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ओपिनियन

प्रेस की स्वतंत्रता- हमारे देश में सबसे अधिक

आज यानी कि 16 नवंबर को देश भर में प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा है। यह दिन देश में प्रेस की स्वतंत्रता और समाज के प्रति उसके दायित्व की याद दिलाती है।

16 नवंबर को राष्ट्रीय प्रेस दिवस मनाया जाता है। (Unsplash)

आज यानी कि, 16 नवंबर को देश भर में राष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा है। यह दिन देश में प्रेस की स्वतंत्रता और समाज के प्रति उसके दायित्व की याद दिलाती है। उस दायित्व की जो निष्पक्ष है। जो समाज में इसका-उसका, सही-गलत से परे हो कर सिर्फ सत्य के साथ खड़ी दिखे।

और हमारे देश का प्रेस तो हमेशा सच के साथ ही खड़ा रहा है। नियम इतने कड़े हैं कि जो सही खबर नहीं देते, वो खुद खबर बन जाते हैं। एक अध्ययन (Getting away with murder) की मानें तो 2014-19 के बीच कुल 40 पत्रकारों की हत्याएं हुईं हैं, इनमें से 21 पत्रकार की मौत का कारण उनकी बेबाक पत्रकारिता ही रही। स्टडी में यह भी दावा किया गया है कि हमलावरों में सरकारी एजेंसियां, सुरक्षा बल, कुछ राजनीतिक दल के सदस्य, कुछ धार्मिक संप्रदाय के लोग, और कुछ देश बदलने निकले छात्रों के समूह शामिल थे। बच्चे भी क्या करें, जब देश के बड़े सुधार नहीं ला पाते तो छात्रों को निकलना ही पड़ता है , मजबूरी है ! यही मजबूरी उन धार्मिक भक्तों की भी रही होगी। राजनीतिक दल के लोग भी क्या करें, सरकार में बने रहने के लिए एक दो जानें लेनी ही पड़ती हैं।


प्रेस फ्रीडम रैंक

ऊपर लिखी बातों को पढ़ कर आप हमारे देश में प्रेस की आज़ादी पर सवाल नहीं उठा सकते। प्रेस आज़ाद है। तो क्या हुआ अगर Reporters Without Borders द्वारा प्रकाशित वार्षिक रैंकिंग 2020 के भीतर, Press Freedom Index में 180 देशों में से, भारत की प्रेस फ्रीडम रैंक 142 है। यही रैंक 2019 में 140 थी। ऐसा लगता है कि 2019 में कोई लहर फिर से चली, जिसने आज़ादी की पतंग किसी पेड़ की ऊँची डाली पर लटका दी। उफ़…यह हवाएं…कभी लेफ्ट कभी राइट!

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सरकार की भलाई देखिए

कोरोना महामारी के दौर में मीडिया का साहस और उसका समर्पण किसी से छिपा नहीं रहा। फिर बात चाहे हाथरस मामले की ही क्यों ना हो। मीडिया ने आवाज़ उठायी। मीडिया आगे आया। सरकार की भलाई देखिए, उन्होंने मीडिया की सुरक्षा के लिए वहां फ़ौज तैनात करवा दी। यह सब देख कर भला कौन कह सकता है कि हमारे देश का मीडिया आज़ाद नहीं।

हालांकि, यह सिर्फ मैं नहीं कह रहा और भी कई लोग हैं जो मेरी इस बात की पुष्टि करते हैं –

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मोदी सरकार प्रेस की स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्ध है

इस खास मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मीडिया से जुड़े कर्मियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार, प्रेस की स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्ध है और इसका विरोध करने वालों का पुरजोर विरोध करती है। शाह ने ट्वीट कर यह भी लिखा, “हमारी मीडिया बिरादरी अपने महान राष्ट्र की नींव को मजबूत बनाने की दिशा में अथक प्रयास कर रही है। ” सही बात है। मीडिया का एक दल कोशिश भी कर रहा है, पर माइनॉरिटी को चुनाव के वक़्त ही भाव देना सही होता है। इससे शक्ति का संतुलन बना रहता है।

प्रेस की स्वतंत्रता हमारे लोकतंत्र की आधारशिला है

इस अवसर पर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित एक वेबिनार में दिए एक संदेश में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भी इसी बात को दोहराया कि “प्रेस की स्वतंत्रता हमारे लोकतंत्र की आधारशिला है”, लेकिन साथ ही इस स्वतंत्रता को ‘जिम्मेदाराना’ करार दिया।

तुझे गोली कहाँ लगी

कांग्रेस ने भी वही बातें करी ; आज़ाद और ज़िम्मेदार प्रेस। उन्होंने इस मौके पर पत्रकारों को सलाम भी किया। 2013 में देश में कुल 11 पत्रकारों की हत्या हुई थी। पाकिस्तान में उस साल पत्रकारों पर रहम खाया गया और मात्र नौ पत्रकारों को मृत्युलोक में स्थान मिल पाया। मुमकिन है वहां हमारे 11 और उनके 09 मिल कर प्रेस की स्वतंत्रता पर ही चर्चा कर रहे होंगे। या यह भी कि तुझे गोली कहाँ लगी, मुझे तो माथे पे !

उधर से 2017 में गौरी लंकेश ने आकर कहा होगा – “मुझे भी एक माथे पर लगी दोस्तों, दो सीने में, चार छेद तो दीवार में भी हो गए” बोलो ! यहां तो ईंट-पत्थर के दीवार भी सुरक्षित नहीं !

बहरहाल मैं आप लोगों को मुद्दे से भटकाना नहीं चाहता। मैं अपने देश में आज़ाद प्रेस को लेकर बात कर रहा था। मैं अपनी बात पर अब भी सलामत हूँ। प्रेस की स्वतंत्रता- हमारे देश में सबसे अधिक। मेरी बात के तीन गवाह भी मौजूद हो ही गए।

बात खत्म करने से पहले मैं आप पाठकों से पत्रकारिता को लेकर कुछ आम बातें करना चाहूंगा। सबसे पहले मैं आपको यह बता दूँ कि फलाना जाने वाली ट्रेन फलाना जगह पर वक़्त पर ना पहुंचे तो यह खबर नहीं, खबर होगी…जब फलाना जाने वाली ट्रेन फलाना जगह पर वक़्त से पहले पहुंच जाएगी। कुछ समझे ? बात को थोड़ा और व्यापक रूप देते हैं।

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बदलाव लाना मक़सद नहीं

ना मैं दार्शनिक हूँ, ना ही पत्रकारिता के क्षेत्र में इतना अनुभवी मगर एक बात जो मुझे मेरे अध्यापकों ने सिखाई, मुझे समझ आई, कि पत्रकार का काम बदलाव लाना नहीं है। उसका काम है समाज को आईना दिखाना। राजनेताओं और आम जन के बीच में पारदर्शिता को बनाए रखना। बदलाव ; पत्रकार की क्रिया की प्रतिक्रिया हो सकती है , स्वयं क्रिया नहीं।

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लोकतंत्र का मूल तत्व

प्रेस, लोकतंत्र का अंश ही नहीं बल्कि स्वयं लोकतंत्र है। यह लोकतंत्र के स्तंभों में से एक है। ऐसा मैं नहीं, अनेक पत्रकार और कई सज्जन इस बात को मानते हैं और कहते भी हैं। मुझे लगता है कि आप लोग भी इस बात से सहमत होंगे। यह मीडिया, यह प्रेस- जन की आवाज़ है, जन का आईना है। किसी एक इंसान की जागीर नहीं। पर यह लोग भी क्या करें ; घर में दो वक़्त की रोटी भी तोड़नी है। प्रेस खाएगा नहीं तो बोलेगा कैसे ? समस्या यह भी है कि खाने के बाद, कभी-कभी चलते-फिरते कुछ ज़्यादा ही बोल जाता है।

स्रोत – आईएएनएस

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