पायलट ने राजस्थान कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोला था। उस समय पायलट और गहलोत के बीच हुई तीखी बयानबाजी को सबने देखा। मुख्यमंत्री गहलोत ने मीडिया के सामने तो पायलट को ‘निकम्मा नाकारा’ तक कह दिया था। इस बगावती लौ को मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार प्रियंका गांधी वाड्रा ने सचिन पायलट से बात कर, एक साल के लिए भुजा दिया था। किन्तु, उस लौ को जितिन प्रसाद के जाने से 2021 में फिर चिंगारी मिली और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस बार भी 2020 की तरह प्रियंका गांधी वाड्रा ने ही सचिन पायलट को फोन कर डिजास्टर मैनेजमेंट का काम किया।

यह भी पढ़ें: कोरोना से उत्पन्न हुए रोष को चुनाव से पहले शांत कराने में जुटी भाजपा

अब सोचने की बात यह है कि पायलट की तल्खियां किसी साथी के पार्टी छोड़ने के बाद ही क्यों जागती हैं? पिछले साल ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ भाजपा का हाथ थामा तब पायलट कांग्रेस से नाराज हुए। अब जब जितिन प्रसाद ने भाजपा का हाथ थामा तब भी सचिन पायलट के तेवर बदले। बहरहाल मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अशोक गहलोत पर फोन टैपिंग करवाने के आरोप भी लग रहे हैं और पहले भी उनपर सचिन पायलट और उनके समर्थकों पर फोन टैपिंग के जरिए निगरानी रखने का आरोप लगा था। भाजपा ने इस फोन टैपिंग को ‘राजस्थान में अघोषित आपातकाल’ बताया है।

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भारत में आधुनिक लिबरल संस्कृति ने, हिन्दुओं को कई गुटों में बाँट दिया है। कोई इस धर्म को पार्टी से जोड़ कर देखता है या किसी को यह धर्म ढोंग से भरा हुआ महसूस होता है। किन्तु सत्य क्या है, उससे यह सभी लिब्रलधारी कोसों दूर हैं। यह सभी उस भेड़चाल का हिस्सा बन चुके हैं जहाँ आसिफ की पिटाई का सिक्का देशभर में उछाला जाता है, किन्तु बांग्लादेश में हो रहे हिन्दुओं के नरसंहार को, उनके पुराने कर्मों का परिणाम बताकर अनदेखा कर दिया जाता है। यह वह लोग है जो इस्लामिक आतंकवादियों पर यह कहते हुए पल्ला झाड़ लेते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन जब आतंकी बुरहान वाणी को सुरक्षा बलों द्वारा ढेर किया जाता है तो यही लोग उसे शहीद और मासूम बताते हैं। ऐसे ही विषयों पर मुखर होकर अपनी बात कहने और लिखने वाली जर्मन लेखिका मारिया वर्थ(Maria Wirth) ने साल 2015 में लिखे अपने ब्लॉग में इस्लाम एवं ईसाई धर्म पर प्रश्न उठाते हुए लिखा था कि "OF COURSE HINDUS WON'T BE THROWN INTO HELL", और इसके पीछे कई रोचक कारण भी बताए थे जिनपर ध्यान केंद्रित करना आज महत्वपूर्ण है।

कुरान, गैर-इस्लामियों के विषय में क्या कहता है,

मारिया वर्थ, लम्बे समय से हिंदुत्व एवं सनातन धर्म से जुड़े तथ्यों को लिखती आई हैं, लेकिन 2015 में लिखे एक आलेख में उन्होंने ईसाई एवं इस्लाम से जुड़े कुछ ऐसे तथ्यों को उजागर किया जिसे जानना हम सबके के लिए आवश्यक है। इसी लेख में मारिया ने हिन्दुओं के साथ बौद्ध एवं अन्य धर्मों के लोगों को संयुक्त राष्ट्र में ईसाई एवं इस्लाम धर्म के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी और इसके पीछे उन्होंने यह कारण बताया कि ईसाई एवं इस्लाम दोनों ही धर्मों के बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि गैर-ईसाई या गैर-मुस्लिम नर्क की आग में जलेंगे। इसका प्रमाण देते गए उन्होंने क़ुरान की वह आयत साझा की जिसमें साफ-साफ लिखा गया है कि " जो काफिर होंगे, उनके लिये आग के कपड़े काटे जाएंगे, और उनके सिरों पर उबलता हुआ तेल डाला जाएगा। जिस से जो कुछ उनके पेट में है, और उनकी खाल दोनों एक साथ पिघल जाएंगे; और उन्हें लोहे की छड़ों से जकड़ा जाएगा।" (कुरान 22:19-22)

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(NewsGram Hindi)

देश में धर्मांतरण का मुद्दा नया नहीं है, लेकिन जिन-जिन जगहों पर हाल के कुछ समय में धर्मांतरण बढ़े हैं वह क्षेत्र नए हैं। आपको बता दें की पंजाब प्रान्त में धर्मांतरण या धर्म-परिवर्तन का काला खेल रफ्तार पकड़ चुका है और अपने राज्य में इस रफ्तार पर लगाम लगाने वाली सरकार भी धर्मांतरणकारियों का साथ देती दिखाई दे रही है। आपको यह जानकर हैरानी होगी, कि पंजाब में धर्मांतरण दुगनी या तिगुनी रफ्तार पर नहीं बल्कि चौगनी रफ्तार पर चल रही है। जिस वजह से पंजाब में हो रहे अंधाधुंध धर्म-परिवर्तन पर चिंता होना स्वाभाविक हो गया है।

गत वर्ष 2020 में कांग्रेस नेता और पंजाब में कई समय से सुर्खियों में रहे नवजोत सिंह सिद्धु ने दिसम्बर महीने में हुए एक ईसाई कार्यक्रम में, यहाँ तक कह दिया था कि 'जो आपकी(ईसाईयों) तरफ आँख उठाकर देखेगा उसकी हम ऑंखें निकाल लेंगे' जो इस बात पर इंगित करता है कि कैसे सत्ता में बैठी राजनीतिक पार्टी पंजाब में हो रहे धर्म परिवर्तन को रोकने के बजाय उसे राजनीतिक शह दे रही है। आपको यह भी बता दें कि 3.5 करोड़ की आबादी वाले पंजाब राज्य में लगभग 33 लाख लोग ईसाई धर्म को मानने वाले रह रहे हैं। पंजाब के कई क्षेत्रों में छोटे-छोटे चर्च का निर्माण हो रहा है और कई जगह ऐसे चर्च मौजूद भी हैं।

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(NewsGram Hindi)

अगले वर्ष भारत एक बार फिर सबसे बड़े राजनीतिक धमाचौकड़ी का साक्षी बनने जा रहा है। जिसकी तैयारी में अभी से राजनीतिक दल अपना खून पसीना एक कर रहे हैं। यह चुनावी बिगुल फूंका गया है राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, जहाँ जातीय समीकरण, विकास और धर्म पर खूब हो-हल्ला मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश चुनाव में जहाँ एक तरफ भाजपा हिन्दुओं को अपने पाले करने में जुटी वहीं विपक्ष ब्राह्मणों को अपनी तरफ करने के प्रयास में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। आने वाला उत्तर प्रदेश चुनाव क्या मोड़ लेगा इसका उत्तर तो समय बताएगा, किन्तु ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

आपको बता दें कि वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सभी पार्टियों ने खूब खून-पसीना बहाया था, किन्तु सफलता का परचम भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटों को जीत कर लहराया था। वहीं अन्य पार्टियाँ 50 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। भाजपा की इस जादुई जीत का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के धुआँधार रैली और मुख्यमंत्री चेहरे को जाहिर न करने को गया। किन्तु उत्तर-प्रदेश 2022 का आगामी चुनाव सत्ता पक्ष के चुनौतियों से भरा हो सकता है। वह इसलिए क्योंकि सभी राजनीतिक पार्टी अब धर्म एवं जाति की राजनीति के अखाड़े में कूद गए हैं। इसमें सबसे आगे हैं यूपी में राजनीतिक बसेरा ढूंढ रहे एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन औवेसी! जो खुलकर रैलियों में और टीवी पर यह कहते हुए सुनाई दे जाते हैं कि वह प्रदेश के मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए उत्तर प्रदेश आए हैं।

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