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संस्कृति

Free Hindu Temples: क्या मंदिर भी सरकारी संपत्ति है?

देश भर में मंदिरों को सरकारी बंधनों से मुक्त करने के लिए मुहीम छेड़ी गई है जिसको भारी मात्रा में समर्थन भी प्राप्त हो रहा है।

तमिल नाडु के मंदिरों को सरकारी बंधनों से मुक्त कराने के लिए सोशल मीडिया पर मुहीम तेज है।(Wikimedia Commons)

मंदिर, जिन्हें हिन्दू धर्म में पवित्र एवं उच्च स्थान दिया जाता है। जहाँ हर वर्ग का व्यक्ति अपना दुःख लेकर जाता है, और उसे विश्वास रहता है कि भगवान उनके दुःखों का नाश करेंगे और उनके जीवन में किसी न किसी रूप में सुख प्रदान करेंगे। इन्ही देवालयों में भगवान की आराधना के लिए वह लोग भी आते हैं जिन्हे समृद्धि प्राप्त हुई होती है और साथ ही अपनी इच्छा अनुसार दान करते हैं। किन्तु, इस दान पर सरकार कब्ज़ा होता है। भारतीय नियमानुसार जितना भी धन एक मंदिर, दान के रूप में एकत्र करता है वह पूरा पैसा सरकार को जाता है और फिर सरकार मंदिर के रख-रखाव और पुजारियों के वेतन के लिए सिमित धन प्रदान करती है। 

किन्तु आश्चर्य की बात यह है कि यह पक्ष-पात केवल हिन्दू मंदिरों(Hindu Temples) के साथ ही किया जा रहा है। किसी गिरजा घर या मस्जिद से किसी भी तरह का धन, सरकार नहीं मांगती है। और यही कारण है की आज का हिन्दू समाज मंदिरों को सरकारी बेड़ियों से मुक्त कराने की बात कर रहा है।


सेक्युलर बकैतों की माने तो मंदिरों पर सरकारी दबाव जायज़ है, किन्तु यह कहाँ तक जायज़ है कि ओडिशा सरकार हिन्दू धर्म में परम आराध्य भगवान श्री जगन्नाथ मंदिर(Shri Jagannath Temple) जो कि पुरी में स्थित है उनकी 35,000 एकड़ जमीन बेचने की तयारी कर रही है। यह जमीन उन भक्तों द्वारा भगवान जगन्नाथ मंदिर के नाम किया गया था जिनकी मनोकामना पूर्ण हुई थी। किन्तु माना यह जा रहा है कि ओडिशा सरकार आस्था से ज्यादा पैसों को मोल दे रही है। और इसी फैसले के चलते #freeTNtemples नाम से हैशटैग चलाया जा रहा है जिसको बड़ी संख्या में सहयोग भी मिला है।

देश में एक नई मिसाल पेश करते हुए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत(Teerath Singh Rawat) ने मंदिरों पर बड़ा फैसला लेते हुए, उत्तराखंड के 51 मंदिरों को सरकारी बेड़ियों से मुक्त करने का फैसला लिया था। जिसका स्वागत कई बड़े धर्मगुरुओं ने भी किया। Free Temple मुहीम में सबसे ज्यादा सक्रीय सद्गुरु जग्गी वासुदेव(Sadhguru Jaggi Vasudev) ने भी मुख्यमंत्री रावत की तारीफ करते हुए एक वीडियो ट्वीट किया है जिसमें वह कह रहें हैं कि “यह हिंदू आस्था के लिए एक बहुत बड़ा कदम है, क्योंकि यह समुदाय के हाथों में होना चाहिए। यदि सरकार पर्यटन क्षमता देखती है, तो वे बुनियादी ढांचे का निर्माण कर सकते हैं, परिवहन को सुनिश्चित कर सकते हैं, आवास की व्यवस्था कर सकते हैं लेकिन मंदिर स्वयं भक्तों के हाथों में होना चाहिए। मुझे खुशी है कि उत्तराखंड सरकार को इस बात का एहसास है और सीएम तीरथ सिंह को मेरी बधाई और आशीर्वाद। यह वास्तव में अद्भुत है और मैं चाहता हूं कि और अधिक मुख्यमंत्री इस दिशा में आगे बढ़ें।” 

तमिलनाडु भाजपा(BJP) ने भी यह वादा किया है कि वह सभी धर्म-स्थलों और मंदिरों को सरकारी बंधनों से मुक्त करा उन्हें विद्वानों और साधुओं के हाथ में सौपेंगे। किन्तु भाजपा भी अपनी सोच को साफ नहीं कर रही है। एक तरफ तो वह मंदिरों को सभी बंधनों से मुक्त करने की बात कहती है और दूसरी तरफ ही भाजपा शासित हरियाणा में सरकार प्रसिद्ध मंदिर माता चंडी मंदिर और हिसार के श्री दुर्गा माता मंदिर के प्रशासन को अपने नेतृत्व में चलाना चाहती है।

यह भी पढ़ें: माँ मुंडेश्वरी मंदिर में होते हैं कुछ अनोखे चमत्कार जिसे जानकर आप रह जाएंगे दंग 

बहरहाल, देश-भर में #freehindutemple मुहीम के लिए ऑनलाइन पेटिशन साइन किए जा रहे हैं, सोशल मीडिया पर हैशटैग को ट्रेंड कराया जा रहा है। अब तो उदाहरण के लिए उत्तराखंड सरकार ने भी इस मुहीम का साथ दिया है। तो माना यह जा रहा है कि उत्तराखंड की देखा-देखी अन्य राज्य की सरकारें भी इस मामले पर जल्द फैसला लेंगी।

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(NewsGram Hindi)

अगले वर्ष भारत एक बार फिर सबसे बड़े राजनीतिक धमाचौकड़ी का साक्षी बनने जा रहा है। जिसकी तैयारी में अभी से राजनीतिक दल अपना खून पसीना एक कर रहे हैं। यह चुनावी बिगुल फूंका गया है राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, जहाँ जातीय समीकरण, विकास और धर्म पर खूब हो-हल्ला मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश चुनाव में जहाँ एक तरफ भाजपा हिन्दुओं को अपने पाले करने में जुटी वहीं विपक्ष ब्राह्मणों को अपनी तरफ करने के प्रयास में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। आने वाला उत्तर प्रदेश चुनाव क्या मोड़ लेगा इसका उत्तर तो समय बताएगा, किन्तु ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

आपको बता दें कि वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सभी पार्टियों ने खूब खून-पसीना बहाया था, किन्तु सफलता का परचम भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटों को जीत कर लहराया था। वहीं अन्य पार्टियाँ 50 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। भाजपा की इस जादुई जीत का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के धुआँधार रैली और मुख्यमंत्री चेहरे को जाहिर न करने को गया। किन्तु उत्तर-प्रदेश 2022 का आगामी चुनाव सत्ता पक्ष के चुनौतियों से भरा हो सकता है। वह इसलिए क्योंकि सभी राजनीतिक पार्टी अब धर्म एवं जाति की राजनीति के अखाड़े में कूद गए हैं। इसमें सबसे आगे हैं यूपी में राजनीतिक बसेरा ढूंढ रहे एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन औवेसी! जो खुलकर रैलियों में और टीवी पर यह कहते हुए सुनाई दे जाते हैं कि वह प्रदेश के मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए उत्तर प्रदेश आए हैं।

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(NewsGram Hindi, Shantanoo Mishra)

हिन्दू या हिंदुत्व, एक धर्म है या विचार इसका फैसला आज के समय में ग्रंथ, पुराण या धर्माधिकारी नहीं करते, अपितु इसका फैसला करता है कंप्यूटर के सामने बैठा वह तथाकथित बुद्धिजीवि जिसे न तो धर्म का ज्ञान है और न ही सनातन संस्कृति की समझ। इन्हें हम आम भाषा में लिब्रलधारी या लिब्रान्डू भी कहते हैं। यही तबका आज देश में ‘हिन्दू बांटों आंदोलन‘ का मुखिया बन गया है। समय-समय पर इस तबके ने देश में हिन्दुओं को हिंदुत्व के प्रति ही भड़काने का काम किया है। महिलाऐं यदि हिन्दू परंपरा अनुसार वस्त्र पहनती हैं तो वह इस तबके के लिए अभिव्यक्ति की आजादी पर चोट है और साथ ही यह पुराने जमाने का है, किन्तु इसी तबके के लिए हिजाब सशक्तिकरण की मूरत है। जब लव-जिहाद या धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाई गई थी तब भी इस तबके ने इसे प्रेम पर चोट या अभिव्यक्ति की आजादी जैसा बेतुका रोना रोया था। दिवाली पर जानवरों के प्रति झूठा प्रेम दिखाकर पटाखे न जलाने की नसीहत देते हैं और बकरी-ईद के दिन मौन बैठकर, सोशल मीडिया पर मिया दोस्त द्वारा कोरमा खिलाए जाने का इंतजार करते हैं।

सवाल करना एक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, किन्तु स्वयं को लिब्रलधारी बताने के लिए श्री राम और सनातन धर्म की परम्पराओं पर प्रश्न-चिन्ह उठाना कहाँ की समझदारी है? इसी तबके ने भारत में मुगलिया शासन को स्वर्णिम युग बताया था, साथ ही हिन्दुओं को मारने वाले टीपू सुल्तान जैसे क्रूर शासक को करोड़ों का मसीहा भी बताया था। लेकिन आज जब भारत का जागरुक युवा ‘छत्रपति सम्राट शिवाजी महाराज’ का नाम गर्व से लेता है तो यह तबका उसे भी संघी या बजरंग दल का बताने में देर नहीं करता। इस तबके के लिए हिंदुत्व धर्म नहीं एक पार्टी की विचारधारा और यह इसी मानसिकता को विश्व में अन्य लोगों तक पहुंचाकर हिन्दुओं को बदनाम करने का कार्य कर रहे हैं।

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(NewsGram Hindi, साभार: Wikimedia Commons)

आज शहीद स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे(Mangal Pandey) की 194वीं जयंती है। मंगल पांडे(Mangal Pandey) पराधीन भारत की आजादी के वह जननायक थे जिनके एक नारे ने स्वतंत्रता के संग्राम को नई ऊर्जा दिया था। मंगल पांडे(Mangal Pandey) को स्वतंत्रता का जनक भी कहा जाता है जिनके नक्शे-कदम पर चलकर शहीद भगत सिंह, आजाद जैसे वीरों ने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। मंगल पांडे(Mangal Pandey) उन वीरों में से थे जिनके लिए धर्म एवं स्वाभिमान भी बड़ा था और राष्ट्र की स्वतंत्रता भी।

मंगल पांडे!

शहीद मंगल पांडे 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में जन्में थे। मंगल पांडे(Mangal Pandey) क्रांतिकारी के रूप में उभरने से पूर्व कलकत्ता (कोलकाता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री” के सिपाही थे। अंग्रेजों ने भारतीय सिपाहियों को भी बहुत प्रताड़ित किया था। मंगल पांडे के साथ-साथ अन्य सैनिकों ने भी इन प्रताड़नाओं को सहा, किन्तु पानी सर से तब ऊपर चला गया जब भारतीय सैनिकों को सूअर और गाय की चर्भी लगे बारूद वाली बंदूक दी गईं। मंगल ब्राह्मण थे जिस वजह से उन्होंने अपने साथी सिपाहियों के साथ इसकी शिकायत बड़े अधिकारीयों से की। किन्तु इस मामले पर सुनवाई न होता देख उनमें प्रतिशोध की भावना उमड़ पड़ी।

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