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मनोरंजन

हिन्दू संस्कृति और हिंदुत्व धूमिल करता आ रहा है बॉलीवुड

Bollywood पर कई बार हिन्दू संस्कृति की छवि को धूमिल करने और गलत तरीके से दिखाने का आरोप लगा है। किन्तु कुछ ऐसे भी हैं जो लोगों को जागरुक कर रहे हैं।

कभी बॉलीवुड द्वारा साधुओं पर अभद्र टिप्पणी, तो कभी फिल्मो में पुजारी कहा जाता है दलाल। आखिर कब तक?(Pixabay)

बॉलीवुड का नाम देश एवं विदेशों में काफी चर्चित है। अभिनेताओं को जितना सम्मान और प्यार मिलता है शायद ही और किसी को इतना मिलता हो। किन्तु क्या बॉलीवुड एक धर्म और उसकी संस्कृति को धूमिल करने की फ़िराक में है। क्या सनातन को बॉलीवुड नीचा दिखाता आ रहा है? यह सवाल कई लोग करते हैं और समय-समय पर करते हैं। निर्देशक Swaroop RSJ द्वारा बनाई गई नई फिल्म का पोस्टर कुछ ऐसा ही संकेत दे रहा है। फिल्म का नाम है ‘Mission Impossible’ जो Matinee Entertainment के बैनर तले निर्मित हुई है। इस फिल्म के पोस्टर में तीन बच्चे तीन देवताओं ‘हनुमान, शिव और कृष्ण’ के वेशभूषा में खड़े हैं। किन्तु विवादास्पद यह है कि तीनों बच्चों के हाथ में देसी बन्दूक है जिसे कई लोग कट्टा भी कहते हैं लिए खड़े हैं।

मिशन इम्पॉसिबल फिल्म का विवादास्पद पोस्टर।(सोशल मीडिया)


इस पोस्टर पर कई लोगों ने ट्विटर के माध्यम से आपत्ति व्यक्त की है। जिनमे से एक ट्विटर यूजर अतुल आहूजा लिखते हैं कि “पहले हिन्दू और सनातन धर्म का अनादर करो, और जब लोग आपत्ति जताएं तो आसानी से माफी मांग लो। यह पब्लिसिटी स्टंट आज-कल फैशन में है।” ऐसी ही कई और आपत्तियों के बाद मैटिनी ने माफ़ी मांगी थी और पोस्टर को बदलने की बात साझा की थी।

किन्तु यह मामला नया नहीं है। ट्विटर पर एक पेज है ‘Gems of Bollywood’ जिस पर बॉलीवुड द्वारा फैलाई जा रही घृणा को सामने लाया जा रहा है। हाल ही में Bhumi Pednekar की फिल्म Durgamati अमेज़न प्राइम पर आई है जो कि 2018 में आई तेलगू फिल्म भागमती रीमेक है। इस फिल्म में क्या आपत्तिजनक यह ‘Gems of Bollywood’ ने सफाई से दिखाया है। यह फिल्म ज़्यादा सफल नहीं रही।

ऐसे एक नहीं कई ट्वीट हैं जिन्हे देखने के उपरांत आपको आभास होगा कि कितने वर्षों से बॉलीवुड हिन्दू और हिंदुत्व को नीचा दिखता आ रहा है।

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(NewsGram Hindi, Shantanoo Mishra)

हिन्दू या हिंदुत्व, एक धर्म है या विचार इसका फैसला आज के समय में ग्रंथ, पुराण या धर्माधिकारी नहीं करते, अपितु इसका फैसला करता है कंप्यूटर के सामने बैठा वह तथाकथित बुद्धिजीवि जिसे न तो धर्म का ज्ञान है और न ही सनातन संस्कृति की समझ। इन्हें हम आम भाषा में लिब्रलधारी या लिब्रान्डू भी कहते हैं। यही तबका आज देश में ‘हिन्दू बांटों आंदोलन‘ का मुखिया बन गया है। समय-समय पर इस तबके ने देश में हिन्दुओं को हिंदुत्व के प्रति ही भड़काने का काम किया है। महिलाऐं यदि हिन्दू परंपरा अनुसार वस्त्र पहनती हैं तो वह इस तबके के लिए अभिव्यक्ति की आजादी पर चोट है और साथ ही यह पुराने जमाने का है, किन्तु इसी तबके के लिए हिजाब सशक्तिकरण की मूरत है। जब लव-जिहाद या धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाई गई थी तब भी इस तबके ने इसे प्रेम पर चोट या अभिव्यक्ति की आजादी जैसा बेतुका रोना रोया था। दिवाली पर जानवरों के प्रति झूठा प्रेम दिखाकर पटाखे न जलाने की नसीहत देते हैं और बकरी-ईद के दिन मौन बैठकर, सोशल मीडिया पर मिया दोस्त द्वारा कोरमा खिलाए जाने का इंतजार करते हैं।

सवाल करना एक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, किन्तु स्वयं को लिब्रलधारी बताने के लिए श्री राम और सनातन धर्म की परम्पराओं पर प्रश्न-चिन्ह उठाना कहाँ की समझदारी है? इसी तबके ने भारत में मुगलिया शासन को स्वर्णिम युग बताया था, साथ ही हिन्दुओं को मारने वाले टीपू सुल्तान जैसे क्रूर शासक को करोड़ों का मसीहा भी बताया था। लेकिन आज जब भारत का जागरुक युवा ‘छत्रपति सम्राट शिवाजी महाराज’ का नाम गर्व से लेता है तो यह तबका उसे भी संघी या बजरंग दल का बताने में देर नहीं करता। इस तबके के लिए हिंदुत्व धर्म नहीं एक पार्टी की विचारधारा और यह इसी मानसिकता को विश्व में अन्य लोगों तक पहुंचाकर हिन्दुओं को बदनाम करने का कार्य कर रहे हैं।

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लोकतंत्र का स्तम्भ है मतदाता! जिनके सामने देश का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति भी हाथ जोड़े खड़ा रहता है। मतदाता के हाथ में सत्ता ‘छीनने और उसे पलट देने’ दोनों की शक्ति है। किन्तु जिस लोकतंत्र के त्यौहार ‘चुनाव’ में आज युवा भागीदार बनने से कतराते हैं उन्हें देख कर यह आभास होता है कि, क्या आने वाले वर्षों में चंद लोग ही सत्ता का रास्ता बनाएंगे?

कुछ युवाओं से यह भी सुनने को मिल जाता है कि यदि आप देश में बदलाव लाना चाहते हैं, तो मतदान मत कीजिए! जो की सरासर गलत है, क्योंकि मतदान न करने से आप स्वयं ही अपने महत्वपूर्ण अधिकार का हनन कर रहे हैं। जिस युवा भविष्य के कंधे पर देश अपना आने वाले कल को लिख रहा है अगर वह, बीच रास्ते में ही साथ छोड़ दे तो विकास और उन्नति तो दूर देश को तोड़ने वाले संसद पहुँच जाएंगे।

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(Wikimedia Commons)

गोवा आज भारत के विकसित और पर्यटन के क्षेत्र में संपन्न राज्य है। गोवा को उसके मोहक समुद्री किनारों और सुंदर दृश्यों के लिए जाना जाता है। किन्तु आज, अगर आपको गोवा में पुर्तगाली या ईसाई छाप ज़्यादा देखने को मिलती है तो उसका भी एक काला अतीत है। जब पुर्तगाली आक्रमणकारियों द्वारा भारत पर हमला किया गया तब उन पुर्तगाली मिशनरियों का एक-मात्र उद्देश्य था केवल जबरन धर्म परिवर्तन करवाना। किन्तु इससे जुड़े दस्तावेजों को या तो गबन कर लिया या फिर नष्ट कर दिया गया।

गोवा अधिग्रहण का काला समय 1560 से लेकर 1812 तक चला, जब पुर्तगालियों ने देश पर आक्रमण किया और गोवा को अपने शासन में सम्मिलित कर लिया। जिसका खामियाजा वहाँ पर रह रहे हिन्दुओं को झेलना पड़ा। क्रूर मिशनरियों ने हिन्दुओं पर धर्मपरिवर्तन के लिए हर संभव प्रताड़ना दी। कुछ ने भय में आकर ईसाई धर्म अपना लिया और कइयों को क्रूर प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। इन मिशनरियों का काम ईसाई चर्चों का गोवा में बढ़ावा देना, हिन्दुओं का धर्मांतरण करवाना और उन्हें प्रताड़ना देना था। साथ ही उन सभी हिन्दुओं की जमीन पर अधिग्रहण करना भी था, जिन्होंने इसका विरोध किया।

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