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राजनीति

बिहार चुनाव के दोनों पहलुओं पर विश्लेषण

सभी एग्जिट पोल में राजद और कांग्रेस यानि महागठबंधन को विजय दिखाया जा रहा था, किन्तु फैसला उलट आया। यह माजरा है क्या? वह जानने की कोशिश करते हैं।

बिहार चुनाव में मतदान करती बिहार की जनता। (PIB)

बिहार चुनाव के नतीजे आए 2 दिन हो चुके हैं किन्तु कुछ लोगों को अभी संशय है कि “ऐसा हो कैसे सकता है?” और यह होना लाज़मी भी है। यह इसलिए कि सभी एग्जिट पोल में राजद और कांग्रेस यानि महागठबंधन को विजय दिखाया जा रहा था, किन्तु फैसला उलट आया। यह माजरा है क्या?

इस चुनाव में विश्लेषण से अधिक खामियों को ढूंढने की ज़रूरत है। क्योंकि हर एक पार्टी की साख इस चुनाव से जुड़े हुए थे और सभी ने अंत तक अपने प्रदर्शन में कमी नहीं आने दी। यहाँ तक की नए नेता बन कर उभरे तेजस्वी यादव ने ताबड़-तोड़ रैलियों से सबको हैरान कर दिया। जिसका नतीजा यह निकला कि राजद 75 सीट जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बन गई, वहीँ दूसरे पर भाजपा और फिर जनता दाल (यू.)। अधिकांश लोग जीतने वाले का विश्लेषण किन्तु आज हम सबसे पहले जीतते-जीतते हारने वाले का विश्लेषण करेंगे।


महागठबंधन की हार का कारण

इस चुनाव में तेजस्वी यादव ने 10 लाख युवाओं को नौकरी देने का वादा किया था, जिससे अधिकांश युवा प्रभावित भी हुए थे किन्तु, बिहार में अब विकल्प और व्यवस्था को देखा जाता है। यही कारण था कि बिहार चुनाव में लालू का जंगल राज काफी चर्चा में रहा और सबसे बड़ा कारण जनता में डर का रहा। दूसरा, क्या कांग्रेस महागठबंधन को ले डूबी? यह कहना गलत भी नहीं होगा क्योंकि राजद के पास थी कुल 144 सीटें कांग्रेस के पास 70 और लेफ्ट के पास 29 जिसमे राजद ने 75 पर जीत हासिल की वहीँ कांग्रेस 19 में ही सिमट कर रह गई। हैरान करने वाली बात यह है कि लेफ्ट का प्रदर्शन कांग्रेस से भी अच्छा रहा। देश की सबसे बड़ी पार्टी का दावा करने वाली कांग्रेस 20 आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। तीसरा, ए.आई.एम.आई.एम पार्टी का राजद का वोट काटना जिस पर उन्हें भाजपा का साथी तक बता दिया गया। असदुद्दीन औवेसी की पार्टी बिहार में 5 सीट जीतने में सफल रही, यह अंक दिखने में छोटा है किन्तु चुनाव 1 सीट भी हार-जीत का फैसला कर देती है।

क्या इसे एनडीए की जीत कहें या भाजपा की?

यह जीत भाजपा और एनडीए के लिए चौंकाने वाली जीत थी क्योंकि एग्जिट पोल के आंकड़ों में भाजपा और एनडीए को पीछे दिखाया गया था। सभी नेता यह कहते हुए दिखाई दे रहे थे कि “हमें फैसला आने का इंतजार करना चाहिए किन्तु उन्हें पिछले चुनाव का हश्र याद था।” और यही वजह थी कि मतगणना शुरू होने के कुछ समय उपरांत तक भी बिहार बीजेपी कार्यालय में कोई चहल-पहल न देखी गई। किन्तु जैसे-जैसे नतीजे आते रहे और स्थिति स्पष्ट होती देखी गई, तब जाकर एनडीए खेमे में जान-में-जान आई और जीत का जश्न शुरू हुआ।

किन्तु यह चुनाव एनडीए के लिए थोड़ा पेचीदा रहा, उसका कारण यह है कि नितीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर अपना 15 साल पुरे कर चुके हैं और बिहार की जनता ने उन्हें इस पाले से उस पाले में जाते देखा है। जिससे जनता में नितीश कुमार के प्रति अविश्वास का भाव उत्पन्न होना शुरू हो गया। यह भी एक कारण हो सकता है जेडीयू का कम सीटों पर जीतने का। दूसरा, 2020 बिहार चुनाव में वोट-कटवा पार्टियों का दबदबा बड़े पैमाने पर देखा गया। चिराग पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी इसी मुद्दे को लेकर चुनाव में उतरी थी कि वह जेडीयू को विजय नहीं होने देंगे और चिराग पासवान खुलकर इसको स्वीकार भी कर रहे हैं। तीसरा, जेडीयू शासन द्वारा कुछ ऐसे काम अभी होना बाकि है जिस पर बिहार का भविष्य निर्भर है, वह है स्वास्थ्य, शिक्षा और नौकरी। और यह वही मुद्दे हैं जिससे युवा नितीश कुमार से खफा हैं।

यह भी पढ़ें: पीएम ने बोला, बिहार में एनडीए को नारी शक्ति ने दिलाई जीत

एनडीए के लिए भाजपा कंधों के रूप में सामने आई, जिसने जीत दिलाने का बीड़ा उठा लिया हो। जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी कह चुके हैं कि बिहार में महिलाओं ने भाजपा को खुलकर आशीर्वाद दिया है, वह सत्य भी हो सकता है। क्योंकि जंगल राज का मुद्दा महिलाओं से ज़्यादा और किसको डरा सकता है। भाजपा ने वोटरों को राम मंदिर, मुफ्त कोरोना टीका से लुभाया, और तो और मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भी तीन तलाक कानून और अन्य कानूनों से महिलाओं के विश्वास को जीतने में सफल रही, जो कि नतीजों में भी दिख रहा है। तीसरा, ‘मिथिलांचल’ जो किसी का गढ़ नहीं माना जाता है उसमे भाजपा का अधिकांश सीटों में जीतना चौंकाने वाला है।

मुख्य बात

आज बिहार में बिजली है जिस वजह से सभी जाति, संप्रदाय के लोग न्यूज़ चैनल देख सकते हैं। आज सभी युवाओं के पास मोबाइल फोन है, जिससे वह कहीं भी कभी जानकारी हासिल कर सकते हैं। यही कारण था कि राजद को नौकरी की और भाजपा को विकास की याद आई। क्योंकि जनता अब जागरूक है, अगर वह गद्दी पर बैठना जानती है तो काम निकलवाना भी जानती है। अब जाति और धर्म चुनावी भाषणों में कम सुनाई पड़ते हैं और विकास की बातें ज़्यादा होती हैं और इसका मुख्य कारण है जनता का जागरूक होना।

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