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दुनिया

विश्व के ग्लेशियर तेजी से पिघलते जा रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन से प्रेरित गर्म तापमान दुनिया भर के ग्लेशियरों और बर्फ की चादरों को सिकोड़ रहे हैं। जिससे समुद्र का जल स्तर बढ़ता जा रहा है।

जलवायु परिवर्तन तेज़ी से हिमालय ग्लेशियरों (Glaciers) को निगलता जा रहा है। (Wikimedia Commons)

जलवायु परिवर्तन तेज़ी से हिमालय ग्लेशियरों (Glaciers) को निगलता जा रहा है। हाल ही में एक अध्ययन से पता चला है कि, दुनिया के सभी ग्लेशियर हाल के वर्षों में तेजी से पिघलते जा रहे हैं। अध्ययन के मुताबिक बढ़ते तापमान के कारण हिमालय ग्लेशियर 21 वीं सदी की शुरुआत की तुलना में आज दोगुनी तेजी से पिघल रहे हैं। 

विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित अध्ययन में वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय समूह ने 2000 से 2019 के बीच दुनिया के ग्लेशियरों का अध्ययन करने के लिए नासा के टेरा उपग्रह (NASA’s Terra satellite) से उच्च संकल्प कल्पना का उपयोग किया है।


शोधकर्ताओं का कहना है कि, साल 2000 से 2019 के बीच ग्लेशियरों का प्रतिवर्ष कुल 267 गीगाटन बर्फ पिघल गई है। जिस कारण समुद्र के स्तर में भी 21 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। 

भारत समेत पूरे हिमालय क्षेत्रों में गर्मी के कारण हर साल करीब 0.25 मीटर ग्लेशियर पिघल रहे हैं। अब तक करीब चार दशकों में इन ग्लेशियरों ने अपना एक चौथाई घनत्व खो दिया है। 

समुद्र के स्तर में भी 21 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। (Wikimedia Commons)

वैज्ञानिकों ने लंबे समय से चेतावनी दी है कि, जलवायु परिवर्तन (Climate change) से प्रेरित गर्म तापमान दुनिया भर के ग्लेशियरों और बर्फ की चादरों को सिकोड़ रहे हैं। जिससे समुद्र का जल स्तर बढ़ता जा रहा है। लगातार समुद्र स्तर में वृद्धि आने वाले समय में तटीय शहरों के लिए एक गंभीर खतरा साबित होंगे। कुछ हद तक ये कई तटीय क्षेत्रों को नुकसान भी पहुंच चुके हैं। 

इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (Intergovernmental Panel on Climate Change) प्रोजेक्ट की ताजा रिपोर्ट में कहा भी गया है कि, अगर यही हालात कायम रहे तो भविष्य में समुद्र का स्तर 2100 मीटर से अधिक बढ़ जाएगा। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया है कि, अलास्का, आइसलैंड, आल्प्स, पामीर पर्वत और हिमालय में ग्लेशियर का पिघलना सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। 

यह भी पढ़ें :- WHO: तंबाकू पर उच्च “कर” लगा, जिंदगी और पैसे दोनों को बचाया जा सकता है

भारत , चीन, भूटान और नेपाल जैसे देशों के लोग सिंचाई, पीने का पानी आदि के लिए हिमालय के ग्लेशियर पर निर्भर करते हैं। इन ग्लेशियरों के पिघलने से इस पूरे क्षेत्र के जल तंत्र और यहां रहने वाली आबादी का जीवन प्रभावित हो सकता है। शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि, ग्लेशियर में कमी का लगभग आधा हिस्सा उत्तरी अमेरिका में है। (VOA) (हिंदी अनुवाद: स्वाती मिश्रा)

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पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने स्लीपर सेल्स के ज़रिये दिल्ली में लगवाई आईईडी- रिपोर्ट (Wikimedia Commons)

एक सूत्र ने कहा कि आरडीएक्स-आधारित इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (IED), जो 14 जनवरी को पूर्वी दिल्ली के गाजीपुर फूल बाजार में पाया गया था और उसमें "एबीसीडी स्विच" और एक प्रोग्राम करने योग्य टाइमर डिवाइस होने का संदेह था।

कश्मीर और अफगानिस्तान में सक्रिय जिहादी आतंकवादियों द्वारा लगाए गए आईईडी में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किए जाने वाले इन स्विच का पाकिस्तान(Pakistan) सबसे बड़ा निर्माता है। सूत्र ने कहा कि इन फोर-वे स्विच और टाइमर का उपयोग करके विस्फोट का समय कुछ मिनटों से लेकर छह महीने तक के लिए सेट किया जा सकता है।

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राष्ट्रपति भवन (Wikimedia Commons)

दक्षिणी दिल्ली नगर निगम(South Delhi Municipal Corporation) में भाजपा के मुनिरका वार्ड से पार्षद भगत सिंह टोकस ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द(Ramnath Kovind) को एक पत्र लिखकर राष्ट्रपति भवन(Rashtrapati Bhavan) में स्थित मुगल गार्डन का नाम बदल कर पूर्व राष्ट्रपति मिसाइल मैन डाक्टर अब्दुल कलाम वाटिका(Abdul Kalam Vatika) के नाम पर रखने की मांग की है। निगम पार्षद भगत सिंह टोकस ने राष्ट्रपति को भेजे अपने पत्र में लिखा है, मुगल काल में मुगलों द्वारा पूरे भारत में जिस प्रकार से आक्रमण किए गए और देश को लूटा था। वहीं देशभर में मुगल आक्रांताओं के नाम से लोगों में रोष हैं। जिन्होंने भारत की संस्कृति को खत्म करने का प्रयास किया उनको प्रचारित न किया जाए।

rastrapati bhavan, mughal garden राष्ट्रपति भवन स्थित मुगल गार्डन (Wikimedia Commons)

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शोधकर्ताओं ने कोविड के खिलाफ लड़ने में कारगर हिमालयी पौधे की खोज। ( Pixabay )

कोविड के खिलाफ नियमित टीकाकरण के अलावा दुनिया भर में अन्य प्रकार की दवाईयों पर अनेक संस्थायें रिसर्च कर रही हैं जो मानव शरीर पर इस विषाणु के आक्रमण को रोक सकती है। इसी क्रम में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी के शोधकर्ताओं को एक बड़ी सफलता मिली है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी के शोधकर्ताओं ने एक हिमालयी पौधे की पंखुड़ियों में फाइटोकेमिकल्स की खोज की है जो कोविड संक्रमण के इलाज में करगर साबित हो सकती है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी में स्कूल ऑफ बेसिक साइंस के बायोएक्स सेंटर के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. श्याम कुमार मसाकापल्ली के तर्ज पर एक वक्तव्य में कहा की, अलग अलग तरह के चिकित्सीय एजेंटों में पौधों से प्राप्त रसायनों फाइटोकेमिकल्स को उनकी क्रियात्मक गतिविधि और कम विषाक्तता के कारण विशेष रूप से आशाजनक माना जाता है। टीम ने हिमालयी बुरांश पौधे की पंखुड़ियों में इन रसायनों का पता लगया है। पौधे का वैज्ञानिक नाम रोडोडेंड्रोन अर्बोरियम है जिसे वहाँ के स्थानीय लोग अलग अलग तरह की बीमारियों में इसका इस्तेमाल करते हैं।

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