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संस्कृति

त्योहारों के बदले मिज़ाज से दीपावली भी अछूती नहीं

इस दिवाली क्या-क्या बदलाव आया है और किसकी झोली में खुशियों की रौशनी आकर गिरी है यह सब इस लेख से जानने की कोशिश करते हैं। Happy Diwali 2020

(Pixabay)

दीपावली पर्व को असत्य पर सत्य के विजय के रूप में मनाया जाता है। यह त्यौहार देश भर में बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। मित्रगण एक दूसरे को उपहार देते हैं, खुशियां बांटते हैं और मिल-जुल कर रहने का संकल्प लेते हैं। दीपावली साल 2020 में भी इसी तरह मनाई जा रही है किन्तु इस वर्ष लोग कोरोना महामारी पर विजय पाने की प्रार्थना कर रहे हैं। जैसा कि आप सब जानते हैं कि कोरोना महामारी ने त्योहारों का रंग-रूप ही बदल दिया है। उचित दूरी और मास्क ही हम सबके लिए इस महामारी से बचने का विकल्प है।

क्या बदलाव आएं हैं इस वर्ष की दीपावली में?


अन्य वर्षों के मुकाबले इस वर्ष, उपहार बनाने वाली कंपनियां बहुत डर-डर कर अपने उत्पाद को बाजार में उतार रही है। क्योंकि उन्हें यह भय है कि क्या यह सब बिक पाएंगें? यह डर जायज़ भी है क्योंकि कई शहरों में कोरोना स्तर बढ़ने लगा है और लोग अपनों के घर जाने से कतरा भी रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वोकल फॉर लोकल का नारा देश को दिया है। जिसका परिणाम भी देखा जा सकता है क्योंकि लोग अब चीनी उत्पादों से ज़्यादा लोकल उत्पादों की खरीदारी कर रहे हैं। इसके दो मुख्य कारण हैं, पहला, भारत-चीन सीमा पर विवाद और इसी वर्ष चीनी सेना द्वारा किए गए भारतीय सैनिकों पर कायरतापूर्ण हमला जिससे भारतीय व्यापारियों और जनता में चीन के खिलाफ गुस्सा है। दूसरा, मध्यम एवं उच्च वर्गीय लोग अपनी दीपावली खुशी एवं उल्लास के साथ मना लेते हैं किन्तु गरीब तबका वह खुशी नहीं महसूस कर पता है। वैसे भी कोरोना महामारी का सबसे बुरा प्रभाव इसी वर्ग पर हुआ है और खासकर मजदूर, कुम्हार और फूल विक्रेता पर। हमने पलायन की घटनाओं को तो देखा ही किन्तु कुम्हार और फूल विक्रेताओं का दुःख नहीं देख पाए। यही कारण है कि वोकल फॉर लोकल अनिवार्य एवं महत्वपूर्ण कदम है।

लोग त्यौहार के उल्लास में कोरोना महामारी को न भूल जाएं इसके लिए सरकार द्वारा उचित कदम भी उठाए जा रहे हैं। जैसे, बाजार में उचित दूरी बनाना और मास्क पहनना अनिवार्य है और जो कोई इन नियमों का पालन नहीं करता देखा गया उन पर पुलिस द्वारा जुर्माना लगाया गया।

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राजनीतिक गलियारे में किसकी रही दिवाली?

आप सबको ज्ञात है कि दिवाली से चार दिन पहले बिहार के विधानसभा चनाव और अन्य राज्यों में उप-चुनाव के नतीजे घोषित किए गए। जिसका परिणाम यह था कि भाजपा एवं एनडीए के लिए यह दिवाली खुशियों भरी रही। बिहार में राजद के लिए भी बिहार चुनाव खुशियां लेकर आई, क्योंकि सबसे अधिक सीटें राजद ने ही जीते हैं किन्तु समूह में अकेले जीतना काफी नहीं होता जिस वजह से उनके लिए यह दिवाली फीकी साबित हुई। उत्तरप्रदेश और गुजरात में भी भाजपा का अच्छा प्रदर्शन रहा और तो और मध्य-प्रदेश में भाजपा अपनी सरकार बचाने में सफल रही। इसलिए यह दिवाली भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए कई तोहफे ले आई।

इस साल भी नहीं जलाए जाएंगे पटाखे?

एक तो महामारी और उस पर से बढ़ता प्रदुषण स्तर इस देश के लिए चिंता बढ़ाती जा रही है। इसी वजह से सर्वोच्च न्यायलय ने यह आदेश दिए हैं कि इस दिवाली प्रदुषण फ़ैलाने वाले पटाखों की बिक्री पर रोक लगाई जाए और केवल ग्रीन पटाखे ही बाजार में उपलब्ध हों। कई राज्य इस आदेश से सहमत हैं और कुछ दो राय रखते हैं। किन्तु यह बात सही है कि प्रदूषण स्तर खतरनाक ढंग से बढ़ रहा है।

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(NewsGram Hindi)

अगले वर्ष भारत एक बार फिर सबसे बड़े राजनीतिक धमाचौकड़ी का साक्षी बनने जा रहा है। जिसकी तैयारी में अभी से राजनीतिक दल अपना खून पसीना एक कर रहे हैं। यह चुनावी बिगुल फूंका गया है राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, जहाँ जातीय समीकरण, विकास और धर्म पर खूब हो-हल्ला मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश चुनाव में जहाँ एक तरफ भाजपा हिन्दुओं को अपने पाले करने में जुटी वहीं विपक्ष ब्राह्मणों को अपनी तरफ करने के प्रयास में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। आने वाला उत्तर प्रदेश चुनाव क्या मोड़ लेगा इसका उत्तर तो समय बताएगा, किन्तु ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

आपको बता दें कि वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सभी पार्टियों ने खूब खून-पसीना बहाया था, किन्तु सफलता का परचम भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटों को जीत कर लहराया था। वहीं अन्य पार्टियाँ 50 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। भाजपा की इस जादुई जीत का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के धुआँधार रैली और मुख्यमंत्री चेहरे को जाहिर न करने को गया। किन्तु उत्तर-प्रदेश 2022 का आगामी चुनाव सत्ता पक्ष के चुनौतियों से भरा हो सकता है। वह इसलिए क्योंकि सभी राजनीतिक पार्टी अब धर्म एवं जाति की राजनीति के अखाड़े में कूद गए हैं। इसमें सबसे आगे हैं यूपी में राजनीतिक बसेरा ढूंढ रहे एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन औवेसी! जो खुलकर रैलियों में और टीवी पर यह कहते हुए सुनाई दे जाते हैं कि वह प्रदेश के मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए उत्तर प्रदेश आए हैं।

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(NewsGram Hindi, Shantanoo Mishra)

हिन्दू या हिंदुत्व, एक धर्म है या विचार इसका फैसला आज के समय में ग्रंथ, पुराण या धर्माधिकारी नहीं करते, अपितु इसका फैसला करता है कंप्यूटर के सामने बैठा वह तथाकथित बुद्धिजीवि जिसे न तो धर्म का ज्ञान है और न ही सनातन संस्कृति की समझ। इन्हें हम आम भाषा में लिब्रलधारी या लिब्रान्डू भी कहते हैं। यही तबका आज देश में ‘हिन्दू बांटों आंदोलन‘ का मुखिया बन गया है। समय-समय पर इस तबके ने देश में हिन्दुओं को हिंदुत्व के प्रति ही भड़काने का काम किया है। महिलाऐं यदि हिन्दू परंपरा अनुसार वस्त्र पहनती हैं तो वह इस तबके के लिए अभिव्यक्ति की आजादी पर चोट है और साथ ही यह पुराने जमाने का है, किन्तु इसी तबके के लिए हिजाब सशक्तिकरण की मूरत है। जब लव-जिहाद या धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाई गई थी तब भी इस तबके ने इसे प्रेम पर चोट या अभिव्यक्ति की आजादी जैसा बेतुका रोना रोया था। दिवाली पर जानवरों के प्रति झूठा प्रेम दिखाकर पटाखे न जलाने की नसीहत देते हैं और बकरी-ईद के दिन मौन बैठकर, सोशल मीडिया पर मिया दोस्त द्वारा कोरमा खिलाए जाने का इंतजार करते हैं।

सवाल करना एक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, किन्तु स्वयं को लिब्रलधारी बताने के लिए श्री राम और सनातन धर्म की परम्पराओं पर प्रश्न-चिन्ह उठाना कहाँ की समझदारी है? इसी तबके ने भारत में मुगलिया शासन को स्वर्णिम युग बताया था, साथ ही हिन्दुओं को मारने वाले टीपू सुल्तान जैसे क्रूर शासक को करोड़ों का मसीहा भी बताया था। लेकिन आज जब भारत का जागरुक युवा ‘छत्रपति सम्राट शिवाजी महाराज’ का नाम गर्व से लेता है तो यह तबका उसे भी संघी या बजरंग दल का बताने में देर नहीं करता। इस तबके के लिए हिंदुत्व धर्म नहीं एक पार्टी की विचारधारा और यह इसी मानसिकता को विश्व में अन्य लोगों तक पहुंचाकर हिन्दुओं को बदनाम करने का कार्य कर रहे हैं।

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(NewsGram Hindi, साभार: Wikimedia Commons)

आज शहीद स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे(Mangal Pandey) की 194वीं जयंती है। मंगल पांडे(Mangal Pandey) पराधीन भारत की आजादी के वह जननायक थे जिनके एक नारे ने स्वतंत्रता के संग्राम को नई ऊर्जा दिया था। मंगल पांडे(Mangal Pandey) को स्वतंत्रता का जनक भी कहा जाता है जिनके नक्शे-कदम पर चलकर शहीद भगत सिंह, आजाद जैसे वीरों ने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। मंगल पांडे(Mangal Pandey) उन वीरों में से थे जिनके लिए धर्म एवं स्वाभिमान भी बड़ा था और राष्ट्र की स्वतंत्रता भी।

मंगल पांडे!

शहीद मंगल पांडे 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में जन्में थे। मंगल पांडे(Mangal Pandey) क्रांतिकारी के रूप में उभरने से पूर्व कलकत्ता (कोलकाता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री” के सिपाही थे। अंग्रेजों ने भारतीय सिपाहियों को भी बहुत प्रताड़ित किया था। मंगल पांडे के साथ-साथ अन्य सैनिकों ने भी इन प्रताड़नाओं को सहा, किन्तु पानी सर से तब ऊपर चला गया जब भारतीय सैनिकों को सूअर और गाय की चर्भी लगे बारूद वाली बंदूक दी गईं। मंगल ब्राह्मण थे जिस वजह से उन्होंने अपने साथी सिपाहियों के साथ इसकी शिकायत बड़े अधिकारीयों से की। किन्तु इस मामले पर सुनवाई न होता देख उनमें प्रतिशोध की भावना उमड़ पड़ी।

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