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संस्कृति

क्यों भुला दिया गया भारत के प्राचीन गौरव को?

भारतीय शिक्षा के दो प्रमुख स्तम्भ तक्षिला एवं नालंदा विश्वविद्यालय। एक ने विश्व को आयुर्वेद का ज्ञान दिया और एक विश्व को भारत का ज्ञान दिया। दोनों को ही स्वयं भारत कहीं भुला चुका है।

प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय। (Wikimedia Commons)

भारत की शिक्षा प्रणाली विश्व-भर में प्रसिद्ध है। वह इसलिए क्योंकि जो शिक्षा विद्यार्थियों को भारत में दी जाती है वह अन्य देशों के मुकाबले अधिक विकसित और प्रभावशाली होती है। यही वजह है कि भारतीय छात्र/छात्राएं न केवल देश में नाम कमाते हैं बल्कि विदेशों में भी देश का नाम ऊँचा करते हैं। किन्तु भारत के लिए यह दुर्भाग्य कहिए या विचारों में मतभेद कि विश्व के सबसे प्रथम विश्वविद्यालय तक्षशिला को कहीं नहीं पुकारा जाता। 700 ईसा पूर्व में स्थापित हुआ यह विश्वविद्यालय इतिहास के पन्नों से गायब हो गया, और तो और विश्वभर में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करने वाले नालंदा विश्वविद्यालय को भी कहीं खो दिया।

एक ऐसा विश्वविद्यालय जिसने चाणक्य जैसे विद्वान को विश्व के सामने लेकर आया, जिन्होंने मौर्य वंश को स्थापित किया। जहाँ पर न जाने कितने विद्वानों ने शिक्षा ग्रहण की, आज उसी को भुला दिया गया। नालंदा विश्वविद्यालय तक्षशिला से 1200 साल बाद स्थापित हुआ और तीन-तीन मुगलों द्वारा किए गए आक्रमणों को सहा, उसका भी आज के युवा वर्ग के विचारों या चर्चा में कोई अंश नहीं।


यह गलती किसकी?

गलती भुनाना बहुत आसान काम है किन्तु खुद गलती स्वीकार करना बहुत मुश्किल। अगर इतिहास को देखें तो मुगलों और अंग्रेज़ों ने भारतीय इतिहास और सभ्यता को बहुत हानि पहुंचाई है। मुगल शासकों ने न जाने कितने मठ एवं मंदिरों को ध्वस्त कर दिया और अंग्रेजों ने भरपूर कोशिश की, भारत के इतिहास को तहस-नहस करने की, और वह कुछ हद तक सफल भी रहे। क्योंकि आज के युवाओं और तथाकथित बुद्धिजीविओं को पश्चिमी संस्कृति ज़्यादा रास आ रही है। ग्रंथों से ज़्यादा अभद्रता से लिप्त फिल्में पसंद आ रहीं हैं। विद्यालयों के पाठ्यक्रमों में भारतीय संस्कृति के विषय लुप्त हो चुके हैं।

इस हश्र में केवल उनकी ही गलती नहीं, हमारी भी गलती है क्योंकि भारत के प्राचीन इतिहास को हमने कभी महत्व ही नहीं दिया। न गूगल पर ढूंढा न किसी से पूछने की कोशिश की और इसी ‘टाल देने के भाव’ का लाभ उठाते हैं वह वामपंथी विचारधारा जिसने न कभी भारत के महत्व को समझा और न ही समझाने दिया। न जाने कितनी सरकारें आई और चली गई किन्तु किसी ने भी भूतकाल को भविष्य से जुड़ने नहीं दिया।

तक्षशिला विश्वविद्यालय के विषय में थोड़ा ज्ञान:

तक्षिला विश्वविद्यालय उस समय ‘आयुर्वेद विज्ञान’ का केंद्र रहा था जिस समय विश्वभर में चिकित्सा शास्त्र का नमो-निशान नहीं था। कुछ लेखों से पता चलता है कि यहां के स्नातक मस्तिष्क के भीतर तथा अंतड़ियों तक का अस्रोपचार या ऑपरेशन बड़ी सुगमता से कर लेते थे। उस समय तक्षशिला विश्वविद्यालय से स्नातक होना अत्यंत गौरवपूर्ण माना जाता था।

यहाँ धनी तथा निर्धन दोनों ही छात्रों के पढ़ने की व्यवस्था थी। धनी छात्र आचार्य को भोजन, निवास एवं अध्ययन का शुल्क देते थे और निर्धन यानि कुशल से भरपूर लेकिन धन के आभाव में शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्र आश्रम का काम करते थे। और शिक्षा पूर्ण होने पर शुल्क देने की प्रतिज्ञा लेते थे। इस विश्वविद्यालय में अनेक असाध्य रोगों के उपचार सरल एवं सुलभ जड़ी बूटियों से करा जाता था। शिष्यों की संख्या प्राय: सौ से अधिक होती थी और अनेक बार 500 तक पहुंच जाती थी।

यह भी पढ़ें: वैदिक काल से प्रेरणा लेकर शिक्षा के वैश्वीकरण की तैयारी

नालंदा विश्वविद्यालय के विषय में थोड़ा ज्ञान:

नालंदा विश्वविद्यालय के शिक्षक अपने ज्ञान के लिए विश्वभर में प्रख्यात थे। जिनका चरित्र पारदर्शी एवं दोष-रहित और यही कारण था कि इसी विश्वविद्यालय में नागार्जुन, पदमसंभव जैसे महान विद्वान शिक्षा प्रदान करते थे। और बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करते थे। विद्यार्थियों का प्रवेश नालंदा विश्वविद्यालय में काफ़ी कठिनाई से होता था क्योंकि केवल उच्चकोटि के विद्यार्थियों को ही प्रविष्ट किया जाता था।

आवास, शिक्षा एवं भोजन के लिए कोई भी शुल्क नहीं लिया जाता था। सभी सुविधाएं नि:शुल्क थीं। राजाओं और धनी सेठों द्वारा दिये गये दान से इस विश्वविद्यालय का व्यय चलता था। इस विश्वविद्यालय को 200 ग्रामों की आय प्राप्त होती थी। नालंदा विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा ही विश्वभर में भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान का विस्तृत प्रचार प्रसार हुआ था। शीलभद्र जो उस समय इस विश्वविद्यालय के प्रधानचार्य थे उन्हें विश्वविद्यालय में पढ़ाई जाने वाली सभी विद्याओं का सामान ज्ञान था।

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(NewsGram Hindi)

अगले वर्ष भारत एक बार फिर सबसे बड़े राजनीतिक धमाचौकड़ी का साक्षी बनने जा रहा है। जिसकी तैयारी में अभी से राजनीतिक दल अपना खून पसीना एक कर रहे हैं। यह चुनावी बिगुल फूंका गया है राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, जहाँ जातीय समीकरण, विकास और धर्म पर खूब हो-हल्ला मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश चुनाव में जहाँ एक तरफ भाजपा हिन्दुओं को अपने पाले करने में जुटी वहीं विपक्ष ब्राह्मणों को अपनी तरफ करने के प्रयास में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। आने वाला उत्तर प्रदेश चुनाव क्या मोड़ लेगा इसका उत्तर तो समय बताएगा, किन्तु ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

आपको बता दें कि वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सभी पार्टियों ने खूब खून-पसीना बहाया था, किन्तु सफलता का परचम भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटों को जीत कर लहराया था। वहीं अन्य पार्टियाँ 50 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। भाजपा की इस जादुई जीत का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के धुआँधार रैली और मुख्यमंत्री चेहरे को जाहिर न करने को गया। किन्तु उत्तर-प्रदेश 2022 का आगामी चुनाव सत्ता पक्ष के चुनौतियों से भरा हो सकता है। वह इसलिए क्योंकि सभी राजनीतिक पार्टी अब धर्म एवं जाति की राजनीति के अखाड़े में कूद गए हैं। इसमें सबसे आगे हैं यूपी में राजनीतिक बसेरा ढूंढ रहे एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन औवेसी! जो खुलकर रैलियों में और टीवी पर यह कहते हुए सुनाई दे जाते हैं कि वह प्रदेश के मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए उत्तर प्रदेश आए हैं।

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(NewsGram Hindi, Shantanoo Mishra)

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सवाल करना एक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, किन्तु स्वयं को लिब्रलधारी बताने के लिए श्री राम और सनातन धर्म की परम्पराओं पर प्रश्न-चिन्ह उठाना कहाँ की समझदारी है? इसी तबके ने भारत में मुगलिया शासन को स्वर्णिम युग बताया था, साथ ही हिन्दुओं को मारने वाले टीपू सुल्तान जैसे क्रूर शासक को करोड़ों का मसीहा भी बताया था। लेकिन आज जब भारत का जागरुक युवा ‘छत्रपति सम्राट शिवाजी महाराज’ का नाम गर्व से लेता है तो यह तबका उसे भी संघी या बजरंग दल का बताने में देर नहीं करता। इस तबके के लिए हिंदुत्व धर्म नहीं एक पार्टी की विचारधारा और यह इसी मानसिकता को विश्व में अन्य लोगों तक पहुंचाकर हिन्दुओं को बदनाम करने का कार्य कर रहे हैं।

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(NewsGram Hindi, साभार: Wikimedia Commons)

आज शहीद स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे(Mangal Pandey) की 194वीं जयंती है। मंगल पांडे(Mangal Pandey) पराधीन भारत की आजादी के वह जननायक थे जिनके एक नारे ने स्वतंत्रता के संग्राम को नई ऊर्जा दिया था। मंगल पांडे(Mangal Pandey) को स्वतंत्रता का जनक भी कहा जाता है जिनके नक्शे-कदम पर चलकर शहीद भगत सिंह, आजाद जैसे वीरों ने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। मंगल पांडे(Mangal Pandey) उन वीरों में से थे जिनके लिए धर्म एवं स्वाभिमान भी बड़ा था और राष्ट्र की स्वतंत्रता भी।

मंगल पांडे!

शहीद मंगल पांडे 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में जन्में थे। मंगल पांडे(Mangal Pandey) क्रांतिकारी के रूप में उभरने से पूर्व कलकत्ता (कोलकाता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री” के सिपाही थे। अंग्रेजों ने भारतीय सिपाहियों को भी बहुत प्रताड़ित किया था। मंगल पांडे के साथ-साथ अन्य सैनिकों ने भी इन प्रताड़नाओं को सहा, किन्तु पानी सर से तब ऊपर चला गया जब भारतीय सैनिकों को सूअर और गाय की चर्भी लगे बारूद वाली बंदूक दी गईं। मंगल ब्राह्मण थे जिस वजह से उन्होंने अपने साथी सिपाहियों के साथ इसकी शिकायत बड़े अधिकारीयों से की। किन्तु इस मामले पर सुनवाई न होता देख उनमें प्रतिशोध की भावना उमड़ पड़ी।

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