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थोड़ा हट के

आओ! ‘आज’ को समझे द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की पंक्तियों से

1 दिसम्बर 1916 में जन्मे द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ने सदा बच्चों के लिए लिखा। आज उन्ही के कविताओं को उदाहरण बना कर आज को जानने की कोशिश करते हैं।

(Unsplash)

हाथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहीं
वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!

सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर डरो नहीं तुम निडर डटो वहीं.
वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!(वीर तुम बढ़े चलो!)


‘बच्चों के कवि’ द्वारिका प्रसाद सदा बच्चों का हौसला बढ़ाने वाली कविताओं की रचना करते रहे, किन्तु क्या ‘कल के भविष्य’ में, कुछ कर गुज़र जाने का हौसला है? वह इसलिए क्योंकि आज के आधुनिक दौर में हम सबने सोचना छोड़ दिया है। आज की दोहरी विचारधाराओं में हमारा मस्तिक्ष सही गलत का बोध भूल गया है। वह यह नहीं जानता कि संस्कृति बड़ी है या आधुनिकरण। जिसका उदाहरण है यूट्यूब पर वह सैकड़ों वीडियोज़ जिसमे आज के युवा को देश के प्रथम प्रधानमंत्री का नाम तक नहीं पता।

देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से
सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से
जाति भेद की, धर्म-वेश की
काले गोरे रंग-द्वेष की
ज्वालाओं से जलते जग में
इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥(इतना ऊँचा उठो!)

आज टुकड़े-टुकड़े वालों का यह आतंक है कि एक पिता अपनी ही बेटी पर जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगा रहा है। यह सही है कि किसी अन्य धर्म पर तंज या कटाक्ष कसना गलत है, मगर केवल एक ही धर्म को सालों तक कोसना कहाँ तक ठीक है? हिन्दू टेरर या भगवा आतंकवाद जैसे शब्दों की क्या जरूरत है जब आतंकवाद का कोई धर्म नहीं? यह इसलिए भी जरुरी है क्योंकि आतंकवाद के नाम पर एक ही देश का नाम याद आता है और उस देश में रह रहे बहुसंख्यक धर्म का। जिसने 26/11 और पुलवामा जैसे अपराध को जन्म दिया।

यह भी पढ़ें: “धर्मो रक्षति रक्षतः” आज इस विषय पर मतभेद क्यों?

सरस्वती का पावन मंदिर
यह संपत्ति तुम्हारी है।
तुम में से हर बालक इसका
रक्षक और पुजारी है।
शत-शत दीपक जला ज्ञान के
नवयुग का आह्वान करो।(उठो धरा के अमर सपूतों)

किन्तु ऊरी-सर्जिकल स्ट्राइक फिल्म की एक पंक्ति बड़ी जोशवर्धक है कि “यह नया भारत है, यह घर में घुसेगा भी और मरेगा भी” और सर्जिकल स्ट्राइक पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले का सटीक जवाब है। ‘हिंदुस्तान’ स्वयं में एक एक मंदिर है जहाँ सभी संप्रदाय के लोग एकजुट हो कर रहते हैं, मगर कुछ हैं जिन्हे इस अखंडता से चिढ़ है। वह पूरी कोशिश करते हैं इसमें बाधा बनने की। उदाहरण के रूप में कश्मीर में पीडीपी की नेता बोलती हैं कि हिंदुस्तान का झंडा नहीं उठाएंगे। ए.आई.एम.आई.एम के नेताओं को हिंदुस्तान शब्द से ही आपत्ति है, तथाकथित बुद्धिजीवियों का अवॉर्ड वापसी का नाटक तब क्यों रुक जाता है, जब एक मंदिर की मूर्तियों को तोड़ा जाता है। तब उन्हें असहिष्णुता क्यों नज़र नहीं आता है?

”अरे ओ! दुःशासन निर्लज्ज!
देख तू नारी का भी क्रोध।
किसे कहते उसका अपमान
कराऊँगी मैं इसका बोध॥(सत्य की जीत: भाग 1)

लव-जिहाद के विरोध में आए कानून का विरोध क्यों? या राजनीति चमकाने के लिए और तबके को खुश करने के लिए क्या हम अत्याचार को भी भुला दें? यह सवाल भी कभी खुद से करना। क्योंकि इन सत्ताधारियों को उस पायदान पर हमने ही पहुँचाया है।

(सभी कविताएं द्वारिका प्रसाद द्वारा रचित अलग-अलग कविताओं का छोटा सा अंश है।)

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(NewsGram Hindi)

अगले वर्ष भारत एक बार फिर सबसे बड़े राजनीतिक धमाचौकड़ी का साक्षी बनने जा रहा है। जिसकी तैयारी में अभी से राजनीतिक दल अपना खून पसीना एक कर रहे हैं। यह चुनावी बिगुल फूंका गया है राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, जहाँ जातीय समीकरण, विकास और धर्म पर खूब हो-हल्ला मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश चुनाव में जहाँ एक तरफ भाजपा हिन्दुओं को अपने पाले करने में जुटी वहीं विपक्ष ब्राह्मणों को अपनी तरफ करने के प्रयास में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। आने वाला उत्तर प्रदेश चुनाव क्या मोड़ लेगा इसका उत्तर तो समय बताएगा, किन्तु ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

आपको बता दें कि वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सभी पार्टियों ने खूब खून-पसीना बहाया था, किन्तु सफलता का परचम भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटों को जीत कर लहराया था। वहीं अन्य पार्टियाँ 50 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। भाजपा की इस जादुई जीत का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के धुआँधार रैली और मुख्यमंत्री चेहरे को जाहिर न करने को गया। किन्तु उत्तर-प्रदेश 2022 का आगामी चुनाव सत्ता पक्ष के चुनौतियों से भरा हो सकता है। वह इसलिए क्योंकि सभी राजनीतिक पार्टी अब धर्म एवं जाति की राजनीति के अखाड़े में कूद गए हैं। इसमें सबसे आगे हैं यूपी में राजनीतिक बसेरा ढूंढ रहे एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन औवेसी! जो खुलकर रैलियों में और टीवी पर यह कहते हुए सुनाई दे जाते हैं कि वह प्रदेश के मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए उत्तर प्रदेश आए हैं।

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(NewsGram Hindi, Shantanoo Mishra)

हिन्दू या हिंदुत्व, एक धर्म है या विचार इसका फैसला आज के समय में ग्रंथ, पुराण या धर्माधिकारी नहीं करते, अपितु इसका फैसला करता है कंप्यूटर के सामने बैठा वह तथाकथित बुद्धिजीवि जिसे न तो धर्म का ज्ञान है और न ही सनातन संस्कृति की समझ। इन्हें हम आम भाषा में लिब्रलधारी या लिब्रान्डू भी कहते हैं। यही तबका आज देश में ‘हिन्दू बांटों आंदोलन‘ का मुखिया बन गया है। समय-समय पर इस तबके ने देश में हिन्दुओं को हिंदुत्व के प्रति ही भड़काने का काम किया है। महिलाऐं यदि हिन्दू परंपरा अनुसार वस्त्र पहनती हैं तो वह इस तबके के लिए अभिव्यक्ति की आजादी पर चोट है और साथ ही यह पुराने जमाने का है, किन्तु इसी तबके के लिए हिजाब सशक्तिकरण की मूरत है। जब लव-जिहाद या धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाई गई थी तब भी इस तबके ने इसे प्रेम पर चोट या अभिव्यक्ति की आजादी जैसा बेतुका रोना रोया था। दिवाली पर जानवरों के प्रति झूठा प्रेम दिखाकर पटाखे न जलाने की नसीहत देते हैं और बकरी-ईद के दिन मौन बैठकर, सोशल मीडिया पर मिया दोस्त द्वारा कोरमा खिलाए जाने का इंतजार करते हैं।

सवाल करना एक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, किन्तु स्वयं को लिब्रलधारी बताने के लिए श्री राम और सनातन धर्म की परम्पराओं पर प्रश्न-चिन्ह उठाना कहाँ की समझदारी है? इसी तबके ने भारत में मुगलिया शासन को स्वर्णिम युग बताया था, साथ ही हिन्दुओं को मारने वाले टीपू सुल्तान जैसे क्रूर शासक को करोड़ों का मसीहा भी बताया था। लेकिन आज जब भारत का जागरुक युवा ‘छत्रपति सम्राट शिवाजी महाराज’ का नाम गर्व से लेता है तो यह तबका उसे भी संघी या बजरंग दल का बताने में देर नहीं करता। इस तबके के लिए हिंदुत्व धर्म नहीं एक पार्टी की विचारधारा और यह इसी मानसिकता को विश्व में अन्य लोगों तक पहुंचाकर हिन्दुओं को बदनाम करने का कार्य कर रहे हैं।

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(NewsGram Hindi, साभार: Wikimedia Commons)

आज शहीद स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे(Mangal Pandey) की 194वीं जयंती है। मंगल पांडे(Mangal Pandey) पराधीन भारत की आजादी के वह जननायक थे जिनके एक नारे ने स्वतंत्रता के संग्राम को नई ऊर्जा दिया था। मंगल पांडे(Mangal Pandey) को स्वतंत्रता का जनक भी कहा जाता है जिनके नक्शे-कदम पर चलकर शहीद भगत सिंह, आजाद जैसे वीरों ने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। मंगल पांडे(Mangal Pandey) उन वीरों में से थे जिनके लिए धर्म एवं स्वाभिमान भी बड़ा था और राष्ट्र की स्वतंत्रता भी।

मंगल पांडे!

शहीद मंगल पांडे 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में जन्में थे। मंगल पांडे(Mangal Pandey) क्रांतिकारी के रूप में उभरने से पूर्व कलकत्ता (कोलकाता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री” के सिपाही थे। अंग्रेजों ने भारतीय सिपाहियों को भी बहुत प्रताड़ित किया था। मंगल पांडे के साथ-साथ अन्य सैनिकों ने भी इन प्रताड़नाओं को सहा, किन्तु पानी सर से तब ऊपर चला गया जब भारतीय सैनिकों को सूअर और गाय की चर्भी लगे बारूद वाली बंदूक दी गईं। मंगल ब्राह्मण थे जिस वजह से उन्होंने अपने साथी सिपाहियों के साथ इसकी शिकायत बड़े अधिकारीयों से की। किन्तु इस मामले पर सुनवाई न होता देख उनमें प्रतिशोध की भावना उमड़ पड़ी।

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