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टेक्नोलॉजी

न्यूज सब्सक्रिप्शन के नए फीचर के साथ यूजर्स को आकर्षित कर रहा फेसबुक

लार्जेन ने अपने ब्लॉग पोस्ट पर कहा, "फीचर का मकसद पब्लिशर्स का अपने सब्सक्राइबर्स संग रिश्ते को गहरा बनाने में उनकी मदद करना और साथ ही इन सब्सक्राइबर्स को फेसबुक पर अधिक से अधिक समाचारों के पढ़ने के उनके अनुभव को भी बेहतर बनाना है।"

न्यूज सब्सक्रिब्शंस के नए फीचर के साथ यूजर्स को आकर्षित कर रहा फेसबुक(सांकेतिक तस्वीर, Pexel)

फेसबुक एक ऐसे नए फीचर पर काम कर रहा है जिससे आप अपने अकाउंट को भुगतान किए गए न्यूज सब्सक्रिप्शन के साथ लिंक कर सकेंगे ताकि इन्हें पढ़ने के लिए आपको दोबारा लॉगिन करने या पेवॉल पर क्लिक करने की जरूरत न पड़े। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के इस नए फीचर से 2.7 अरब यूजर्स लाभान्वित होंगे। एक बार इस फीचर के लागू हो जाने से लिंक्ड सब्सक्राइबर्स को किसी आर्टिकल वगैरह को पढ़ने के लिए बार-बार लॉगिन करने के झंझट से आजादी मिलेगी और इसी तरह से पेवॉल का भी सामना नहीं करना पड़ेगा।

कंपनी की तरफ से उठाया जा रहा यह कदम ऐप्पल न्यूज प्लस, फ्लिपबोर्ड, गूगल न्यूज व सीएनएन न्यूज एग्रीगेटर जैसे प्लेटफॉर्म को एक ललकार है। फिलहाल अधिकतर बड़े-बड़े समाचार संगठनों के अपने पेवॉल है जिससे उनकी सदस्यता के बाहर लोग नहीं पढ़ पाते हैं। अपने व्यवसाय में अधिक लाभ के चलते ये सब्सक्रिप्शंस की संख्या को अधिक बढ़ाने पर ज्यादा गौर फरमाते हैं।


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फेसबुक पर प्रोडक्ट मार्केटिंग मैनेजर स्टीफन लार्जेन के मुताबिक, कंपनी इस नए फीचर का परीक्षण करने के लिए दुनिया भर के तमाम पब्लिशर्स संग गठजोड़ कर रहा है। यह यूजर्स को फेसबुक पर अपने समाचार सदस्यता खातों को लिंक करने की अनुमति देता है।

जब सब्सक्राइबर्स अपने अकाउंट्स को समाचार प्रकाशकों संग जोड़ेगा, तो उन्हें पहले से अधिक कंटेंट दिखगे। (सांकेतिक तस्वीर, Pexel)

लार्जेन ने अपने ब्लॉग पोस्ट पर कहा, “फीचर का मकसद पब्लिशर्स का अपने सब्सक्राइबर्स संग रिश्ते को गहरा बनाने में उनकी मदद करना और साथ ही इन सब्सक्राइबर्स को फेसबुक पर अधिक से अधिक समाचारों के पढ़ने के उनके अनुभव को भी बेहतर बनाना है।”

कंपनी के मुताबिक, जून के महीने में एक परीक्षण के दौरान जिन सब्सक्राइबर्स ने अपने अकाउंट्स को लिंक किया, वे उन लोगों के मुकाबले औसतन 111 फीसदी अधिक आर्टिकल पर क्लिक किए, जो टेस्ट ग्रुप का हिस्सा नहीं रहे। इन सब्सक्राइबर्स के पब्लिशर को फॉलो करने की दर में 97 फीसदी तक की वृद्धि आई, जो पहले महज 34 फीसदी थी। इससे पता चलता है कि जब सब्सक्राइबर्स ने अपने अकाउंट्स को समाचार प्रकाशकों संग जोड़ा, तो उन्हें पहले से अधिक कंटेंट दिखने लगे।

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फिलहाल, अमेरिका में अटलांटा जर्नल-कॉन्स्टिट्यूशन, द एथलेटिक और द विनीपेग फ्री प्रेस ऐसे कुछ अखबार हैं, जो इस फीचर को अपनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।(आईएएनएस)

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पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने स्लीपर सेल्स के ज़रिये दिल्ली में लगवाई आईईडी- रिपोर्ट (Wikimedia Commons)

एक सूत्र ने कहा कि आरडीएक्स-आधारित इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (IED), जो 14 जनवरी को पूर्वी दिल्ली के गाजीपुर फूल बाजार में पाया गया था और उसमें "एबीसीडी स्विच" और एक प्रोग्राम करने योग्य टाइमर डिवाइस होने का संदेह था।

कश्मीर और अफगानिस्तान में सक्रिय जिहादी आतंकवादियों द्वारा लगाए गए आईईडी में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किए जाने वाले इन स्विच का पाकिस्तान(Pakistan) सबसे बड़ा निर्माता है। सूत्र ने कहा कि इन फोर-वे स्विच और टाइमर का उपयोग करके विस्फोट का समय कुछ मिनटों से लेकर छह महीने तक के लिए सेट किया जा सकता है।

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8 जनवरी को चुनाव आयोग(Election Commission of India) द्वारा जारी के गए 5 राज्यों के विधान सभा चुनावों(Vidhan Sabha Election 2022) के तारिखों के ऐलान से चुनावी गहमा-गहमी चरम पर है। आपको बता दें कि वर्ष 2022 में 5 अहम राज्यों में विधान सभा चुनाव आयोजित होने जा रहे हैं। यह राज्य हैं उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखण्ड, गोवा एवं मणिपुर। साथ ही उत्तर प्रदेश(Uttar Pradesh) में होने जा रहे चुनाव को 7 चरणों में बांटा गया है, मणिपुर 2 चरणों में और गोवा, उत्तराखण्ड, पंजाब(Punjab) में चुनाव 1 चरण में आयोजित किया जाएगा। चुनाव तारीखों के घोषित होने बाद सभी राजनीतिक दल एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं और हर वह हथकंडा अपना रहे हैं जिससे मतदाता आकर्षित हों। साथ ही अब यह भी संभावना अधिक है कि इस बीच चुनावी जमाखोरी बढ़ जाएगी।

पिछले चुनाव में पार्टियों ने कितना खर्च किया था?

आपको जानकारी के लिए बता दें कि 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में करीब 5,500 करोड़ रूपये बड़ी पार्टियों द्वारा चुनाव अभियान में खर्च किए गए थे। साथ ही एक मीडिया रेपोर्ट के अनुसार 1000 करोड़ से अधिक पैसा मतदाताओं को पैसे से या शराब से लुभाने में खर्च किए गए थे। आपको यह भी बता दें कि 2017 में ही हुए 5 राज्यों में विधान सभा चुनाव में 1.89 अरब रूपये खर्च किए गए थे, जिसमें बाहरी खर्च कितना था इसका कोई हिसाब-किताब नहीं है।

इसके साथ विधानसभा में चुनाव आयोग ने निर्धारित की खर्च सीमा प्रति उम्मीदवार 30 लाख तय किया है, किन्तु यह सभी जानते हैं कि इसका पालन नहीं होता है। बल्कि बाहरी खर्च और वोट के लिए नोट का इस्तेमाल कर बेहिसाब पैसा बहाया जाता है। सभी पार्टियां, पार्टी चंदे को भी चुनाव में होने वाले खर्च के लिए इस्तेमाल करती हैं। साथ ही टिकट बिक्री को भी चुनावी जमाखोरी में गिना जा सकता है। हालही में आम आदमी पार्टी के खुदके विधायक ने अरविन्द केजरीवाल पर करोड़ों रुपयों के बदले टिकट बेचने का आरोप लगाया है।
जैसा की आपको पता है कि इस साल होने वाले 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव सभी पार्टियों की नाक की बात बन गई है, जिस वजह से हर कोई अपने-अपने तरीके से लोगों को जुटाने में और चीजों को भुनाने में जुटा हुआ है। चाहे वह बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा हो या 'मैं लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ', किन्तु आज भी हम यह कह सकते हैं कि किसी भी प्रदेश ने महिलाओं की सुरक्षा का ठोस आश्वासन नहीं दिया है। इसी तरह भ्रष्टाचार और पैसों की जमाखोरी पर किसी भी सरकार को निर्दोष करार दे देना समझदारी का काम नहीं होगा। आपको बता दें कि एक समय ऐसा भी था जब समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता और सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल यादव ने यह स्वीकारा था कि समाजवादी पार्टी के सरकार में भ्रष्टाचार होता था।

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राष्ट्रपति भवन (Wikimedia Commons)

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rastrapati bhavan, mughal garden राष्ट्रपति भवन स्थित मुगल गार्डन (Wikimedia Commons)

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