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संस्कृति

“हिन्दू धर्म” व “यज़ीदी धर्म” में आखिर क्या समानताएं हैं?

यज़ीदी और हिन्दू संस्कृति में समानताएं देखने को मिलती है। भौगोलिक रूप से अलग होने के उपरांत भी, इन दोनों संस्कृतियों में महत्वपूर्ण समानताएं जुड़ी हुई हैं|

यज़ीदी देवता तवसी मेलेक को भी उनके पिता ने ही बनाया है। जो यज़ीदियों के प्रमुख देव माने जाते हैं। जिन्हें मोर यानि मेलेक ताउस (Melek Taus) के नाम से जानते हैं| (Wikimedia Commons)

भारत, भौगोलिक क्षेत्रों, धार्मिक परंपराओं व विभिन्न भाषाओं के बीच अविश्वसनीय सांस्कृतिक विविधताओं को अपने अंदर समेटा हुआ है। भारत एक विविधतापूर्ण देश होने के कारण यहां भिन्न – भिन्न स्थान के अनुसार भोजन, कपड़े, भाषाएं देखने को मिलती है। भारत का संगीत, उसकी ललित कलाएं उसका साहित्य यहां की समृद्ध संस्कृति को दर्शाते हैं। 

भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो, भारत सम्पूर्ण विश्व में अपनी छटा बिखेरता है। उत्तर में हिमालय से लेकर, सुदूर दक्षिण के प्रायद्वीप तक। पश्चिम के रेगिस्तान से लेकर पूर्व के आद्र डेल्टा तक मध्य पठार की शुष्क गर्मी से लेकर, कड़कड़ाती ठंड तक भारत का भूगोल उसकी रूपरेखा एक अदम्य छाप छोड़ते हैं। 


यहां के वेद, धार्मिक स्थल, धार्मिक ग्रंथ उससे जुड़े लोग, भारत की संस्कृति, उसकी सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान है। भारत इन सभी विविधताओं को अपने भीतर अंतर्निहित भारत की एकता को उजागर करता है। तभी तो वह इस कथन “अनेकता में एकता” को सिद्ध करता है। 

यज़ीदी धर्म क्या है?

यज़ीदी (Yazidi) शब्द , कुर्द से निकला है। जिसका अर्थ होता है “जिसने मुझे बनाया” अर्थात निर्माता और ईश्वर। यज़ीदीवाद एक ईश्वर यानी एकेश्वरवाद में विश्वास रखते हैं। यज़ीदी ईश्वर को खुदा कहते हैं। प्रत्येक यज़ीदी को, नैतिकता, सही – गलत, न्याय, सच्चाई, वफादारी, दया और प्रेम जैसे सिद्धांतों पर आधारित है। यज़ीदी खुद को सबसे पुराने धर्मों में से एक का सदस्य होने दावा करते हैं और मिथ्रावाद, यार्सन और ज़ारथ्रिस्ट्रा के साथ अपने संबंधों का विवरण देते हैं। यज़ीदियों का इतिहास एक मौखिक इतिहास है। यज़ीदी के बारे में बहुत ही कम दस्तावेज मिले हैं। यज़ीदी आमतौर पर मानते हैं कि, उनकी उत्पत्ति मिथरिक धर्म से 14वीं शताब्दी ई. पू. से है। 7वीं शताब्दी तक, यज़ीदी शब्द के ऐतिहासिक स्रोत के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता है। ऐसा अनुमान है कि, सदी के अंत में मोस्लेम के मौलवियों और इतिहासकारों ने यज़ीदी शब्द का इस्तेमाल किया था। करीब पिछले 50 वर्षों में यज़ीदी वास्तविक संपर्क में आने लगे थे। जब उस्मान सम्राज्य का पतन हुआ था। तो कई यज़ीदी भाग गए और आकार अर्मेनियाई लोगों के साथ और सोवियत संघ के कारकेस क्षेत्रों में रहने लगे थे। प्रथम विश्व युद्ध के अंत में 1923 में जब तुर्की की नींव रखी गई तब इन यज़ीदीयों का विभाजन हो गया था। तब से यह यज़ीदी तुर्की, इराक, सीरिया और पूर्व सोवियत संघ में रह रहे हैं।

यज़ीदी समुदाय | (Wikimedia Commons)

यज़ीदी कैलेण्डर के अनुसार, उनका नव वर्ष अप्रैल के पहले बुधवार को होता है और पैतृक कब्रों पर विलाप द्वारा इसे चिन्हित किया जाता है। वसंत के मौसम में ग्राम त्योहारों, जिसमें स्थानीय धार्मिक स्थलों पर दावत, संगीत और मन्नत शामिल है। प्रत्येक गांव का अपना – अपना अभियान होता है। जिन्हें अक्सर बड़ी बस्तियों में आयोजित किया जाता है। वर्ष का सबसे बड़ा त्यौहार “शरद जमुनिया” जिसे अक्टूबर के महीने में आयोजित किया जाता है। जब सभी “लालिश” तीर्थ यात्रा करने में सक्षम होते है। जहां सभी की उपस्थिति एक धार्मिक कर्तव्य माना जाता है। 

दुनिया में सबसे लुप्तप्राय धार्मिक अल्पसंख्यक में एक यज़ीदी मुख्यतः हालहिं के वर्षों में सब की नजर में चढ़ गए हैं। 2014 में इस्लामिक स्टेट ने माउंट सिंजर के यज़ीदियों के प्राचीन समुदाय पर निर्ममता पूर्वक हमला किया। सैकड़ों पुरुषों का नरसंहार किया, महिलाओं और बच्चों को या तो मार डाला या उन्हें अपना गुलाम बना लिया और यह चौंका देने वाला नरसंहार हाल के वर्षों में चर्चा का विषय रहा है। 

लेकिन क्या आप जानते हैं, हिन्दुओं और यज़ीदियों के बीच सांस्कृतिक रूप से कई समानताएं देखने को मिलते हैं। जैसे कि हम जानते हैं कि, हिन्दू धर्म में पुनर्जन्म का विशेष महत्व होता है। हमारे ग्रंथों – शास्त्रों में पुनर्जन्म की अवधारणाओं को स्पष्ट उल्लेख किया गया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि, पारगमन या पुनर्जन्म की यह अवधारणा यज़ीदी मान्यताओं में भी देखने को मिलती है। जीवन और मृत्यु के बाद का यह विचार दोनों धर्मों में एक समानता प्रकट करता है।

इसके अलावा हिन्दू धर्म में भौहों के मध्य तिलक करने का विशेष महत्व होता है। हिन्दू संस्कृति में इसे “टीका” भी कहते हैं। माथे के बीच में पवित्र चिन्ह के रूप में टीका लगाते हैं। यज़ीदी भी पवित्रता को विशेष महत्व देते हैं और वह भी भौहों के बीच तिलक करने के लिए जाने जाते हैं|

यह भी पढ़ें :- Free Hindu Temples: क्या मंदिर भी सरकारी संपत्ति है?

यज़ीदियों और हिंदुओं के बीच एक प्रमुख समानता यह है कि, हिन्दू संस्कृति में भगवान शिव ने अपनी ऊर्जा की शक्ति से अपने पुत्र कार्तिकेय को बनाया है। वहीं यज़ीदी देवता तवसी मेलेक को भी उनके पिता ने ही बनाया है। जो यज़ीदियों के प्रमुख देव माने जाते हैं।

हमारे हिन्दू धर्म में भगवान के मंदिरों को एक प्रमुख स्थल माना जाता है। मंदिरों की कला, वहां उत्कीर्ण भित्ति चित्र का भी विशेष महत्व है। यज़ीदियों में भी मंदिरों का विशेष महत्व है। “लालिश” को यज़ीदियों का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता है। इसके अतिरिक्त पारंपरिक हिन्दू तरीके, यहां की आरती और पूजा के कई धार्मिक तरीके भी 

यज़ीदी रिवाजों में देखने को मिलते हैं। हिंदू संस्कृति में इस्तेमाल किए जाने वाले, आरती के थाल उनके लैंप भी काफी मिलते जुलते है। यज़ीदियों में इसे “संजकस” कहा जाता है। इस प्रकार आरती के रूप में अग्नि का प्रयोग, दोनों संस्कृतियों में समानताएं प्रकट करता है।

इस प्रकार कई धरातल पर, यज़ीदी संस्कृति हिन्दू संस्कृति में समानताएं देखने को मिलती है। भौगोलिक रूप से अलग – अलग होने के उपरांत भी, इन दोनों संस्कृति में महत्वपूर्ण समानताएं जुड़ी हुई है।

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