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ओपिनियन

‘हलाल’ के नाम पर एकाधिकार जमाने वालों को हुई ‘हिन्दू फल दुकान’ से तकलीफ: विश्लेषण

"हलाल’ के नाम पे एक पूरा उद्योग मुस्लिमों को समर्पित कर दिया जाए, लेकिन आप एक सवाल तक ना उठाएं और वहीं जब देश के किसी कोने मे एक गरीब फल वाला अपने दुकान का नाम 'हिन्दू फल दुकान' रख ले तो आपकी भावनाएँ आहात हो जाती है"

Muslim Monopoly On Slaughtering Industry(Source: Wikimedia Commons&Twitter)

सोशल मीडिया प्लैटफ़ार्म, ट्वीटर पर #BoycottHalalProducts ट्रेंड करते हुए देखा, तो सोचा इस पर चर्चा होना ज़रूरी है। आज अचानक इस ट्रेंड का कारण क्या है? ऐसा क्यूँ हुआ की अचानक से मुस्लिम विधियों द्वारा सत्यापित अर्थात ‘हलाल’ सामानों का त्याग करने की अपील की जा रही है। इस ट्रेंड को क्यों चलाया जा रहा है, इसका कारण क्या है? ‘हलाल’ होता क्या है? इस विषय पर आज मैं विस्तार में विश्लेषण करुंगा। लेकिन उससे पहले कुछ घटनाओं के बारे मे जान लेना ज़रूरी है।

जमशेदपुर में ‘हिन्दू’ फल विक्रेता के बवाल के बाद हैदराबाद, नालंदा और मेरठ के अलावा ऐसी कई घटना सामने आयी जिसमे फल या सब्जी बेचने वाले को अपने धर्म या अपनी आस्था के सार्वजनिक प्रदर्शन पर कानूनी कार्यवाही झेलनी पड़ी। अगर आपको इन घटनाओं की जानकारी नहीं है तो इस लिंक पर क्लिक कर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।


हिन्दू लिखने या भगवा झंडा लगाने के पीछे वजह

कोरोना संक्रमण के दौर में कई ऐसे वीडियो वायरल हुए थे जिसमे एक समुदाय विशेष के लोगों द्वारा फलों पर थूक कर या ब्रैड को चाट कर बेचते हुए देखा गया था। कुछ लोगों ने इन विडियो को कोरोना से जोड़ कर दिखाने की कोशिश की। लेकिन जब इनकी जांच हुई तो उनमें से कुछ वीडियो कोरोना के दौर से पहले के बताए गए। पुराने, लेकिन झूठे नहीं।

इन घटनाओं के बाद पैदा हुए डर के माहौल में कई लोगों ने एक मुहिम शुरू की। किसी धर्म के खिलाफ नफरत के कारण नहीं, बल्कि स्वच्छता का खयाल रखते हुए, कुछ हिन्दू समुदाय के लोगों ने सिर्फ हिंदुओं से फल-सब्जी, आदि खरीदने की ठान ली।

उदाहरण के तौर पर, आपको याद होगा की कुछ वक़्त पहले जोमैटो कंपनी से जुड़ा एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमे डिलीवरी करने वाला लड़का खाने की डिलीवरी से पहले उसे खोल कर खाता हुआ नज़र आ रहा था। इस वीडियो के वायरल होने के बाद, लोगों ने जोमाटो से खाना मंगाना कुछ वक़्त के लिए बंद कर दिया था। ठीक उसी प्रकार, कैब सर्विस देने वाली कंपनी ऊबर जे जुड़ी एक ख़बर आई थी जिसमे ड्राइवर द्वारा यात्री के बलात्कार की घटना का खुलासा हुआ था। उस वक़्त भी लोगों ने डर कर ऊबर की सेवा लेनी कम कर दी थी।

इसी तर्ज पर, फल-सब्जी खरीदने से जुड़ा निर्णय भी लोगों ने खुद की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लिया था। हो सकता है ये सामाजिक तौर पर गलत प्रतीत हो, लेकिन निजी तौर उन्हे सही लगा।ऐसी अपील के बाद लोगों द्वारा, फल सब्जी खरीदने से पहले, बेचने वाले का नाम पूछा जाने लगा। पहचान पुख्ता करने के लिए आईडी भी मांगी जाने लगी। कई केस ऐसे भी मिले थे जिसमे बेचने वाला अपना नाम बदल कर घूमता हुआ पाया गया था। ऐसी घटनाओं से परेशान हो कर कुछ हिन्दू विक्रेताओं ने अपने ठेले या अपनी दुकान पर भगवा झंडा लगाना शुरू कर दिया, तो कुछ ने अपने दुकान का नाम ‘हिन्दू’ फल दुकान रख लिया, जिससे उसकी खुद ब खुद पहचान हो जाए और उसे बार बार आईडी दिखने की ज़हमत ना उठानी पड़े।

ऐसी घटनाओं का असर

जमशेदपुर मे फल वाले को अपने दुकान के नाम में ‘हिन्दू’ शब्द जोड़ने पर पुलिस कार्यवाही झेलनी पड़ी, तो वहीं हैदराबाद मे फल वाले को अपने ठेले पर भगवा झंडा लगाना महँगा पड़ गया। किसी की भावनाएँ आहत ना हो जाए इसके लिए जमशेदपुर, हैदराबाद के अलावा नालंदा, बिहार मे भी ऐसी पुलिस कार्यवाही की घटना सामने आई। हैदराबाद की पुलिस कार्यवाही पर एक पूर्व आर्मी डॉक्टर और व्यंगकर मेजर नील ने व्यंग्य किया तो उन पर भी शिकायत दर्ज करा दी गयी थी।

Jamshedpur Fruit Shop (Source: Twitter)

एक फल वाला अपने दुकान के नाम में ‘हिन्दू’ शब्द का प्रयोग कर सकता है, एक ठेले वाला अपने ठेले पर भगवा झंडा लगा सकता है। ये उसकी आस्था का विषय है, ये उसका अधिकार है। एक इंसान के लिए उसका धर्म एक पहचान भी होता है। उसे दिखाना या उसके चिन्हों को अपनी पहचान के तौर पर अपनी संपत्ति पर लगाना, संवैधानिक तौर पर कहीं से भी गलत नहीं है।  लेकिन इसे देख किसी धर्म विशेष के लोगों की भावनाएं आहत हो जाए, या प्रशासन द्वारा इस पर कार्यवाही कर दी जाए, ये दुखद है।

मुस्लिम समुदाय का मीट उद्योग पर एकाधिकार

एक गरीब फल वाले की दुकान के बाहर ‘हिन्दू फल वाला’ लिखा देख कर जिस समुदाय को तकलीफ़ हुई, वही समुदाय सालों से एक उद्योग पर संपूर्ण रूप से अपना एकाधिकार जमाए बैठा है। और ये अधिकार किसी और समुदाय को ना मिल जाए, उसके लिए तमाम तरह के इस्लामिक कानून का प्रपंच भी रचा गया है। और ये सब होता है एक शब्द ‘हलाल’ के नाम पर।

हिन्दू व्यक्ति का हिन्दू से फल खरीदना, हिन्दू फल वाले का अपने दुकान के नाम में ‘हिन्दू’ शब्द को शामिल करना भावनाएँ आहत करती है, लेकिन यही सारे काम ‘हलाल’ के नाम पर मुस्लिम समुदाय द्वारा सालों से किया जाता रहा है।

अगर किसी ने खुल कर हिन्दू लिख दिया, या बता दिया तो वो गलत है लेकिन उन्ही कामों को शब्द बदल कर ‘हलाल’ के नाम पर किया जाए, तो वो सही है। कमाल की व्यवस्था है, नहीं?

‘हलाल’ क्या है?

इस्लाम धर्म में वो हर चीज़ जिसे करने की इजाज़त इस्लामिक शरीयत कानून देता है, वो ‘हलाल’  है, और जिसकी इजाज़त नहीं है उसे ‘हराम’ बताया गया है।

आप जब भी माँस खरीदने जाते हैं तो अक्सर इस ‘हलाल’ शब्द को कसाई के दुकानों के नाम के साथ लिखा हुआ देख  सकते हैं, जैसे ‘तबरेज़ हलाल मटन शॉप’ या ‘रहमानी मटन बिरयानी’ जिसके नीचे में ‘हमारे या हलाल मटन ही बेचा जाता है’, जैसे टैगलाइन आसानी से देखा जा सकता है।

ये ‘हलाल’ आखिर होता क्या है? कई लोगों को लगता है की जानवर के गले को आधा रेत कर मारना ‘हलाल’ है,  तो वहीं एक बार में पूरी गर्दन काट देना ‘झटका’ कहलाता है। लेकिन ये जानकारी पूरी नहीं है।

आपको बता दें की, शरीयत (इस्लामिक कानून) के अनुसार जानवर के गले को आधा काटने के बाद पूरे खून को शरीर से निकलने का इंतज़ार करना पड़ता है। शरीर से पूरे खून को निकले बिना काट देना ‘हलाल’ नहीं माना जाता है। इसमे एक सबसे अहम बात ये है की इन सभी प्रक्रियाओं को अंजाम देने वाला व्यक्ति मुसलमान ही होना चाहिये,  अन्यथा उस माँस को ‘हलाल’ का दर्जा नहीं दिया जाएगा। आपने अक्सर अपने मुस्लिम मित्रों से चिकन या मटन के मामले में ‘हलाल’ शब्द का प्रयोग करते हुए सुना होगा।क्या इससे कोई तकलीफ़ है? बिलकुल नहीं। आपका धर्म, आपकी आस्थाएँ, इसमे रोक टोक करने वाले हम कौन होते हैं? आप ‘हलाल’ कर के खाइए या  आप मुस्लिम के हाथ का ही काटा हुआ ही खाइए, ये पूर्ण रूप से आपका अधिकार है। लेकिन तकलीफ़ तब होती है, जब ‘हलाल’ के नाम पे एक पूरा उद्योग मुस्लिमों को समर्पित कर दिया जाए, लेकिन आप एक सवाल तक ना उठाएं और वहीं जब देश के किसी कोने मे एक गरीब फल वाला अपने दुकान का नाम ‘हिन्दू फल दुकान’ रख ले तो  आपकी भावनाएँ आहात हो जाती है, पुलिस को शिकायत कर दिया जाता है, और पुलिस कार्यवाही मे उस ठेले वाले को झुकने पर मजबूर होना पड़ता है।

‘हलाल’ और रोजगार

हम इस बात पर अभी चर्चा नहीं कर सकते की माँस खाया जाना उचित है या नहीं। ये एक अलग विषय है और एक बड़ा मुद्दा भी, जिस पर चर्चा अवश्य होनी चाहिए। लेकिन माँस का उत्पादन, इसका उद्योग, और इस उद्योग से मिलने वाले रोज़गार बड़ी संख्या मे हैं। ये सत्य है, और तथ्य भी। लेकिन इस उद्योग मे क्या किसी और धर्म के लोगों को रोज़गार नहीं दिया जाना चाहिए? ये एक बड़ा सवाल है। क्या इन नौकरियों पर किसी और धर्म के लोगों का अधिकार नहीं हो सकता?

इस बात मे कोई दो राय नहीं है की, ‘हलाल’ प्रक्रिया से बना हुआ माँस स्वाद मे किसी भी तरीके से अलग नहीं होता है। मतलब ये है की काटने वाले व्यक्ति के धर्म से उसके स्वाद या गुणवत्ता पर किसी भी प्रकार का असर नहीं होता है। लेकिन फिर भी इस पूरे तौर तरीके को सिर्फ और सिर्फ इस्लामिक मान्यतों का सम्मान करने के मकसद से सिस्टम का हिस्सा बनाए रखा गया है। मुस्लिम व्यक्ति इस बात को भली भांति जानते हैं, लेकिन फिर भी ‘हलाल’ की मांग कर, अपने समुदाय के लोगों के रोज़गार को सुरक्षित रखने का काम एक सोची समझी रणनीति के तहत किया जाता है।

‘हलाल’ सर्टिफिकेशन क्या है?

आपको बता दें की अरब देशों मे व्यवसाय के ज़्यादातर क्षेत्रों में काम करने लिए, कंपनी को ‘हलाल सर्टिफिकेशन’ लेना अनिवार्य होता है। मतलब ये है की खान-पान से जुड़ा या कोई भी अन्य सामान, अगर इस्लामिक तौर तरीके से बनाया हुआ होगा, तभी वो बाज़ार मे उतारा जा सकता है। यहाँ तक की अरब देशों में अपने सामान का निर्यात करने वाली भारतीय कंपनियों को भी ‘हलाल सर्टिफिकेशन’ लेना अनिवार्य होता है। अभी हाल ही में बाबा राम देव की कंपनी पतंजलि को भी निर्यात के लिए ‘हलाल सर्टिफिकेशन’ लेना पड़ा है।

हमारे भारत में सरकार द्वारा किसी भी तरह का ‘हलाल सर्टिफिकेशन’ दिये जाने का प्रावधान नहीं है। लेकिन भारत मे कई ऐसी स्वतंत्र तौर पर काम करने वाली एजेंसीयां भी हैं जो चाहने वाली कंपनी का निरीक्षण कर ‘हलाल’ सर्टिफिकेशन’ देने का काम करती है।  

आपको बता दें की बड़ी कंपनियाँ जैसे मैकडोनल्ड, एयर इंडिया और कई बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियां है जो ‘हलाल सर्टिफाइड’ खाना देने का दावा करती है। साफ शब्दों मे कहें तो, मुस्लिम समुदाय के खान-पान की विधियों का पालन किए जाने का प्रमाण है ‘हलाल’ सर्टिफिकेशन’।

लेकिन अब इसमे तकलीफ़ क्या है? अब तक कुछ तकलीफ़ नहीं थी। लेकिन ‘हिन्दू फल वाले’ से आहत होने जैसी घटनाओं के बाद तकलीफ़ बढ़ गयी है। सुप्रीम कोर्ट के वकील इशकरन सिंह भण्डारी ने ‘हलाल’ के तर्ज पर अब हिन्दू सनातन धर्म के लिए भी सरकार से ‘धार्मिक सर्टिफिकेशन’ का प्रावधान लाने की मांग की है। मतलब ये है की, जिस तरह ‘हलाल सर्टिफिकेशन’, मुस्लिम समुदाय के तौर तरीकों का पालन करने का प्रमाण है, उसी प्रकार हिन्दू तौर तरीकों से बनाए जाने वाले खाने के प्रमाण के रूप में ‘हिन्दू धार्मिक सर्टिफिकेशन’ की भी आवश्यकता है। ऐसा करने से अनावश्यक पुलिस कार्यवाही की मार से लोग बच सकेंगे और इस्लाम के तर्ज पर हिन्दू समुदाय के लोग भी अपने स्वेक्षा से सर्टिफिकेशन ले कर बेचने या सर्टिफ़िकेट देख कर खरीदने के अधिकार का आनंद ले पाएंगे।
अभी के समय मे मुस्लिमों को ‘हलाल’ के नाम पर ये अधिकार प्राप्त है। लेकिन हिंदुओं को नहीं।

आपको बता दें की हिन्दू या सिख समुदाय में मीट के मामले मे ‘हलाल’ की जगह ‘झटका’ मीट के सेवन की मान्यता है, जिसके लिए कोई भी सरकारी प्रावधान नहीं है। मैकडोनल्ड जैसी कई बड़ी कंपनियां जब ‘हलाल’ सर्टिफिकेशन का दावा कर गर्व महसूस कर रही होती हैं, उसी वक़्त हिंदुओं या सिखों से उसकी राय पूछे बगैर उसे भी ‘हलाल’ खाने पर मजबूर किया जाता है, क्यूंकी विकल्प नहीं है।

‘हलाल’ के नाम पर अन्य क्षेत्रों में भी शुरू हो चुका है काम

आपको बता दें की ‘हलाल’ अब सिर्फ खान-पान तक सीमित नहीं रह गया हैं, बल्कि अब ये कई और क्षेत्रों में अपनी पैठ बना रहा है, जैसे की होटल, रैस्टौरेंट, टूरिज़्म, कॉस्मेटिक्स, दवाई कंपनी भी अब ‘हलाल सर्टिफिकेशन’ का तमगा लगा कर काम कर रही है। सिर्फ इतना ही नहीं, अभी हाल ही में भारत मे ‘एसेट होमेस’ द्वारा ‘हलाल सर्टिफाइड अपार्टमेंट’ बेचने के शुरुवात की गयी है, जिसमे इस्लामिक तौर- तरीकों से अपार्टमेंट की बनावट और बाकी डिज़ाइन होंगे।

Via: Times Of India


इतने क्षेत्रों मे बढ़ रहा ‘हलाल’ का प्रचलन और उसकी मांग ने कंपनियों में इसल्मीक तौर तरीकों से चीजों को परोसने की होड़ बढ़ा दी है। उसके साथ साथ बाकी धर्मों के लिए विकल्पों को बंद कर दिया गया है, जिसका अब सरकारी आदेश पर खोला जाना बहुत ज़रूरी है। ‘हलाल’ के तर्ज पर अगर सरकार हिंदुओं या सिख जैसे धर्मों के लिए किसी धार्मिक सर्टिफिकेशन का प्रावधान नहीं करती है तो, जमशेदपुर, या हैदराबाद जैसी घटनाएँ बार बार होने की संभावना बनी रहेगी।

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