चैत्र नवरात्रि 2022, कलश स्थापना और इससे जुड़ी पौराणिक कथा

चैत्र नवरात्रि में प्रतिदिन नौ दिनों तक देवी के 9 अलग-अलग स्वरूपों की पूजा होती है।(Wikimedia commons)
चैत्र नवरात्रि में प्रतिदिन नौ दिनों तक देवी के 9 अलग-अलग स्वरूपों की पूजा होती है।(Wikimedia commons)

नवरात्रि (Navratri) पर्व हिन्दू धर्म में विशेष महत्व रखने वाले पर्वों में से एक है। नवरात्रि शब्द का अर्थ है नौ रातें, ये नौ रातें मां दुर्गा के नौ शक्ति रूपों के प्रतीक को दर्शाता है, इसी कारण नवरात्रि के दौरान आदि शक्ति माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-अराधना किये जाने का विधान है। इस वर्ष 2022 में चैत्र नवरात्रि, 02 अप्रैल 2022, शनिवार के दिन से शुरू होगी और चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि शुरू होगी। 01 अप्रैल 2022 को दिन में 11 बजकर 53 मिनट पर और प्रतिपदा तिथि समाप्ति अगले दिन 02 अप्रैल 2022 को 11 बजकर 58 मिनट पर होगी।

मां दुर्गा के इन नौ रूपों के नाम क्रमशः- शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, माँ कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी नवरात्रि (Navratri) का पावन पर्व चार बार आएगा, जिसमें से चैत्र नवरात्रि (Chaitra Navratri) और शरद नवरात्रि दुनियाभर में बेहद ही उत्साह और धूमधाम के साथ मनाई जाती है। हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र नवरात्रि ( Chaitra Navratri) पर्व में चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक देवी माँ दुर्गा की पूजा की जाती है। चैत्र मास की प्रतिपदा तिथि से ही हिंदू नव वर्ष का प्रारंभ भी होता है। जिसे भारत के कई राज्यों में गुड़ी पड़वा भी कहा जाता है। चैत्र नवरात्रि (Chaitra Navratri) की शुरुआत घटस्थापना से की जाती है। इस दौरान भक्त अपने घर पर कलश पूजन कर विधि अनुसार कलश की स्थापना करते हैं। फिर नौ दिनों तक उस कलश का पूजन कर माँ दुर्गा की उपासना की जाती है। नवरात्रि (Navratri) के अंतिम दिनों यानी अष्टमी और नवमी तिथि पर कन्या पूजन होता है, जिसमें छोटी कन्याओं की मां दुर्गा के रूप में पूजा कर उन्हें भोग लगाते हैं।

नवरात्रि, माँ दुर्गा को खुश करने के लिए उनके नौ रूपों की पूजा-अर्चना और पाठ किया जाता है। मान्यता है कि, नवरात्रि में माता का पाठ करने से देवी माँ भगवती की कृपा होती है। एक साल में चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ के महीनों में कुल मिलाकर नवरात्रि चार बार आती हैं लेकिन हिन्दू पंचांग के अनुसार नवरात्रि वर्ष में दो बार मनाया जाता है। चैत्र माह वाली नवरात्रि को चैत्र नवरात्रि और शरद ऋतु वाली नवरात्रि को शारदीय नवरात्रि के नाम से जाना जाता है।

भारत में चैत्र नवरात्रि बड़ी ही श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार नए वर्ष के प्रारंभ से राम नवमी तक यह पर्व मनाया जाता है। इस त्योहार को वसंत नवरात्र भी कहा जाता है। चैत्र नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना की जाती है और इसके बाद प्रतिदिन नौ दिनों तक देवी के 9 अलग-अलग स्वरूपों की पूजा होती है। कलश स्थापना को घटस्थापना भी कहते है।

कलश स्थापना का कारण और महत्त्व:-

पुराणों में एक मान्यता है, जिसमें कलश को भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है। इसलिए देवी की पूजा से पहले कलश का पूजन होता है। पूजा स्थान पर कलश की स्थापना करने से पहले उस जगह को गंगा जल से शुद्ध किया जाता है और फिर पूजा में सभी देवी -देवताओं को आमंत्रित किया जाता है। कलश को पांच अलग-अलग प्रकार के पत्तों से सजा कर उसमें हल्दी की गांठ, सुपारी, दूर्वा, आदि रखकर, कलश को स्थापित करने के लिए उसके नीचे बालू की वेदी बनाकर उसमें जौ बोये जाते हैं। जौ, देवी माँ अन्नपूर्णा को खुश करने के लिए बोया जाता है। माँ दुर्गा की मूर्ति को पूजा स्थल के बीच स्थापित कर माँ का श्रृंगार रोली ,चावल, सिंदूर, माला, फूल, चुनरी, साड़ी, आभूषण और सुहाग से करते हैं। पूजा स्थल पर एक अखंड दीप, नौ दिनों के लिए जलाया जाता है। कलश स्थापना के बाद नौ दिनों का व्रत शुरू हो जाता है।

नवमी के दिन नौ कन्याओं को माँ दुर्गा के नौ स्वरूप मानकर उन्हें, श्रद्धा से भोजन कराया जाता है और दक्षिणा आदि दी जाती है। चैत्र नवरात्रि में लोग लगातार नौ दिनों तक देवी की पूजा और उपवास करते हैं और दसवें दिन कन्या पूजन करने के पश्चात् व्रत खोलते हैं।

चैत्र नवरात्रि की पौराणिक कथा:-

इस पर्व से जुड़ी एक कथा के अनुसार देवी दुर्गा ने एक भैंस रूपी असुर महिषासुर का वध किया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर के पूजा से खुश होकर महादेव ने उसे अजय होने का वरदान दे दिया। उसे वरदान देने के बाद देवताओं को चिंता हुई कि वह अब अपनी शक्ति का गलत प्रयोग करेगा, और महिषासुर ने राक्षस होने के नाते किया भी यही, उसने नरक का विस्तार स्वर्ग के द्वार तक कर दिया इसको देख देवता भयभीत हो गए। महिषासुर ने सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण और अन्य देवताओं को हराकर उनके सभी अधिकार छीन कर स्वयं स्वर्गलोक का मालिक बन बैठा। महिषासुर के इस दुस्साहस से क्रोधित होकर देवताओं ने देवी माँ दुर्गा की रचना की। ऐसी मान्यता है कि देवी माँ दुर्गा के निर्माण में सारे देवताओं का एक समान बल लगाया गया था। महिषासुर का नाश करने के लिए सभी देवताओं ने अपने अपने अस्त्र देवी माँ दुर्गा को दिए थे और इन देवताओं के सम्मिलित प्रयास से देवी दुर्गा और बलवान हो गईं थी। इन नौ दिन देवी-महिषासुर संग्राम हुआ और अन्ततः महिषासुर-वध कर महिषासुर मर्दिनी कहलायीं।

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