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ओपिनियन

‘हिन्दू टेरर’ यह शब्द क्या कहता है?

टेरर या आतंकवाद को जब भी धर्म से जोड़ दिया जाता है, तब एक विवाद की उत्पत्ति होती है। क्योंकि हिन्दू टेरर या भगवा आतंकवाद 'शब्द' एक ही पार्टी की देन है।

देश में भगवा आत्नकवाद या हिन्दू टेरर भी विरोधियों की ज़ुबान पर। (Wikimedia Commons)

टेरर या आतंकवाद को जब भी धर्म से जोड़ दिया जाता है, तब एक विवाद की उत्पत्ति होती है। क्योंकि हिन्दू टेरर या भगवा आतंकवाद ‘शब्द’ एक ही पार्टी की देन है।

क्या मुंबई में 26/11 आतंकी हमला हिन्दुओं ने किया था? क्या बंटवारे की पहल हिन्दुओं ने शुरू की थी? कहीं भी कोई भी आतंकवादी हमला होता है ; चाहे वह कश्मीर घाटी में हो या मुंबई के ताज में, तब किस पर सवाल किए जाते हैं?


आपका जवाब मुझे पता है क्या होगा, किन्तु उस जवाब को अगर खुलकर किसी के सामने कह भी दिया तो अंजाम बुरा होने की चेतावनी मिल जाएगी। क्योंकि भगवा आंतकवाद या हिन्दू टेरर जैसे जवाब तो आप दे सकते हैं, और कोई कुछ नहीं कहेगा मगर एक धर्म है, जिसके विषय में हम अपना मुँह नहीं खोल सकते क्योंकि इस देश में एक तबका है जिसे संस्कृति से या कहें कि हिन्दुओं से चिढ़ है।

मुंबई पुलिस के पूर्व कमिश्नर राकेश मारिया की आत्मकथा में यह दावा किया गया है कि पाकिस्तान की खुफ़िया एजेंसी ISI ने मुंबई में हुए हमले को हिन्दू आतंकवाद का कहर साबित करने की कोशिश की थी। जिसका प्रमाण यह है कि सभी 10 आतंकवादियों के पास हिन्दुओं के नाम से फ़र्ज़ी आईकार्ड मौजूद थे। किन्तु यह इसलिए सफल नहीं हो पाया क्योंकि उनमे से एक आतंकी ‘कसाब’ को पुलिस ने धर-दबोचा था और उसने यह स्वीकार कर लिया था कि वह पाकिस्तानी नागरिक है।

यह भी पढ़ें: क्या आज हिंदुत्व की बात करना मतलब घृणा फैलाना है?

वहीं कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ही वह व्यक्ति है जिसने ‘हिन्दू टेररिज्म’ या ‘भगवा आतंकवाद’ जैसे शब्दों का सबसे पहले प्रयोग किया था और यहां तक की वह ‘आर.एस.एस की साजिश-26/11’ किताब के विमोचन में भी गए थे। जिसमें इस आतंकी हमले का कसूरवार सी.आई.ए, मोसाद और आर.एस.एस को ठहराया गया।

ताज होटल (Wikimedia Commons)

कभी कोई असहिष्णुता का राग अलाप कर देश छोड़ने की बात करता है। कभी टीपू सुल्तान की जयंती मनाने पर विचार करता है। वही टीपू सुल्तान जिसने न जाने कितने लाखों हिन्दुओं को मरवा दिया था, हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया था। यदि इस धर्मनिरपेक्ष देश के एक बड़े विश्वविद्यालय में महिषासुर शहीदी दिवस मनाया जा सकता है, तब कुछ भी हो सकता है। आज उस कश्मीर में शांति है जहाँ कभी आतंकी के जनाज़े में लाखों जुटते थे, क्योंकि अब वहां कोई भ्रम फ़ैलाने वाला नहीं है।

मत

आज की राजनीति ने धर्म को वोटबैंक बना दिया है, ऐसा ‘मैं’ नहीं बल्कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोग कहते हैं। लेकिन यह बात कुछ हद तक सही भी है क्योंकि जब एक ईमाम या पादरी किसी एक पार्टी को अपना समर्थन देता है तो वह अपने अनुयायियों को भी उसी पार्टी के कंधे पर हाथ रखने के लिए उकसाता है। किन्तु, हिन्दू धर्मगुरुओं ने कभी भी किसी पार्टी के लिए वोट नहीं मांगा। समर्थन देना और वोट मांगना बहुत दूर तक मेल नहीं खाता।

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(NewsGram Hindi, Shantanoo Mishra)

हिन्दू या हिंदुत्व, एक धर्म है या विचार इसका फैसला आज के समय में ग्रंथ, पुराण या धर्माधिकारी नहीं करते, अपितु इसका फैसला करता है कंप्यूटर के सामने बैठा वह तथाकथित बुद्धिजीवि जिसे न तो धर्म का ज्ञान है और न ही सनातन संस्कृति की समझ। इन्हें हम आम भाषा में लिब्रलधारी या लिब्रान्डू भी कहते हैं। यही तबका आज देश में ‘हिन्दू बांटों आंदोलन‘ का मुखिया बन गया है। समय-समय पर इस तबके ने देश में हिन्दुओं को हिंदुत्व के प्रति ही भड़काने का काम किया है। महिलाऐं यदि हिन्दू परंपरा अनुसार वस्त्र पहनती हैं तो वह इस तबके के लिए अभिव्यक्ति की आजादी पर चोट है और साथ ही यह पुराने जमाने का है, किन्तु इसी तबके के लिए हिजाब सशक्तिकरण की मूरत है। जब लव-जिहाद या धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाई गई थी तब भी इस तबके ने इसे प्रेम पर चोट या अभिव्यक्ति की आजादी जैसा बेतुका रोना रोया था। दिवाली पर जानवरों के प्रति झूठा प्रेम दिखाकर पटाखे न जलाने की नसीहत देते हैं और बकरी-ईद के दिन मौन बैठकर, सोशल मीडिया पर मिया दोस्त द्वारा कोरमा खिलाए जाने का इंतजार करते हैं।

सवाल करना एक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, किन्तु स्वयं को लिब्रलधारी बताने के लिए श्री राम और सनातन धर्म की परम्पराओं पर प्रश्न-चिन्ह उठाना कहाँ की समझदारी है? इसी तबके ने भारत में मुगलिया शासन को स्वर्णिम युग बताया था, साथ ही हिन्दुओं को मारने वाले टीपू सुल्तान जैसे क्रूर शासक को करोड़ों का मसीहा भी बताया था। लेकिन आज जब भारत का जागरुक युवा ‘छत्रपति सम्राट शिवाजी महाराज’ का नाम गर्व से लेता है तो यह तबका उसे भी संघी या बजरंग दल का बताने में देर नहीं करता। इस तबके के लिए हिंदुत्व धर्म नहीं एक पार्टी की विचारधारा और यह इसी मानसिकता को विश्व में अन्य लोगों तक पहुंचाकर हिन्दुओं को बदनाम करने का कार्य कर रहे हैं।

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लोकतंत्र का स्तम्भ है मतदाता! जिनके सामने देश का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति भी हाथ जोड़े खड़ा रहता है। मतदाता के हाथ में सत्ता ‘छीनने और उसे पलट देने’ दोनों की शक्ति है। किन्तु जिस लोकतंत्र के त्यौहार ‘चुनाव’ में आज युवा भागीदार बनने से कतराते हैं उन्हें देख कर यह आभास होता है कि, क्या आने वाले वर्षों में चंद लोग ही सत्ता का रास्ता बनाएंगे?

कुछ युवाओं से यह भी सुनने को मिल जाता है कि यदि आप देश में बदलाव लाना चाहते हैं, तो मतदान मत कीजिए! जो की सरासर गलत है, क्योंकि मतदान न करने से आप स्वयं ही अपने महत्वपूर्ण अधिकार का हनन कर रहे हैं। जिस युवा भविष्य के कंधे पर देश अपना आने वाले कल को लिख रहा है अगर वह, बीच रास्ते में ही साथ छोड़ दे तो विकास और उन्नति तो दूर देश को तोड़ने वाले संसद पहुँच जाएंगे।

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(Wikimedia Commons)

गोवा आज भारत के विकसित और पर्यटन के क्षेत्र में संपन्न राज्य है। गोवा को उसके मोहक समुद्री किनारों और सुंदर दृश्यों के लिए जाना जाता है। किन्तु आज, अगर आपको गोवा में पुर्तगाली या ईसाई छाप ज़्यादा देखने को मिलती है तो उसका भी एक काला अतीत है। जब पुर्तगाली आक्रमणकारियों द्वारा भारत पर हमला किया गया तब उन पुर्तगाली मिशनरियों का एक-मात्र उद्देश्य था केवल जबरन धर्म परिवर्तन करवाना। किन्तु इससे जुड़े दस्तावेजों को या तो गबन कर लिया या फिर नष्ट कर दिया गया।

गोवा अधिग्रहण का काला समय 1560 से लेकर 1812 तक चला, जब पुर्तगालियों ने देश पर आक्रमण किया और गोवा को अपने शासन में सम्मिलित कर लिया। जिसका खामियाजा वहाँ पर रह रहे हिन्दुओं को झेलना पड़ा। क्रूर मिशनरियों ने हिन्दुओं पर धर्मपरिवर्तन के लिए हर संभव प्रताड़ना दी। कुछ ने भय में आकर ईसाई धर्म अपना लिया और कइयों को क्रूर प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। इन मिशनरियों का काम ईसाई चर्चों का गोवा में बढ़ावा देना, हिन्दुओं का धर्मांतरण करवाना और उन्हें प्रताड़ना देना था। साथ ही उन सभी हिन्दुओं की जमीन पर अधिग्रहण करना भी था, जिन्होंने इसका विरोध किया।

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