कारगिल दिवस पर वीर सपूतों की शौर्य गाथा!

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देश आज(26 जुलाई) को कारगिल विजय दिवस पर ऑपरेशन विजय की सफलता का जश्न मना रहा है, जिसे भारतीय सेना ने 1999 में जम्मू और कश्मीर के कारगिल-द्रास सेक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठियों से भारतीय क्षेत्रों पर कब्जा करने के लिए भीषण युद्ध किया था। कारगिल विजय दिवस हर वर्ष भारत के सशस्त्र बलों के उन बहादुर सैनिकों के प्रति सम्मान के लिए मनाया जाता है, जिन्होंने पाकिस्तानी सेना द्वारा छल से कब्जाए गए इलाके को वापस मुक्त कराने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।

कारगिल विजय दिवस की बात हो और कैप्टेन विक्रम बत्रा का नाम न लिया जाए तो वह हमारी भूल होगी। 1999 के कारगिल युद्ध के कई नायक थे, जिन्होंने पाकिस्तानी घुसपैठियों से लड़ते हुए भारत के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। उन्ही नायकों में से एक थे कैप्टेन विक्रम बत्रा जिन्हें इस बलिदान के लिए भारतीय सेना के सबसे उत्कृष्ट सम्मान 'परम वीर चक्र' से सम्मानित किया गया था।

9 सितंबर 1974 में जन्मे कैप्टन विक्रम बत्रा ने 6 दिसंबर 1997 को भारतीय सेना की जम्मू-कश्मीर राइफल्स की 13वीं बटालियन के साथ अपने सैन्य जीवन की शुरुआत की थी। जिस समय उन्हें कारगिल युद्ध के लिए बुलावा आया उस समय वह उत्तर-प्रदेश में तैनात थे। कैप्टन बत्रा 6 जून को द्रास पहुंचे और उन्हें राजपुताना राइफल्स की दूसरी बटालियन के लिए रिजर्व में रखा गया। जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ रहा था, पाकिस्तानी घुसपैठियों से कब्जा किए गए इलाके हथियाने की कार्रवाई तेज की गई। इस बीच राजपुताना राइफल्स की दूसरी बटालियन को तोलोलिंग पर्वत श्रृंखला पर कब्जा करने करने का आदेश दिया गया।

शेरशाह के नेतृत्व भारतीय वीरों ने किया था कारगिल विजय।(Wikimedia Commons)

"शेरशाह"(कैप्टेन बत्रा का कोड नाम) के नेतृत्व में पीक 5140 को हासिल करने के लिए चढ़ाई का दिन 20 जून 1999 तय किया गया और तय रणनीति के मुताबिक राजपुताना राइफल्स ने चढ़ाई शुरू की। कैप्टेन बत्रा और उनकी बटालियन ने आमने-सामने की लड़ाई में दुश्मन के 'छक्के छुड़ा दिए' और कुछ समय बड़े अधिकारीयों द्वारा कैप्टेन बत्रा का संदेश ट्रेस हुआ कि 'दिल मांगे मोर' यानि पीक 5140 पर भारतीय सेना ने अपना पताका लहरा दिया है।

इसके उपरांत अब समय आया पॉइंट 4875 पर भारतीय परचम लहराने का। विक्रम बत्रा और उनकी बटालियन जोश से सराबोर थी। प्वाइंट 4875 की ऊंचाई लगभग 16,000 फीट थी और इसलिए इस चोटी को पुनः प्राप्त करने की लड़ाई बहुत खतरनाक होती चली गई, क्योंकि पाकिस्तानी घुसपैठियों ने चोटी से कैप्टन बत्रा और उनकी टीम पर मशीनगन से फायरिंग जारी रखा। जब कैप्टन बत्रा अपनी टीम के सदस्य को सुरक्षित निकालने की कोशिश कर रहे थे, तभी पाकिस्तानी घुसपैठियों ने उन पर हमला कर दिया। कैप्टन बत्रा खुद को गोलियों से बचने में सफल रहे, लेकिन एक ग्रेनेड का छर्रा उनके सिर में लगा और वह उसी समय शहीद हो गया।

'ये दिल मांगे मोर' यह कोड आज कारगिल के वीरों की पहचान बन गया है। कैप्टेन बत्रा और उनके जैसे कई वीर सिपाही जिन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए, वह आज हमारे बीच न होते हुए भी ऐसी ही वीर गाथाओं में जीवित हैं और पूरा भारत सदा उन्हें स्मरण करता रहेगा।

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