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इतिहास

सन 1996 का ऐसा घोटाला जिस पर फैसला आया था 20 साल बाद

सन 1996 से सामने आए 900 करोड़ रुपये के घोटाले में प्रशासन के कई बड़े नेता और और नौकरशाह शामिल थे, जिन्होंने अपने राज्यकाल में पशुओं के लिए चारा खरीदने वाले पैसों तक को हड़प लिया और करोड़ों की हेरा फेरी की।

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता लालू प्रसाद [Wikimedia Commons]

कार्ल मार्क्स द्वारा कहा गया है की भ्रष्टाचार वेश्यावृत्ति से भी बदतर है। वेश्यावृत्ति किसी व्यक्ति की नैतिकता को खतरे में डालती है , भ्रष्टाचार निर्विवाद रूप से पूरे देश की नैतिकता को खतरे में डालता है। अपने देश की बात करें तो यहां समय समय पर कई तरह के भ्रष्टाचार होते रहे हैं। देश में अब तक के सबसे बड़े घोटालों में से एक है 'चारा घोटाला'। सन् 1996 से सामने आए इस 900 करोड़ रुपये के घोटाले को आज 20 वर्ष से ज्यादा हो चूका है। इसमें प्रशासन के कई बड़े नेता और और नौकरशाह शामिल थे, जिन्होंने अपने राज्यकाल में पशुओं के लिए चारा खरीदने वाले पैसे तक को हड़प लिया और करोड़ों की हेर-फेर की। इसमें बड़े नामों में सबसे पहले नाम आता है राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता लालू प्रसाद यादव का। उनके साथ उस वक्त के मौजूदा विधायकों को भी दोषी ठहराया गया था और उन्हें अपनी विधानसभा और संसदीय सीटें गंवानी पड़ी थी।

यह हेर फेर तब सामने आया था जब बिहार और झारखण्ड एक ही राज्य हुआ करता था। चारा घोटाला के 64 मामलों में केस दर्ज किये गए थे और जब सन 2000 में बिहार से अलग होकर झारखण्ड एक अलग राज्य बना तब 64 मामलों से 53 पर रांची में मुकदमा चलाया गया था।


यह सब 1985 में शुरू हुआ जब तत्कालीन सीएजी टीएन चतुर्वेदी ने बिहार कोषागार और विभिन्न विभागों से धन के संभावित गबन की जानकारी ली। उन्होंने राज्य से मासिक खाता प्रस्तुत करने में देरी देखी और छोटे पैमाने पर झूठी व्यय रिपोर्ट पर भी ध्यान दिया। इसके 10 साल बाद 1996 में जब राज्य के वित्त सचिव वीएस दुबे के आदेश पर तत्कालीन उपायुक्त अमित खरे ने चाईबासा स्थित पशुपालन विभाग के कार्यालय पर छापा मारा और अवैध निकासी को दर्शाने वाले भारी मात्रा में दस्तावेजों का पता लगाया, तब जाकर अधिकारियों और आपूर्तिकर्ताओं के बीच सांठगांठ का खुलासा हुआ और यह घोटाला दुनिया के सामने आया।


fodder scam of 1996 चारा घोटाला , सन् 1996 [Wikimedia Commons]

मामले की जांच करने के लिए राज्य सरकार ने दो अलग-अलग जांच आयोग की स्थापना की। पहले आयोग की अध्यक्षता राज्य विकास आयुक्त फूलचंद सिंह ने किया था पर जब घोटाले में जारी किये गए चार्जशीट में इनका नाम भी आने लगा तो इसे रद्द कर दिया गया। इसका गठन 30 जनवरी, 1996 को किया गया था।

वहीं दुसरे आयोग के नेतृत्व की जिम्मेदारी न्यायमूर्ति सरवर अली को सौंपी गयी। इसे 10 मार्च, 1996 को गठित किया गया था।

इस बीच मामले की महत्ता देखते हुए पटना उच्च न्यायालय ने सीबीआई को जांच अपने हाथ में लेने का आदेश दिया। जून 1997 में सीबीआई ने लालू प्रसाद के खिलाफ चार्जशीट जारी कर दी जिसके बाद लालू को अपनी सीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ी। हालांकि ,उन्होंने इसके बाद अपनी पत्नी राबड़ी देवी को पद पर स्थापित कर दिया था।

इसके लगभग एक महीने बाद यानि 30 जुलाई, 1997 को प्रसाद ने सीबीआई अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण किया जिसके बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया ।

5 अप्रैल 2000 में लालू की मुश्किलें बढ़ गयीं जब सीबीआई की विशेष अदालत में आरोप तय किए गए और सह आरोपी के तौर पर राबड़ी देवी का नाम शामिल पाया गया । हालांकि, कुछ ही समय बाद राबड़ी देवी को जमानत दे दी गई। वहीं प्रसाद की जमानत याचिका खारिज कर दी गई और उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

इसके बाद जब साल 2000 में बिहार और झारखण्ड अलग हो गए तब सुप्रीम कोर्ट ने घोटाले के मामलों को झारखंड स्थानांतरित कर दिया और फरवरी, 2002 से रांची की विशेष सीबीआई अदालत में इसकी सुनवाई शुरू कर दी गयी ।

रांची के विशेष सीबीआई के अदालत ने दिसंबर 2006 में श्री प्रसाद और सुश्री राबड़ी देवी को सीबीआई द्वारा दायर आय से अधिक संपत्ति के मामले में आरोपों से बरी कर दिया पर अन्य मामलों में केस अभी भी चल रहा था।

बता दें की इस दौरान श्री प्रसाद ने राज्यसभा चुनाव और बाद में आम चुनावों में चुनाव लड़ा। उन्होंने 2004 और 2009 के बीच रेल मंत्री के रूप में भी काम किया जब मामले में जाँच चल ही रही थी।

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30 सितंबर, 2013 को लालू को विशेष सीबीआई न्यायाधीश प्रवास कुमार सिंह ने दोषी ठहराया। फैसले के बाद प्रसाद को लोकसभा के सदस्य के रूप में अयोग्य घोषित कर दिया गया।साथ ही यह फैसला भी सुनाया गया की जेल से रिहा होने की तारीख से छह साल तक लालू विधानसभा/परिषद सहित कोई भी चुनाव नहीं लड़ सकते हैं।

इस पहले चारे घोटाले मामले में दोषी पाए जाने पर लालू को 5 साल कारावास और 25 लाख का जुर्माना लगाया गया था। हालांकि ,सिर्फ चार दिन जेल में रहने के बाद लालू बेल पर बाहर आ गए थे।

इसके बाद 23 दिसंबर, 2017 में रांची में सीबीआई की एक विशेष अदालत ने चारा घोटाला के दुसरे मामले में लालू प्रसाद को दोषी ठहराया और 6 जनवरी 2018 को अदालत ने साढ़े तीन साल की जेल और 10 लाख का जुर्माना लगा दिया।

इसके ठीक एक साल बाद यानि 24 जनवरी 2018 को रांची में सीबीआई की विशेष अदालत ने लालू को पांच साल की जेल और पांच लाख का जुर्माना भरने की सजा सुनाई। यह तीसरा मामला था जिसमें फैसला सुनाया गया।

Input: Various Sources

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