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ओपिनियन

पुस्तक समीक्षा : ब्यूरोक्रेसी का बिगुल और शहनाई प्यार की

लेखक ने अपने तजुर्बे की महीन बुनावट कर के, सरकारी महकमे, समाज में व्याप्त जाति की जड़ें, और रंगमच को बड़ी तसल्ली से पेंट किया है।

ब्यूरोक्रेसी का बिगुल और शहनाई प्यार की

“समर्पित उन सभी कलाकारों को जिनके लिए थिएटर एक जुनून है"

लेखक की ज़बान में शुरू करूँ तो अनिल गाँधी ने प्रेमकथा नहीं बल्कि एक विचित्र लव स्टोरी के पात्रों को अपने उपन्यास 'ब्यूरोक्रेसी का बिगुल और शहनाई प्यार की' में चहलकदमी पर छोड़ा है। इंडियन ब्यूरोक्रेसी और थिएटर आपस में कदमताल करते हुए पाठकों के सामने – समाज, सम्मोहन और सम्भोग की बातें करके उनके मन को अंत तक टटोलते रहते हैं।


कहानी एक ऐसी दलित ब्यूरोक्रेट महिला (अलका) की है जो अपनी जाति और रंग के फंदे में फंसी हुई है। इस आला अफसर का एकाकीपन एक थिएटर डायरेक्टर (नील) के व्यक्तित्व पर मोहित हो जाता है। जवानी के पायदान को पार कर चुके इन दोनों आशिक़ों को छोटे शहर की सोच से भिड़ने के बाद खुद के जज़्बातों से भी लड़ना पड़ता है। उत्सुकता, बेचैनी, कलह, रोमांस, संघर्ष और तसल्ली के बीच विचरण करता इनका प्रेम पूरे उपन्यास को ज़िंदा करने में कामयाब रहा है।

लेखक ने अपने तजुर्बे की महीन बुनावट कर के, सरकारी महकमे, समाज में व्याप्त जाति की जड़ें, और रंगमच को बड़ी तसल्ली से पेंट किया है। थिएटर के लिए अनिल गाँधी का प्रेम पूरे उपन्यास में बहती धारा की तरह मुखरित है। लिव-इन रिलेशन जैसे मुद्दों को कोलाहल से उठा कर, पात्रों के जीवन में डाला गया है। जात-पात की हदें किस हद तक पढ़े लिखे इंसान को भी जख्मी कर सकती हैं, इसका ज्ञान आपको उपन्यास की ऊँगली पकड़ कर चलने के बाद ही प्राप्त होगा।

' ब्यूरोक्रेसी का बिगुल और शहनाई प्यार की ' Amazon.in पर उपलब्ध है।

अनिल गाँधी।

भाषा को लचीला रखते हुए, उपन्यास को ताज़गी देने की लेखक की कोशिश कारगर साबित हुई है। अनिल गाँधी के पात्र बोलचाल की भाषा में बात करते हैं। कभी हिंदी तो कभी इंग्लिश, कभी मन किया तो हिंगलिश यहाँ तक कि गालियों से भी पर्दा नहीं करते। यह इस उपन्यास की सुंदरता ही है कि पढ़ने वाला बड़े इत्मीनान के साथ पात्रों के हर भाव को आत्मसात कर लेता है।

देखा जाए तो रंगमच और देश की दफ्तरशाही के बीच कोई मेल नहीं। यह दोनों दो अलग संसार हैं। थिएटर में अफसरी नहीं चलती और ब्यूरोक्रेसी में थिएटर का अनुशासन देखने को नहीं मिलता। ऐसे में अलका और नील के रिश्ते के उलझे धाँगों को उपन्यास के कैनवास पर देखना अपने आप में दिलचस्प एहसास है।

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यूँ तो पात्रों का अपना अपना इतिहास, कहानी के हर ज़र्रे को कसावट अर्ज़ करता है लेकिन अंतिम कुछ पन्नों में ध्यान बांधे रखने वाली स्थितियों के अभाव को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। मगर फिर जल्द ही पात्रों की अकुलाहट की बदौलत पाठक एक बार फिर से उपन्यास के कल-कल में रम जाता है। सस्पेंस के थोड़े बहुत शोरगुल के बाद अनिल गांधी ने उपन्यास को दूर कहीं जलती लौ की गरमाहट में छोड़ कर पढ़ने वालों की कल्पना को खुला आसमान दे दिया है।

अनिल गांधी राज्य सभा में सयुंक्त सचिव के पद से सेवानिवृत्त हैं। थिएटर के प्रति अपनी कृतज्ञता ज़ाहिर करते हुए उन्होंने यह उपन्यास ' ब्यूरोक्रेसी का बिगुल और शहनाई प्यार की ' सच्चे थिएटर प्रेमियों को समर्पित किया है। इस नाते थिएटर जगत भी उनका सदा आभारी रहेगा।

पुस्तक – ब्यूरोक्रेसी का बिगुल और शहनाई प्यार की

लेखक – अनिल गाँधी

' ब्यूरोक्रेसी का बिगुल और शहनाई प्यार की 'Amazon.in पर उपलब्ध है।

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