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ओपिनियन

वह मंदिर पर थूकते रहें और हम ‘सॉरी’-‘सॉरी’ कहें!

आरोप लगाया गया कि वह लड़का मंदिर में केवल पानी पीने आया था मगर क्योंकि वह मुसलमान था इसलिए पीटा गया। किन्तु मंदिर प्रशासन का कुछ और तर्क है जिसे भी सुनना जरुरी है।

(NewsGram Hindi)

हाल ही में एक नए मुद्दे ने जन्म लिया है जिसको बुद्धिधारी सेक्युलर तबके ने हथिया लिया है और साथ ही उस पर विक्टिम और अल्पसंख्यक का रोना रोया जा रहा है। कुछ दिन पहले गाजियाबाद(Ghaziabad) में डासना(Dasna) इलाके के शिव शक्ति धाम मंदिर(Shiv Shakti Dham mandir) में एक शांतिप्रिय धर्म के बच्चे को मारा गया और उसके बाद मारने वाले पर यह आरोप लगाया गया कि वह लड़का मंदिर में केवल पानी पीने आया था मगर क्योंकि वह मुसलमान था इसलिए मारा गया। जबकि मंदिर के बाहर एक बोर्ड लगा हुआ है जिसपर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है कि मुसलमानों का मंदिर परिसर में आना वर्जित है। यह बोर्ड भी सेक्युलरधारियों को नागवार गुजरा।

किन्तु मंदिर के महंत एवं पुजारी इसके पीछे कुछ और ही तर्क दे रहे हैं जिसे आपको भी सुनना और समझना चाहिए। उनका कहना है कि मंदिर परिसर में पहले कई बार चोरी हो चुकी है और उन चोरियों के पीछे यह मुस्लिम ‘बच्चे’ ही थे। साथ ही जब परिसर के बाहर ही सार्वजनिक नल है तो वह लड़का मंदिर परिसर में 500 मी. अंदर क्यों पानी पीने गया? जब बाहर ही बोर्ड लगा हुआ है, जो आज से नहीं कई सालों से है तब भी वह लड़का अंदर क्यों आया?


मंदिर के महंत नरसिंहानन्द सरस्वती(Narsinhanand Saraswati) ने एक मीडिया चैनल को बताया कि “95% बहुल मुस्लिम(Muslim) इलाके में केवल 5% ही हिन्दू(Hindu) रहते हैं। और आस-पास के गावों के लोगों में इस मंदिर के लिए अधिक आस्था है। किन्तु जब बहन बेटियां यहां पूजा-ध्यान के लिए आती हैं, तब यही मुस्लिम गुंडे उन पर अभद्र टिप्पणी और उनका शिकार करते हैं। इन्ही लड़को ने मंदिर में चोरी को अंजाम दिया। यह लड़के मूर्तियों पर थूकते हैं उनपर पेशाब करते हैं। और इन्ही कारणों ने हमे वह गेट पर बोर्ड लगाने पर मजबूर किया।”

इस घटना के बाद सेक्युलरधारियों की मसीहा स्वरा भास्कर ने #SorryAsif लिखा और ऐसे ही कइयों ने ट्विटर पर यही लिखा और ट्रेंड चलाया। मगर यही तबका तब कहाँ छुप जाता है जब दिल्ली में रिंकू शर्मा(Rinku Sharma) की निर्मम हत्या कर दी गई थी? तब न तो इन सेक्युलरधारियों ने #SorryRinku लिखा और न ही इस पर चर्चा की। मगर यह एक तथाकथित अल्पसंख्यक वर्ग से जुड़ा मामला है तो अपना फायदा तो निकालना ही पड़ेगा।

यह भी पढ़ें: कुरान से 26 आयतों को हटाने की मांग, सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर!

इस घटना के बाद The Quint; The Wire जैसी ‘सत्यवादी’ और ‘सेक्युलर’ मीडिया, महंत यति नरसिंहानन्द सरस्वती का इंटरव्यू लेने आए और अपने हिसाब से कठोर सवाल पूछे। मगर महंत नरसिंहानन्द सरस्वती के तर्कों ने इनकी बोलती बंद करने का काम किया और हिन्दुओं में इस मामले को लेकर जो दोहरी मानसिकता पनपी थी उसे समाप्त करने का भी काम किया।

आपको जान कर हैरानी होगी कि जिस समय #SorryAsif को ट्रेंड कराया जा रहा था उस समय एक और हैशटैग ट्रेंड पर था और वह था #SorrySheru। अब आप सोच रहे होंगे कि शेरू कौन है? तो शेरू उन 40 कुत्तों में से एक है जिसका अहमद शाही नाम के 68 साल के बुजुर्ग ने बलात्कार किया था। अब वह बेजुबान है इसलिए कुछ बता भी नहीं सकता मगर इस अपराध का पर्दाफाश सीसीटीवी के द्वारा हुआ। इसके साथ ही एक और युवक की वीडियो भी वायरल हो रहा है जिसने सोमनाथ मंदिर के ध्वस्तीकरण को जायज ठहराया था और मेहमूद ग़ज़नवी के बारे में बच्चों को बताने के लिए कहता दिखा।

बहरहाल, यदि आसिफ को पीटा गया तो देश में असहिष्णुता का माहौल और यदि रिंकू शर्मा जैसे अन्य युवाओं को मारा गया तो ‘काफिर की मौत’ कहने वाले कई हैं। किन्तु मंदिर का अपमान और हिन्दुओं का अपमान कर विक्टिम कार्ड खेलना इन शांतिप्रिय लोगों के लिए नई बात नहीं है।

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भारत में आधुनिक लिबरल संस्कृति ने, हिन्दुओं को कई गुटों में बाँट दिया है। कोई इस धर्म को पार्टी से जोड़ कर देखता है या किसी को यह धर्म ढोंग से भरा हुआ महसूस होता है। किन्तु सत्य क्या है, उससे यह सभी लिब्रलधारी कोसों दूर हैं। यह सभी उस भेड़चाल का हिस्सा बन चुके हैं जहाँ आसिफ की पिटाई का सिक्का देशभर में उछाला जाता है, किन्तु बांग्लादेश में हो रहे हिन्दुओं के नरसंहार को, उनके पुराने कर्मों का परिणाम बताकर अनदेखा कर दिया जाता है। यह वह लोग है जो इस्लामिक आतंकवादियों पर यह कहते हुए पल्ला झाड़ लेते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन जब आतंकी बुरहान वाणी को सुरक्षा बलों द्वारा ढेर किया जाता है तो यही लोग उसे शहीद और मासूम बताते हैं। ऐसे ही विषयों पर मुखर होकर अपनी बात कहने और लिखने वाली जर्मन लेखिका मारिया वर्थ(Maria Wirth) ने साल 2015 में लिखे अपने ब्लॉग में इस्लाम एवं ईसाई धर्म पर प्रश्न उठाते हुए लिखा था कि "OF COURSE HINDUS WON'T BE THROWN INTO HELL", और इसके पीछे कई रोचक कारण भी बताए थे जिनपर ध्यान केंद्रित करना आज महत्वपूर्ण है।

कुरान, गैर-इस्लामियों के विषय में क्या कहता है,

मारिया वर्थ, लम्बे समय से हिंदुत्व एवं सनातन धर्म से जुड़े तथ्यों को लिखती आई हैं, लेकिन 2015 में लिखे एक आलेख में उन्होंने ईसाई एवं इस्लाम से जुड़े कुछ ऐसे तथ्यों को उजागर किया जिसे जानना हम सबके के लिए आवश्यक है। इसी लेख में मारिया ने हिन्दुओं के साथ बौद्ध एवं अन्य धर्मों के लोगों को संयुक्त राष्ट्र में ईसाई एवं इस्लाम धर्म के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी और इसके पीछे उन्होंने यह कारण बताया कि ईसाई एवं इस्लाम दोनों ही धर्मों के बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि गैर-ईसाई या गैर-मुस्लिम नर्क की आग में जलेंगे। इसका प्रमाण देते गए उन्होंने क़ुरान की वह आयत साझा की जिसमें साफ-साफ लिखा गया है कि " जो काफिर होंगे, उनके लिये आग के कपड़े काटे जाएंगे, और उनके सिरों पर उबलता हुआ तेल डाला जाएगा। जिस से जो कुछ उनके पेट में है, और उनकी खाल दोनों एक साथ पिघल जाएंगे; और उन्हें लोहे की छड़ों से जकड़ा जाएगा।" (कुरान 22:19-22)

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देश में धर्मांतरण का मुद्दा नया नहीं है, लेकिन जिन-जिन जगहों पर हाल के कुछ समय में धर्मांतरण बढ़े हैं वह क्षेत्र नए हैं। आपको बता दें की पंजाब प्रान्त में धर्मांतरण या धर्म-परिवर्तन का काला खेल रफ्तार पकड़ चुका है और अपने राज्य में इस रफ्तार पर लगाम लगाने वाली सरकार भी धर्मांतरणकारियों का साथ देती दिखाई दे रही है। आपको यह जानकर हैरानी होगी, कि पंजाब में धर्मांतरण दुगनी या तिगुनी रफ्तार पर नहीं बल्कि चौगनी रफ्तार पर चल रही है। जिस वजह से पंजाब में हो रहे अंधाधुंध धर्म-परिवर्तन पर चिंता होना स्वाभाविक हो गया है।

गत वर्ष 2020 में कांग्रेस नेता और पंजाब में कई समय से सुर्खियों में रहे नवजोत सिंह सिद्धु ने दिसम्बर महीने में हुए एक ईसाई कार्यक्रम में, यहाँ तक कह दिया था कि 'जो आपकी(ईसाईयों) तरफ आँख उठाकर देखेगा उसकी हम ऑंखें निकाल लेंगे' जो इस बात पर इंगित करता है कि कैसे सत्ता में बैठी राजनीतिक पार्टी पंजाब में हो रहे धर्म परिवर्तन को रोकने के बजाय उसे राजनीतिक शह दे रही है। आपको यह भी बता दें कि 3.5 करोड़ की आबादी वाले पंजाब राज्य में लगभग 33 लाख लोग ईसाई धर्म को मानने वाले रह रहे हैं। पंजाब के कई क्षेत्रों में छोटे-छोटे चर्च का निर्माण हो रहा है और कई जगह ऐसे चर्च मौजूद भी हैं।

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अगले वर्ष भारत एक बार फिर सबसे बड़े राजनीतिक धमाचौकड़ी का साक्षी बनने जा रहा है। जिसकी तैयारी में अभी से राजनीतिक दल अपना खून पसीना एक कर रहे हैं। यह चुनावी बिगुल फूंका गया है राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, जहाँ जातीय समीकरण, विकास और धर्म पर खूब हो-हल्ला मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश चुनाव में जहाँ एक तरफ भाजपा हिन्दुओं को अपने पाले करने में जुटी वहीं विपक्ष ब्राह्मणों को अपनी तरफ करने के प्रयास में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। आने वाला उत्तर प्रदेश चुनाव क्या मोड़ लेगा इसका उत्तर तो समय बताएगा, किन्तु ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

आपको बता दें कि वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सभी पार्टियों ने खूब खून-पसीना बहाया था, किन्तु सफलता का परचम भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटों को जीत कर लहराया था। वहीं अन्य पार्टियाँ 50 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। भाजपा की इस जादुई जीत का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के धुआँधार रैली और मुख्यमंत्री चेहरे को जाहिर न करने को गया। किन्तु उत्तर-प्रदेश 2022 का आगामी चुनाव सत्ता पक्ष के चुनौतियों से भरा हो सकता है। वह इसलिए क्योंकि सभी राजनीतिक पार्टी अब धर्म एवं जाति की राजनीति के अखाड़े में कूद गए हैं। इसमें सबसे आगे हैं यूपी में राजनीतिक बसेरा ढूंढ रहे एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन औवेसी! जो खुलकर रैलियों में और टीवी पर यह कहते हुए सुनाई दे जाते हैं कि वह प्रदेश के मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए उत्तर प्रदेश आए हैं।

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