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ओपिनियन

धर्म एक विषय है या स्वयं में सवाल?

धर्म को समझने केलिए क्या मेरा उस धर्म का होना ज़रूरी है, या उस सोच से जुड़े रहना ज़रूरी है? और कब तक हम धर्म को विषय के तौर पर देखते रहेंगे, इस सोच को बदलना ज़रूरी है।

धर्म इस लौ की तरह है, जब तक घी डालोगे जलती रहेगी। (Pixabay)

‘भारत’ एक ऐसा देश है जहाँ हर जीव में भगवान को ढूंढा जाता है, जहाँ हर चौराहे पर मंदिर या मज़ार के दर्शन हो जाते हैं। शायरों के महल्लों से लेकर गंगा की पौड़ी तक कण कण में धर्म छुपा है। आरती और अज़ान को एक जैसी भक्ति के साथ ही सुना जाता है। 

मगर विश्व के पटल पर हम खुदको धर्मनिरपेक्ष कहते हैं और अपने खुद के देश में धर्म पर लड़ाई की बात करते हैं।


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आज का दौर इस मोड़ पर खड़ा है कि मेरा मंदिर जाना उसे पसंद नहीं और तेरा मज़्जिद में कदम रखना मुझे गवारा नहीं| हम एक दौड़ में इस कदर फस चुके हैं कि खाई में कूदना भी अब समझदारी मानी जाएगी। दोस्तों यह दौड़ है ‘अंधेपन’ की जिसमे सही गलत का न तो कोई नाम है और न ही कोई मुकाम, बस चले जा रहे हैं। भगवा रंग एक धर्म का प्रतीक हो गया हरा रंग एक की पहचान बन गई, मगर किसी ने यह न सोचा की आज ज़रूरत किसकी है रंग की या उन सिक्कों की जिनसे असल ज़रूरतें पूरी होती हैं।

 मगर अब तो इन सिक्कों का भी इस्तेमाल नफरतों को भड़काने में किया जाता है, किताबों की जगह पत्थर को थमाया जाता है। उन भटके होंठों से जेहादी नारे लगवाए जाते हैं, जिन्हे अब तक यह तक न पता है कि आगे चलकर यही धर्मनिरपेक्ष देश की बात करेंगे।

दिल्ली दंगों के बाद की तस्वीर(VOA)

एक ऐसा तबका भी इस बीच खूब सुर्खियों में रहा जो आज़ाद देश को फिर से आज़ाद कराने के प्रयास में नारे बुलंद करता रहा। वह उन वीरों के बलिदान को भूलने की गलती कर गए जिन्होंने इस देश को ‘अंग्रेज़ों’ से आज़ाद कराया था। राजनीति के दलदल में इस कदर सीने तक धस गए कि उन्हें पता ही न चला की देश के लिए कह रहे हैं या विरोध में।

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हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री ने श्री राम जन्मभूमि का शिलान्यास किया था, उस जन्मभूमि की जिसके लिए न जाने कितने दंगे हुए न जाने कितनी जाने गईं मगर अंत में वही हुआ जो सर्वोच्च न्यायलय का फैसला था। मगर मज़े की बात यह है कि अभी भी एक राजनीतिक दल की तरफ से यह टिप्पणी आई की “अयोध्या में मस्जिद था, है और रहेगा”, अब क्या हम इसे ओछी राजनीति कहेंगे? या सर्वोच्च न्यायलय के फैसले की अवमानना कहेंगे? याद करें कि इसी राजनीतिक दल ने उस टुकड़े टुकड़े गैंग का साथ दिया था जिस पर देश विरोधी नारे लगाने का आरोप है। और तो और एक राजनीतिक दल भी इस देश में मौजूद है जिसका मानना था कि श्री राम हैं ही नहीं, उनका कोई प्रमाण ही नहीं है।

धर्म पर वाद-विवाद इस देश की पौराणिक रीत है, मगर जब भी उजागर होती है तो नए सिरे शुरू होती है।

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Wikimedia Commons

बांके बिहारी मंदिर में होली

कहा जाता है कि अगर किसी इंसान को सुकून चाहिए होता है तो उसे वृंदावन या मथुरा की गलियों में जाना चाहिए, क्योंकि इन्ही गलियों में खेलते हुए कृष्ण जी का बचपन बीता हैं। वृंदावन हो या मथुरा यहां हर दूसरा व्यक्ति कृष्ण भक्ति में लीन नज़र आता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की वह हिंदुस्तानी है या कहीं और से आया है। हर कोई कृष्ण की महिमा में डूबा हुआ होता है। वैसे तो वृंदावन में कई मंदिर है जहां हर रोज हज़ारों की संख्या में भक्त आते हैं और अपनी हाजिरी लगवाते हैं, लेकिन बांके बिहारी मंदिर की बात अलग है। यहां भी भक्तों का मेला लगा रहता है, पर हर किसी को कुछ बातें मालूम नहीं है। ऐसे ही कुछ तथ्यों के बारे में इस आर्टिकल में बताया गया है।

1) बांके बिहारी मंदिर की स्थापना स्वामी श्री हरिदास जी ने की थी। वह श्री कृष्ण के भक्त थे और महान गायक तानसेन के गुरु थे। वह अपने गीत से श्री कृष्ण को प्रसन्न करने की कोशिश किया करते थे। ऐसा कहा जाता है कि श्री हरिदास जी की भक्ति से प्रसन्न हो श्री कृष्ण ने दर्शन दिए थे।

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(instagram , virat kohali)

भारतीय क्रिकेट टीमके कप्तान विराट कोहली और अनुष्का

भारतीय क्रिकेट टीमके कप्तान विराट कोहली और उनके फाउंडेशन ने यहां मड, मलाड में आवारा पशुओं के लिए एक ट्रॉमा और रिहेब सेंटर का उद्घाटन किया है। इसके पहले इस साल की शुरूआत में, भारतीय कप्तान कोहली ने कहा था कि वह मुंबई में दो पशु देखभाल सुविधाएं स्थापित कर रहे हैं।
कोहली ने अपनी पत्नी अनुष्का शर्मा को शहर में आवारा जानवरों के सामने आने वाली कठिनाइयों को देखने का श्रेय दिया।

अभिनेत्री अनुष्का ने कई मौकों पर जानवरों के कल्याण और उनके अधिकारों के प्रति अपना समर्थन दिया है। अनुष्का के जानवरों के प्रति दीवानगी से प्रेरित होकर कोहली अपने फाउंडेशन के जरिए आवारा जानवरों की मदद करने के मौके तलाश रहे हैं।

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भीड़ में चलते लोग।

मौजूदा समय में विश्व की जनसंख्या 7 अरब से भी ज्यादा है। इस जनसंख्या को यहां तक पहुंचने में कई सदियां लग गई है। समस्त विश्व को 1 अरब से 2 अरब तक की आबादी होने में 100 सालों का समय लगा था। लेकिन 2 अरब से 3 अरब होने में मात्र 30 साल लगे, वहीं 3 से 4 अरब होने में 15 साल लगे थे। उसके बाद से यह अंतर और कम हो गया। औद्योगिक क्रांति के बाद अठारहवीं शताब्दी में विश्व जनसंख्या में विस्फोट हुआ था। तकनिकी प्रगति की वजह से मृत्यु दर में गिरावट आई जो कि जनसंख्या विस्फोट का एक बहुत बड़ा कारण बना। भारत में भी जनसंख्या विस्फोट देखा गया था।

1951 में भारत की जनसंख्या मात्र 36.1 करोड़ थी जो 2011 की जनगणना में 121.02 करोड़ हो गई। और अब यह लगभग 135 करोड़ के ऊपर है। अगर किसी क्षेत्र की जनसंख्या बढ़ती है तो उसका मतलब है कि वहाँ का मृत्यु दर कम है और जन्म दर ज्यादा। यह दर्शाता है कि उस जगह पर चिकित्सकीय सुविधाएं अच्छी है। लेकिन बढ़ती जनसंख्या देश के लिए मुसीबत का सबब भी बन सकती है, क्योंकि जनसंख्या में वृद्धि हुई है किन्तु साधनों में नहीं। भारत के साथ भी यही समस्या है। लगातार जनसंख्या बढ़ने से कई जगहों पर साधनों की कमी महसूस होने लगी है।

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