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ओपिनियन

COVID 19: क्या चीन का वायरस इंडियन या यूके का हो सकता है?

चीन में जन्मे वायरस को विदेशी मीडिया इंडियन बताने में जुटी है। Indian Variant जैसे नामों से अब कोरोना वायरस को जोड़ा जा रहा है जिसे WHO ने स्वयं नकार दिया है।

(NewsGram Hindi, Photo: Pixabay)

महामारी के दौर में जब हर तरफ कोरोना से बचने की और उससे जुड़े सवालों पर मीडिया दिन-रात नई बहस कर रहा होता है तब उसी बीच नए संस्करण या वेरिएंट को भी याद किया जाता है। किन्तु, कमाल की बात यह है कि इस महामारी का वैज्ञानिक नाम न लेते हुए इसे देश से जोड़ दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर भारत में कोरोना के नए संस्करण का नाम है B.1.617 है, किन्तु विश्वभर की मीडिया में इसे Indian Variant के नाम से लिखा और पढ़ा जाता है।

यह वही मीडिया है जिन्हें इस बात पर आपत्ति थी कि किसी वायरस को चीनी वायरस या Chinese Virus कैसे बुला सकते हैं? लेकिन अब यही मीडिया यूके वेरिएंट, इंडियन वेरिएंट का राग अलाप रहा है। जिस वजह से विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी इस पर सफाई देते हुए कहा कि ” डब्ल्यूएचओ उन देशों के नामों के साथ वायरस या वेरिएंट की पहचान नहीं करता है, जिनमें वे पहले रिपोर्ट किए गए हैं। हम उन्हें उनके वैज्ञानिक नामों से संदर्भित करते हैं और निरंतरता के लिए सभी से ऐसा ही करने का अनुरोध करते हैं,”


बड़े मीडिया वेबसाइट जैसे BBC, The Guardian, The New York Times ने अपने लेखों में सीधा-सीधा यह हैडलाइन लिखा है कि “WHO ने चेतावनी दी है कि भारत का घरेलू वायरस संस्करण अत्यधिक संक्रामक हो सकता है”, किन्तु गौर करने वाली बात यह है कि स्वयं WHO ने यह स्पष्टीकरण दिया है कि किसी देश के नाम का इस्तेमाल वायरस के संस्करण से नहीं किया जाता है। तो क्या यह एक प्रोपगैंडा का हिस्सा है? या कोविड के नाम पर चीन को बचाने की कोशिश?

चीन का नाम आ ही गया है तो यह सोचना अति-आवश्यक हो गया है कि जब कोरोना का केंद्र चीन था तब उसने इस महामारी को फैलने के लिए पूरा समय दिया और अब डब्ल्यू.एच.ओ के जाँच समूह द्वारा वुहान में किए जाँच के बाद दिए नतीजे से सभी देश संतुष्ट नहीं हैं। साथ ही गौर करने वाली यह बात भी है कि जाँच टीम में चीन के जांचकर्ता विदेशियों से ज्यादा थे। जिससे जाँच पर प्रभाव पड़ने की आशंका बढ़ जाती है। एक और बात की जांचकर्ताओं के जवाब में मतभेद भी दिख रहा है।

(Pixabay)

टीम में एक डच वायरोलॉजिस्ट मैरियन कोपमैन ने कहा था कि “हुआनान सीफूड मार्केट(वुहान) के कुछ जानवर खरगोश और बांस के चूहों सहित वायरस के लिए अति-संवेदनशील थे और कुछ का पता उन क्षेत्रों के खेतों या व्यापारियों से लगाया जा सकता है जो चमगादड़ों के घर हैं, इन्हे कोविड -19 का कारण मान सकते हैं।” वहीं चीनी टीम के शीर्ष लिआंग वानियन का मानना है कि यह वायरस किसी और शहर में जन्मा हो इसकी संभावना भी है। साथ ही यह भी कहा कि “टीम को इस बात का कोई सबूत नहीं मिला कि दिसंबर 2019 की दूसरी छमाही में शुरुआती प्रकोप से पहले यह बीमारी व्यापक रूप से फैल रही थी।”

अब सोशल मीडिया पर इंडियन वेरिएंट का साजिशन नाम लेकर भारत को कोसा जा रहा है। एक पत्रकार ने ट्वीटर पर लिखा कि “तो संक्षेप में भारतीय संस्करण का अर्थ यह हो सकता है कि हम अधिक समय तक सामान्य स्थिति में नहीं लौटेंगे और भारतीय संस्करण यहां ब्रेक्सिट और बोरिस जॉनसन के भारत के साथ एक आकर्षक व्यापार सौदा करने के दृढ़ संकल्प के कारण है। सबने बहुत अच्छा किया। अच्छा काम।”

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बहरहाल, अब इन सभी का केंद्र भारत है, ऐसा मीडिया रिपोर्ट और अंतराष्ट्रीय चैनलों पर दिखाया जा रहा है। इससे पहले मरिया वर्थ जो ऐसे ही मामलों पर बहुधा अपने ब्लॉग के द्वारा सवाल उठाती रहती हैं, उन्होंने भी अंतराष्ट्रीय मीडिया पर महामारी के दौरान कई भ्रामक खबरें फैलाने का आरोप लगाया है।

इस महामारी से लड़ाई पूरा विश्व लड़ रहा है, कोई जीत के करीब है तो कोई सामान्य स्थिति बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। भारत भी उन्ही देशों में से एक है, जहाँ कोरोना वारियर्स और प्रशासन यह पूरी कोशिश कर रहा है कि स्थिति को वापस स्थिर बना दिया जाए और उनकी यह कोशिश रंग लाती भी दिख रही है। किन्तु इस बीच कोरोना वायरस के नए रूप को भारतीय संस्करण या Indian Variant बताने से कहीं न कहीं भारत को नीचा दिखाने की पहल की जा रही है और यह सिर्फ भारत के साथ ही नहीं UK, अफ्रीका जैसे देशों के नाम के साथ वेरिएंट शब्द जोड़कर भी ऐसी ही खबरें फैलाई जा रही हैं।

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(NewsGram Hindi)

देश के पहले सीडीएस जनरल बिपिन रावत(General Bipin Rawat) 13 अन्य लोगों के साथ 9 दिसम्बर के दिन कुन्नूर के पहाड़ियों में हुए भीषण हेलीकाप्टर क्रैश में शहीद हो गए थे, जिनमें उनकी पत्नी मधुलिका रावत भी शामिल थीं। इस घटना ने न केवल देश को आहत किया, बल्कि विदेशों में भी इस खबर की खूब चर्चा रही। देश के सभी बड़े पदों पर आसीन अधिकारी एवं सेना के वरिष्ठ अफसरों ने इस घटना पर शोक व्यक्त किया।

जनरल बिपिन रावत(General Bipin Rawat) भारतीय सेना में 43 वर्षों तक अनेकों पदों पर रहते हुए देश की सेवा करते रहे और जिस समय उन्होंने अपना शरीर त्यागा तब भी वह भारतीय सेना के वर्दी में ही थे। उनके निधन के बाद देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी है। मीडिया रिपोर्ट्स में वह लोग जिनसे कभी जनरल बिपिन रावत मिले भी नहीं थे, उनके आँखों में भी यह खबर सुनकर अश्रु छलक आए। देश के सभी नागरिकों ने जनरल बिपिन रावत(General Bipin Rawat), उनकी पत्नी सहित 13 अफसरों की मृत्यु पर एकजुट होकर कहा कि यह देश के लिए बहुत बड़ी क्षति है। आपको बता दें कि जनरल रावत के नेतृत्व में भारतीय सेना ने अनेकों सफल सैन्य अभियानों अंजाम तक पहुँचाया, जिससे भारत का कद न केवल आतंकवाद के खिलाफ मजबूत हुआ, बल्कि इसका डंका विदेशों में भी सुना गया।

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(NewsGram Hindi)

बीते एक साल से जिन तीन कृषि कानूनों पर किसान दिल्ली की सीमा पर और देश के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शन कर रहे थे, उन कानूनों को केंद्र ने वापस लेने का फैसला किया है। आपको बता दें कि केंद्र के इस फैसले से उसका खुदका खेमा दो गुटों में बंट गया है। कोई इस फैसले का समर्थन कर रहा है, तो कोई इसका विरोध कर रहा है। किन्तु यह सभी जानते हैं कि वर्ष 2022 में 6 राज्यों में विधानसभा चुनाव 2022 आयोजित होने जा रहे हैं, जिनमें शमिल हैं उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल-प्रदेश, और गोवा। और यह चुनाव सीधे-सीधे भाजपा के लिए नाक का सवाल है, वह भी खासकर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में।

उत्तर प्रदेश एवं पंजाब का चुनावी बिगुल, चुनाव से साल भर पहले ही फूंक दिया गया था। और अब केंद्र सरकार द्वारा कृषि कानून पर लिए फैसले का श्रेय अन्य राजनीतिक दल लेने में जुटे हैं। विपक्ष में कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को इस फैसले का ताज पहनाना चाहते हैं, तो कुछ विपक्षी दल अपने-अपने सर पर यह ताज सजाना चाहते हैं। मगर इन सभी का लक्ष्य एक ही है 'विधानसभा चुनाव 2022'।

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भारत में आधुनिक लिबरल संस्कृति ने, हिन्दुओं को कई गुटों में बाँट दिया है। कोई इस धर्म को पार्टी से जोड़ कर देखता है या किसी को यह धर्म ढोंग से भरा हुआ महसूस होता है। किन्तु सत्य क्या है, उससे यह सभी लिब्रलधारी कोसों दूर हैं। यह सभी उस भेड़चाल का हिस्सा बन चुके हैं जहाँ आसिफ की पिटाई का सिक्का देशभर में उछाला जाता है, किन्तु बांग्लादेश में हो रहे हिन्दुओं के नरसंहार को, उनके पुराने कर्मों का परिणाम बताकर अनदेखा कर दिया जाता है। यह वह लोग है जो इस्लामिक आतंकवादियों पर यह कहते हुए पल्ला झाड़ लेते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन जब आतंकी बुरहान वाणी को सुरक्षा बलों द्वारा ढेर किया जाता है तो यही लोग उसे शहीद और मासूम बताते हैं। ऐसे ही विषयों पर मुखर होकर अपनी बात कहने और लिखने वाली जर्मन लेखिका मारिया वर्थ(Maria Wirth) ने साल 2015 में लिखे अपने ब्लॉग में इस्लाम एवं ईसाई धर्म पर प्रश्न उठाते हुए लिखा था कि "OF COURSE HINDUS WON'T BE THROWN INTO HELL", और इसके पीछे कई रोचक कारण भी बताए थे जिनपर ध्यान केंद्रित करना आज महत्वपूर्ण है।

कुरान, गैर-इस्लामियों के विषय में क्या कहता है,

मारिया वर्थ, लम्बे समय से हिंदुत्व एवं सनातन धर्म से जुड़े तथ्यों को लिखती आई हैं, लेकिन 2015 में लिखे एक आलेख में उन्होंने ईसाई एवं इस्लाम से जुड़े कुछ ऐसे तथ्यों को उजागर किया जिसे जानना हम सबके के लिए आवश्यक है। इसी लेख में मारिया ने हिन्दुओं के साथ बौद्ध एवं अन्य धर्मों के लोगों को संयुक्त राष्ट्र में ईसाई एवं इस्लाम धर्म के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी और इसके पीछे उन्होंने यह कारण बताया कि ईसाई एवं इस्लाम दोनों ही धर्मों के बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि गैर-ईसाई या गैर-मुस्लिम नर्क की आग में जलेंगे। इसका प्रमाण देते गए उन्होंने क़ुरान की वह आयत साझा की जिसमें साफ-साफ लिखा गया है कि " जो काफिर होंगे, उनके लिये आग के कपड़े काटे जाएंगे, और उनके सिरों पर उबलता हुआ तेल डाला जाएगा। जिस से जो कुछ उनके पेट में है, और उनकी खाल दोनों एक साथ पिघल जाएंगे; और उन्हें लोहे की छड़ों से जकड़ा जाएगा।" (कुरान 22:19-22)

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