भारतीय राजनीति के लौह पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी

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अटल जी के जयंती पर उन्हें सादर नमन। (Newsgram)

अटल बिहारी वाजपेयी(Atal Bihari Vajpayee) का ज़िक्र भारतीय राजनीति(Indian Politics) में जब भी आता है तो 1996 में लोकसभा में उनके द्वारा कहे गए शब्द सबसे पहले याद आते हैं, “सरकारें आएंगी जाएंगी, पार्टियां बनेंगी-बिगड़ेंगी परन्तु ये देश चलते रहना चाहिए।” अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति की ऐसी शख्सियत थे जिनका ना तो किसी ने खुलकर विरोध किया न ही खुलकर अपमान। वे खुलकर विपक्षी नेताओं की सराहना करते थे जितना की वे खुलकर अपनी सरकार के मंत्रियों की आलोचना। उनका शायद ही भारतीय राजनीति में कोई प्रबल विरोधी रहा होगा। आज भाजपा जिस मुकाम पर है उसमे वाजपेयी जी की अहम भूमिका है।

कौन थे अटल बिहारी वाजपेयी ?

अटल बिहारी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर(Gwalior) में हुआ था। उनके पिता श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी(Krishna Bihari Vajpayee) एक कवि थे। उन्होंने ग्वालियर में विक्टोरिया कॉलेज (वर्तमान में लक्ष्मी बाई कॉलेज के रूप में जाना जाता है) में अपनी शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने कानपुर के डीएवी कॉलेज से राजनीति विज्ञान में मास्टर ऑफ आर्ट्स की डिग्री ली। उनके पास बहुआयामी बुद्धि थी और उनके व्यक्तित्व में नेतृत्व, वक्ता और कुशल वाद-विवाद जैसे तमाम गुण मौजूद थे। उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष में खुलकर भाग लिया। 1942 में और स्वतंत्रता के बाद 1975 से 1977 की अवधि के दौरान वे पुलिस हिरासत में जेल गए।

एक सक्षम और विशेषज्ञ सांसद अटल बिहारी वाजपेयी को संसदीय परंपरा, कर्तव्यों और गतिविधियों का लंबा अनुभव है। वह 1966 से राज्य सभा के समय-समय पर कई समितियों के अध्यक्ष रहे, जैसे कि 1967-70 और 1991-93 के दौरान लोक लेखा समिति और विदेशी मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष के रूप में सक्रिय नेतृत्व की अपनी छाप छोड़ी।

अटल जी का राजनीतिक सफर

अटल बिहारी वाजपेयी हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने खुद को भारतीय गणराज्य के प्रति वफादार साबित किया। वह भारत के पहले नागरिक थे जिन्होंने पहली बार यूएनओ में भारतीय विदेश मंत्री के रूप में हिंदी में अपने विचार व्यक्त किए।

भारतीय जनसंघ(Bhartiye Jansangh) के संस्थापक सदस्य के रूप में, वाजपेयी ने संसद में जनसंघ के संसदीय दल का मार्गदर्शन किया। आपातकाल(Emergency) के दौरान, श्री जय प्रकाश नारायण के आह्वान पर, भारतीय जनसंघ पार्टी का जनता पार्टी में विलय हो गया और 1977 में मोरारजी देसाई भारत के प्रधानमंत्री बने। अटल जी ने सफलतापूर्वक में विदेश मंत्री(Foreign Minister) का दायित्व संभाला। जनता पार्टी के विभाजन के बाद भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई। वाजपेयी 1980 से 1986 तक भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बने। श् वाजपेयी ने भाजपा के संसदीय दल के नेता और विपक्ष के नेता के रूप में भी अपना विशेष स्थान बनाए रखा।

साहित्य और पत्रकारिता अटल बिहारी वाजपेयी के पसंदीदा विषय थे। अपनी आस्था के अनुसार, उन्होंने पांचजन्य, राष्ट्र धर्म के संपादक के रूप में अपने हिस्से की स्वतंत्र सोच को साबित किया। दैनिक वीर अर्जुन और दैनिक स्वदेश उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है। लोकसभा में अटलजी द्वारा कही गई कुछ प्रमुख कवितायेँ, भारतीय विदेश नीति के नए आयाम, जनसांख्य और मुसलमान, संसद में तीन दशक और संसद में चार दशक आदि।

वाजपेयी को 1992 में “पदम विभूषण” और 1993 में कानपुर विश्वविद्यालय द्वारा “डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी” और सर्वश्रेष्ठ सांसद होने के लिए 1994 में लोकमान्य तिलक और पंडित गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

1996 में उनकी सरकार सिर्फ 13 दिन चली, 1998 में प्रधानमंत्री के रूप में उनका दूसरा कार्यकाल 13 महीने का था। उन्होंने 13 अक्टूबर 1999 को तीसरी बार शपथ ली। उनकी सरकार ने भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने में बड़ी कूटनीतिक सफलता हासिल की और इसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ गया। आर्थिक सुधारों को गति देने, व्यापक चुनावी सुधारों को प्राथमिकता देने, वित्तीय क्षेत्र, जल, स्वास्थ्य, आवास, शिक्षा और ग्रामीण सड़कों के लिए नए कानून बनाने की उनकी प्रतिबद्धता वास्तव में एक समर्पित और आधुनिक प्रधानमंत्री के सही संकेत हैं जो जगह देने के इच्छुक हैं एक अलग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत। वास्तव में 21वीं सदी में भारत की प्रगति श्री अटल बिहारी वाजपेयी के कुशल नेतृत्व में आश्चर्यजनक होगी।

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अटल जी आज भले ही हमारे बीच नहीं है लेकिन उन्होंने हर भारतीय के दिल में एक विशेष जगह बना ली है।

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