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ओपिनियन

Best of 2020 : समाज और राजनीति का आईना रहीं इस साल की यह फिल्में और वेब सीरीज़

इस साल ऐसी कई फिल्में और वेब सीरीज़ ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर देखने को मिलीं जो समाज और राजनीति का आईना रहीं। इन्हीं कहानियों ने थोड़ा ही सही पर हमें इस मुश्किल समय में संभाले रखा।

(Unsplash)

साल 2020 ने लोगों से बहुत कुछ छीना है मगर यह कहना गलत नहीं होगा कि इस साल हम लोगों को हिंदी सिनेमा ने बहुत से ऐसे किरदार दिए हैं, जिन्हें आने वाले कई सालों तक याद किया जाएगा। इस साल ऐसी कई फिल्में और वेब सीरीज़ ओटीटी प्लेटफॉर्म्स (OTT Platforms) पर देखने को मिलीं जो समाज और राजनीति का आईना रहीं। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स (OTT Platforms) पर मौजूद उन फिल्मों और वेब सीरीज़ का हमारी Best of 2020 लिस्ट में ना होना ज़रा बेइंसाफी होगी।

स्क्रीन पर फिल्माए उन किरदारों के चश्मे से समाज और राजनीति के ‘सच’ को देखा जा सकता है। ऐसा सच जो आपके और मेरे बीच मौजूद होते हुए भी हमसे अनजान है।


पंचायत (अमेज़न प्राइम)

निर्देशक – दीपक कुमार मिश्रा

‘पंचायत’ (Panchayat) एक ऐसे इंजीनियर की कहानी है जो शहर में अच्छी नौकरी ना मिलने के दुख से उत्तर प्रदेश के एक गांव ‘फुलेरा’ में पंचायत सचिव के रूप में आए ऑफर को ना चाहते हुए भी मंज़ूर कर लेता है। शहर के शोर गुल में बड़ा हुआ जितेंद्र जिस तरह से ग्रामीण भारत में अनेक परेशानियों का सामना करता है उसे देख कर हंसी भी आती है और बातों बातों में हमें ग्रामीण इलाकों के छोटे मोटे सियासी खेल भी समझ आते हैं।

ग्रामीण भारत की संस्कृति और वहां रह रहे लोगों के भाव-विचारों को पंचायत के निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा ने काफी करीब से दिखाया है। ‘पंचायत’ (Panchayat) वेब सीरीज़ में, गांव इलाकों में चलते आ रहे ‘प्रधान-पति’ प्रथा पर रौशनी डाली गई है।

पंचायत

कोटा फैक्ट्री के फिज़िक्स टीचर के किरदार से प्रख्यात जितेंद्र कुमार (पंचायत सचिव) का अभिनय ‘पंचायत’ के अभिषेक त्रिपाठी के रूप में भी सराहनीय रहा। रघुबीर यादव अपने प्रधान-पति के रूप में एकदम फिट बैठे हैं। नीना गुप्ता का किरदार भी वेब सीरीज़ में जान डाल देता है। अन्य साथी कलाकरों के अभिनय में भी देहात की खुशबू महसूस करने को मिलती है।

अगर आप सिंपल यट इफेक्टिव तरह की कहानियों के शौक़ीन हैं तो मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि अमेज़न प्राइम (Amazon Prime) पर रिलीज़ हुई ‘पंचायत’ (Panchayat) वेब सीरीज़ आपको निराश नहीं करेगी।

यह भी पढ़ें – ‘रील लाइफ’ हीरो जो 2020 में बने ‘रियल लाइफ’ हीरो

पाताल लोक (अमेज़न प्राइम)

निर्देशक – अविनाश अरुण और प्रोसित राय

क्या आपकी ज़बान पर भी इस साल हथौड़ा त्यागी (अभिषेक बनर्जी) और हाथी राम (जयदीप अहलावत) का नाम चढ़ा हुआ था। क्या आप भी धरती के नीचे समाई पाताल लोक की बातें कर रहे थे। या मुमकिन है कि आप इस तरह के नाम और ऐसी बातें अपने दोस्तों से सुन रहे हों? मसअला जो भी हो, किन्तु आपने अमेज़न प्राइम (Amazon Prime) पर रिलीज़ हुई क्राइम थ्रिलर वेब सीरीज़ ‘पाताल लोक’ (Paatal Lok) के बारे में ज़रूर सुना होगा।

साल 2020 की चर्चित वेब सीरीज़ ‘पाताल लोक’ (Paatal Lok) समाज की उस खाई में उतरती है जिसे आप और मैं अंडरवर्ल्ड का नाम देते हैं। पाताल लोक की कहानी भारतीय पत्रकार तरुण तेजपाल (Tarun Tejpal) द्वारा लिखित किताब ‘द स्टोरी ऑफ माय असैसिन्स’ (The story of my assassins) से प्रेरित है। किताब में तरुण तेजपाल (Tarun Tejpal) ने अपने निजी अनुभव साझा किए हैं।

पाताल लोक

क्राइम की दुनिया में विलीन शोषण, अत्याचार, भेदभाव जैसी अनेक कुरीतियों को आम जन के सामने रखते हुए, ‘पाताल लोक’ प्रशासन के खोखले चरित्र को भी उजागर करती है।

फ्लाईएक्स फिल्मफेयर ओटीटी अवार्ड्स 2020 (Flyx Filmfare Ott Awards 2020) में जयदीप अहलावत (हाथी राम) को ‘पाताल लोक’ में अपने प्रदर्शन के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

ए-लिस्ट अभिनेताओं की फ़ौज के साथ ‘पाताल लोक’ (Paatal Lok) का हर दृश्य दर्शकों को अपनी कुर्सी,सोफे या बिस्तर पर बैठे रहने पर मजबूर कर देता है।

ट्रांसपेरेंसी : पारदर्शिता (एमएक्स प्लेयर)

निर्माता/निर्देशक – डॉ मुनीश रायज़ादा

7 एपिसोड्स में बनी डॉक्यूमेंटरी वेब सीरीज़ ‘ट्रांसपेरेंसी : पारदर्शिता’ (Transparency: Pardarshita) अन्ना आंदोलन और आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) की झकझोर देने वाली अंदरूनी कहानियों को, जनता के सामने बेखौफ तरीके से उजागर करती है।

सड़क से संसद तक के अपने सफर में दिल्ली के मुख्यमंत्री के माइंड गेम का पूरा रोड मैप दिखाते हुए ‘ट्रांसपेरेंसी : पारदर्शिता’ (Transparency: Pardarshita) दर्शकों को दांतो तले उंगलियां चबाने पर मजबूर कर देती है।

ट्रांसपेरेंसी : पारदर्शिता

ऐंकर की भूमिका में डॉ रायज़ादा स्वयं, डॉ कुमार विश्वास, मयंक गांधी, शाज़िया इल्मी और अन्य कई राजनीतिक हस्तियों का साक्षात्कार करते हैं। ट्रांसपेरेंसी : पारदर्शिता में कुमार विश्वास की कही एक बात अन्ना आंदोलन के व्यापक रूप पर गहरी चोट करती है। उन्होंने कहा- “अब अगले 20-30 साल माएं अपने बच्चों को आंदोलन में नहीं भेजेंगी।”

ट्रांसपेरेंसी : पारदर्शिता (Transparency: Pardarshita) को आईएमडीबी (IMDb) पर 8.5 रेटिंग मिली है। शायद ही इससे पहले कभी पॉलिटिकल एंगल को इतनी गंभीरता से स्क्रीन पर उतारा गया हो। वेब सीरीज़ के गीत, सुनने वालों को भावुक कर देते हैं।

अगर आप आने वाले दिनों में बिंज-वॉचिंग के लिए कोई सीरीज़ ढूंढ रहे हैं तो ट्रांसपेरेंसी : पारदर्शिता वेब सीरीज़, ड्रामा और रियलिटी का परफेक्ट कॉम्बो MX Player पर उपलब्ध है। जिसे आप बिना कोई शुल्क चुकाए फ्री में देख सकते हैं।

यह भी पढ़ें – ‘ट्रांसपेरेंसी: पारदर्शिता’ देखने के बाद !

भोंसले (सोनी लिव)

निर्देशक – देवाशीष मखीजा

मराठी मानूस का नारा लगा कर महाराष्ट्र की राजनीति में कई नेताओं ने अपने पैर जमाए हैं। सोनी लिव (SonyLIV) पर रिलीज़ हुई, मनोज बाजपाई स्टारर फिल्म ‘भोंसले’ (Bhonsle) उसी लोकल-आउटसाइडर्स की कहानी को दोहराती है। कहानी में विलास (संतोष जुवेकर) नाम का रिक्शावाला एक महत्वाकांक्षी युवक है जो पॉलिटिक्स में सिक्का जमाने की होड़ में मराठी Vs नार्थ इंडियंस (Maharashtrians Vs North Indians) का राग छेड़ देता है।

आस पास के भ्रष्ट व्यापार को देख कर, ईमानदार इंसान पर किस तरह का बुरा प्रभाव पड़ सकता है, इसका अंदाजा आप गणपतराव भोंसले (मनोज बाजपाई) के मानवीय किरदार को देख कर लगा सकते हैं।

भोंसले

मनोज बाजपाई एक ऐसे रिटायर्ड पुलिस कर्मी के रूप में नज़र आते हैं जो अपनी नॉन-करप्ट इमेज के लिए ज़िन्दगी भर ताने सुनता है। अपने बेहतरीन साइलेंट एक्ट का पुनः परिचय देते हुए मनोज बाजपाई दर्शकों पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं।

‘भोंसले’ (Bhonsle) को इस तरह से फिल्माया गया है कि स्क्रीन के बाहर बैठे दर्शकों को किरदारों के संघर्ष, उनके अकेलेपन, और उनके नीरस जीवन के अँधेरे का अनुभव ‘अपना’ लगने लगता है। कुछ लोगों के लिए ‘भोंसले’ स्लो ट्रीटमेंट की फिल्म बेशक हो सकती है मगर ‘भोंसले’ (Bhonsle) का वही स्लो ट्रीटमेंट दर्शकों को कहानी में डूब जाने का समय देता है।

यह भी पढ़ें – 2020 के ओटीटी सिनेमा जगत के बड़े नाम जिन्होंने जीता सबका दिल

बुलबुल (नेटफ्लिक्स)

निर्देशक – अन्विता दत्त

नेटफ्लिक्स (Netflix) पर रिलीज़ हुई फिल्म ‘बुलबुल’ (Bulbbul) एक ऐसी लड़की की कहानी है जिसे बचपन में ही डोली चढ़ा दी जाती है, उसकी इच्छाओं को दरकिनार रखा जाता है, उसे बड़ी हवेली की बहु होने के नाते चुप रहने को कहा जाता है, खुद पर हुए ज़ुल्म को खामोशी से भूल जाने को कहा जाता है। पर अपने सारे दर्द को समेटती हुई बुलबुल (तृप्ति डिमरी) अंत में खुद को सशक्त करने में कामयाब होती है।

देखा जाए तो ‘बुलबुल’ (Bulbbul) को हॉरर कहानी के खांचे में रखा जा सकता है, जहाँ फिल्म की चुड़ैल डराती तो नहीं पर अपनी मासूम नज़रों से दर्शकों के दिल पर छा जाती है। तृप्ति डिमरी को अपने किरदार ‘बुलबुल’ के लिए काफी तारीफें मिली हैं। उनकी गहरी आँखों से किरदार के गहरे रहस्य को देखा जा सकता है। ‘बुलबुल’ का सब कुछ सह कर भी मुस्कुराते रहना, समाज में महिलाओं की धुंधली तस्वीर पेंट करता है।

बुलबुल

आज भी लोग ‘एक लड़का और लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते’ वाले संवाद पर अटके हुए हैं। इसकी झलक हमें फिल्म में तब देखने को मिलती है जब ‘बुलबुल’ (Bulbbul) को समझने वाले एक लौते इंसान डॉ. सुदीप (परमब्रत चटोपाध्याय) को भी शक की निगाहों से देखा जाता है।

फिल्म में ठाकुर और उसके जुड़वा भाई महेंद्र के किरदार में राहुल बोस क्या खूब लगे हैं। ठाकुर के भाई सत्या के रूप में अव‍िनाश तिवारी भी सटीक बैठते हैं। महेंद्र की पत्नी बिनोदिनी (पाओली दाम) का रोल भी दमदार निकल कर आता है।

अन्विता दत्त ने नेटफ्लिक्स (Netflix) पर रिलीज़ हुई अपनी फिल्म ‘बुलबुल’ (Bulbbul) के विज़ुअल्स पर भी काफी ध्यान दिया है। जिसकी बदौलत ‘बुलबुल’ किसी फेयरी टेल से कम नहीं लगती।

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए – Rewind 2020: Movies And Series Linked To Social And Political Issues

मी रक्सम (ज़ी 5)

निर्देशक – बाबा आज़मी

मरियम (अदिति सुबेदी) भरतनाट्यम सीखना चाहती है। पिता सलीम (दानिश हुसैन) पेशे से दर्जी है पर अपनी बेटी को भरतनाट्यम में पारंगत करने के लिए उसे डांस स्कूल भेज देता है। अभी तक आपको इनके धर्म का पता तो चल ही गया होगा। समस्या यही है कि मुस्लिम परिवार में जन्म लेने के उपरान्त भी लड़की भरतनाट्यम सीखना चाहती है।

ज़ी 5 (Zee5) पर आई ‘मी रक्सम’ (Mee Raqsam) में मरियम और सलीम को समाज में बैठे धर्म के ठेकेदारों का सामना करना पड़ता है। मुस्लिम समाज उनका बहिष्कार कर देता है। मगर फिर भी ना तो बेटी अपने फैसले से एक कदम पीछे हटती है और ना ही पिता।

सिर्फ इतना ही नहीं फिल्म में कुछ लोग इस बात से भी खुश होते हैं कि मुस्लिम लड़की का भरतनाट्यम सीखना हिंदुत्व की इस्लाम पर जीत है। अब इन सज्जन मनुष्यों को कौन समझाए कि कला को यूँ धर्म की बेड़ियों में बाँध कर मार देना कितना गलत है।

मी रक्सम

मी रक्सम (Mee Raqsam) में नसीरुदीन शाह कुछ देर के लिए ही आते हैं, पर यह तो जगज़ाहिर है कि स्क्रीन पर उनका कुछ देर के लिए आना ही जादू बिखेर सकता है। फिल्म की मुख्य अभिनेत्री अदिति सुबेदी की जितनी तारीफ की जाए कम है। पिता के रोल में दानिश हुसैन ने भी कमाल का काम किया है।

फिल्म की सादगी ही इसकी सुंदरता है। और उसकी यही सुंदरता बाबा आज़मी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘मी रक्सम’ (Mee Raqsam) को भीड़ से अलग करती है।

‘मी रक्सम’ उन सब लोगों के लिए जवाब है जो कला और धर्म (Art and Religion) को एक दूसरे से लड़ा कर खुद को धर्म पालक कहते हैं। फिर बात चाहे मुस्लिमों की हो या हिंदुत्व पटल पर खड़े ढोंगियों की। कला किसी की जागीर नहीं। कला स्वतंत्र है।

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स (OTT Platforms) पर रिलीज़ हुई फिल्मों और वेब सीरीज़ की इस Best of 2020 लिस्ट से अगर आपकी नज़रों से कोई कहानी छूट गयी हो, तो उसे आप अपने अगले वीकेंड प्लान में शामिल कर सकते हैं।

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यूपी में आज होने वाली थी यूपी टीईटी की परीक्षा। (Wikimedia Commons)

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