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खेल है 4,025 करोड़ का घोटाला , खिलाड़ी है हर्षद मेहता

सन् 1992 का घोटाला भारतीय इतिहास में आज भी सबसे बड़े घोटालों में गिना जाता है , जिसमे हर्षद मेहता ने लगभग 4,025 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की।

(NewsGram Hindi)

सन् 1992 का घोटाला भारतीय इतिहास में आज भी सबसे बड़े घोटालों में गिना जाता है। आंकड़ों की बात करें तो उस वर्ष लगभग 4,025 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी हुई थी और इतने बड़े धोखे के पीछे शामिल था एक अकेला व्यक्ति - हर्षद मेहता।

स्टॉक मार्केट का बिग बुल कहे जाने वाला और 1992 के ऐतिहासिक घोटाले का मुख्य खिलाडी हर्षद मेहता की कहानी शुरू होती है आज से लगभग 30 साल पहले से। उसके जीवन की सबसे खास बात यह रही की इसने सिर्फ 40 रुपये के साथ शेयर मार्केट की दुनिया में कदम रखा था।


गुजरात में जन्मे हर्षद मेहता ने बीकॉम की डिग्री ले रखी थी। प्रसन्न प्राणजीवदास के देख रेख में चल रहे एक ब्रोकरेज फॉर्म में उसने नौकरी शुरू की। इस नौकरी के दौरान उसने प्राणजीवन दास को अपना गुरु मानकर उनसे स्टॉक मार्किट की बारीकियां सीखने लगा।

बहुत जल्द 1984 में उसने ''ग्रोमोर रिसर्च एंड एसेट मैनेजमेंट '' नाम से अपनी खुद की ब्रोकरेज खोली और बॉम्बे स्टॉक मार्केट की मेम्बरशिप भी ले ली। देखते ही देखते उसने शेयर बाजार की दुनिया में इतनी प्रसिद्धि हासिल कर ली की उसे स्टॉक मार्केट का अमिताभ बच्चन कहा जाने लगा।

1990 के दशक तक वो अपनी अमीरी के लिए जाना जाने लगा। छोटे - बड़े सभी लोग उसकी बिज़नेस नीति को समझना चाहते थे की आखिर कैसे एक छोटी सी नौकरी करने वाला इंसान एकाएक करोड़ों की सम्पत्ति का मालिक बन गया।

वहीं 90 के दशक में देश में कई बदलाव हो रहे थे। भारतीय अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए वर्ष 1991 में तत्कालीन प्रधान मंत्री पीवी नरसिम्हा राव की सरकार ने निजीकरण और विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए नयी आर्थिक नीति लागू करने का फैसला लिया , जिसका देश की अर्थव्यवस्था पर काफी अच्छा प्रभाव देखने को मिला।

1990 के दशक में बैंकों को बांड के रूप में बनाए रखने के लिए न्यूनतम 38.5% बांड या अन्य तरल संपत्ति के रूप में रखना निर्धारित किया गया था। इसे सांविधिक तरलता अनुपात यानि एसएलआर के रूप में जाना जाता है।

बैंकों को जब पैसों की जरुरत पड़ती है तब वो सरकारी बांड दुसरे बैंकों के पास गिरवी रखकर पैसे लेते हैं। मगर पैसों की जरुरत पड़ने पर बैंकों ने इस प्रणाली को छोड़कर बीआर का सहारा लिया। ये काम बिचौलियों की मदद से किया जाता है।

हर्षद ने इसका पूरा फायदा उठाया। वह बैंकों से 15 दिन के लिए उधार लेता और उसे शेयर मार्केट में लगा देता , और मुनाफा होने के बाद बैंकों को उनका पैसा वापस कर देता था।

हर्षद के इस राज का पर्दाफाश किया 1992 में टाइम्स ऑफ़ इंडिया की पत्रकार सुचेता दलाल ने। उन्होंने 23 अप्रैल 1992 को टाइम्स ऑफ इंडिया के कॉलम में इस पुरे घोटाले का विवरण लिखा और दुनिया के सामने हर्षद का पोल खोल दिया। इसके बाद उन्होंने इस पूरी घटना पर ''द स्कैम '' नाम की किताब भी लिखी।

हर्षद कुछ शेयरों की मांग बढ़ाने के लिए बैंकों के पैसे का इस्तेमाल करता था । पैसे लगाने के लिए उसने एसीसी, स्टरलाइट इंडस्ट्रीज और अपोलो टायर्स जैसी अच्छी तरह से स्थापित कंपनियों को चुना। उसके पैसे लगाने की समझ का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है की जब उसने एसीसी की शेयर खरीदे तब उनकी कीमत 200 रुपये थी, लेकिन लगभग 2 महीने की अवधि में ये कीमत बढ़कर 9000 रूपए हो गयी।

समय के साथ हर्षद का पैसा बढ़ता रहा और उसने खूब दौलत कमाई। फिर एक वक़्त ऐसा आया जब शेयर मार्केट घाटे में चलने लगा ,जिससे मेहता समय पर बैंकों को उनका पैसा नहीं लौटा पाया। इसके बाद मेहता का यह राज पूरी दुनिया के सामने का गया।

bombay stock exchange/ harshad mehta स्टॉक मार्किट के बिग बुल कहे जाते थे हर्षद मेहता।(Wikimedia Commons)


बात बढ़ने पर इस पूरे मामले की जाँच के लिए संयुक्त संसदीय समिति गठित की गयी। हर्षद मेहता पर 72 आपराधिक अपराधों और 600 से अधिक आपराधिक कार्रवाई के मुकदमों का आरोप लगाया गया था , जिसके बाद सीबीआई ने हर्षद को उसके दोनों भाइयों सहित गिरफ्तार कर लिया। साथ ही , आईटी विभाग ने उस पर 11,174 करोड़ रुपये का आयकर बकाया होने का दावा किया। हर्षद के साथ इस घोटाले के लिए कई बैंकरों को भी दोषी ठहराया गया था।

3 महीने हिरासत में रखने के बाद मेहता को जमानत पर रिहा कर दिया गया।

जमानत मिलते ही हर्षद ने एक प्रेस कांफ्रेंस के जरिये उस वक़्त के प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव पर उससे 1 करोड़ का घूस लेने का आरोप लगाया। हालांकि ,राव ने उसके आरोपों को सिरे के खारिज कर दिया।

जमानत मिलते ही धीरे धीरे उसने फिर से अपना बिज़नेस संभालना शुरू कर दिया।

हर्षद को कई मामलों में जमानत मिल चुकी थी , पर कई अन्य मामलो पर अभी भी केस चलता रहा और सितंबर 1999 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने उसे दोषी ठहराया और 5 साल कैद की सजा सुनाई। आख़िरकार 2001 में उसे गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया।

31 दिसंबर को 48 वर्ष की आयु में ठाणे जेल में दिल का दौरा पड़ने से मेहता की मृत्यु हो गई। बता दें की जब हर्षद की मृत्यु हुई, तब भी उसके खिलाफ 27 मामले लंबित थे।

यह भी पढ़ें : सन 1996 का ऐसा घोटाला जिस पर फैसला आया था 20 साल बाद

इकोनॉमिक टाइम्स द्वारा रिपोर्ट किया गया है, कुछ वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि हर्षद मेहता ने कोई धोखाधड़ी नहीं की, "उन्होंने बस सिस्टम में खामियों का फायदा उठाया"।

हर्षद मेहता घोटाले को लेकर लोगों का अलग अलग नजरिया है। कुछ लोगों का मानना है की बड़े चेहरों को बचाने के लिए उसे बलि का बकरा बनाया गया , वहीं कुछ का कहना है की हर्षद मेहता ने देश को लूटने का काम किया।

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