पग चलते रहे और कारवां बनता गया

पग चलते रहे और कारवां बनता गया
हिंदी एवं गुजराती भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार अमृतलाल वेगड़। (Wikimedia Commons)

एक साहित्यकार का पर्यावरण के प्रति झुकाव अकसर देखने को मिल जाता है, लेकिन जब एक साहित्यकार सिर्फ और सिर्फ पर्यावण के संरक्षण में अपना योगदान दे, उसका नतीजा काफी रोमांचक निकलता है। 

कुछ ऐसे ही थे हिंदी भाषा के प्रख्यात साहित्यकार अमृतलाल वेगड़ जिन्होंने नर्मदा नदी के संरक्षण में जी तोड़ मेहनत की थी और तो और नर्मदा की दो बार परिक्रमा की थी। उनकी न केवल साहित्य के प्रति रूचि थी किन्तु वह अच्छे चित्रकार भी थे। 

वर्ष 1928 में मध्यप्रदेश के जबलपुर में जन्में अमृतलाल वेगड़ ने नर्मदा संरक्षण के मुहीम में अहम भूमिका निभाई।उन्‍होंने नर्मदा पर चार किताबें भी लिखी, जिनमें से 'सौंदर्य की नदी नर्मदा' काफी प्रसिद्ध है. इसके अलावा 'अमृतस्य नर्मदा', 'तीरे-तीरे नर्मदा' और 'नर्मदा तुम कितनी सुंदर हो' भी प्रकाशित हुई थी.

 वह गुजराती और हिंदी में साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित हुए थे. अमृतलाल वेगड़ ने नर्मदा और सहायक नदियों की 4000 किलोमीटर से भी अधिक की पदयात्रा की. नर्मदा के सौंदर्य और स्वरुप का जिस तरीके से अमृतलाल वेगड़ ने अपने लेखों से न्याय दिया है उस तरह शायद ही कोई दूसरा साहित्यकार दे। 

आज उनके 92वें जन्मदिवस पर उनकी कही एक बात दोहराता हूँ की "अगर मैं यह यात्रा न करता, तो मेरा जीवन व्यर्थ जाता | जो जिस काम के लिए बना हो, उसे वह काम करना ही चाहिए और मैं नर्मदा की पदयात्रा के लिए बना हूँ |"

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