पृथ्वीराज चौहान और गौरी की लड़ाई इतिहास की दृष्टि से

पुस्तकों का हवाला देते हुए इरफान हबीब कहते हैं कि पृथ्वीराज चौहान को मारने के उपरांत करीब 14 वर्ष बाद शहाबुद्दीन गौरी की मृत्यु हुई।
पृथ्वीराज चौहान और गौरी की लड़ाई इतिहास की दृष्टि से
पृथ्वीराज चौहान।Wikimedia Commons

इतिहासकार इस तथ्य को प्रमाणिकता के साथ स्वीकार करते हैं कि पृथ्वीराज चौहान और शहाबुद्दीन गौरी (मोहम्मद गौरी) के बीच दो जबरदस्त युद्ध हुए थे। पहले युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को बुरी तरह हरा दिया था और परास्त हुए गौरी को सेना समेत वापस अफगानिस्तान भागना पड़ा था। इतिहासकारों के मुताबिक दूसरे युद्ध में गौरी कि सेना जीत गई और युद्ध स्थल कुछ दूर पृथ्वीराज चौहान का पीछा कर उन्हें कत्ल कर दिया गया। प्रसिद्ध इतिहासकार इरफान हबीब के मुताबिक पृथ्वीराज चौहान और शहाबुद्दीन गौरी (मोहम्मद गौरी) के बीच पहला युद्ध तराइन में 1191 में हुआ। इतिहासकार इरफान हबीब के मुताबिक पहले युद्ध में पृथ्वीराज की विजय हुई और शहाबुद्दीन गौरी पराजित होकर अपने बची कुची सेना समेत अपने मुल्क अफगानिस्तान भाग गया।

फारसी में लिखी इतिहास की पुरानी पुस्तकों का हवाला देते हुए इरफान हबीब बताते हैं कि तराइन का दूसरा युद्ध 1 साल बाद 1192 में शहाबुद्दीन गौरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच हुआ। फारसी कि इन किताबों के हवाले से हबीब का कहना है कि दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की शिकस्त हुई। शहाबुद्दीन गौरी की सेना ने पृथ्वीराज चौहान का पीछा किया। इतिहासकार के मुताबिक तत्कालीन पंजाब में पृथ्वीराज चौहान को घेर कर उनको मार दिया गया।

इतिहास की पुस्तकों का हवाला देते हुए इरफान हबीब कहते हैं कि पृथ्वीराज चौहान को मारने के उपरांत करीब 14 वर्ष बाद शहाबुद्दीन गौरी की मृत्यु हुई। उन्होंने बताया कि सिंध नदी के किनारे इस्माइलियों द्वारा शहाबुद्दीन गौरी को मार गिराया गया था। इरफान हबीब कहते हैं कि इतिहास की पुस्तकों के मुताबिक तराइन युद्ध के दौरान 1192 में पृथ्वीराज चौहान मारे गए थे।

इरफान हबीब के मुताबिक वहीं दूसरी ओर शहाबुद्दीन गौरी को 1206 में सिंधु नदी के किनारे मारा गया। इतिहासकार अपने इस तथ्य के माध्यम से बताते हैं कि पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी दोनों की मृत्यु के बीच कई वर्षों का अंतर था।

हालांकि हिंदी साहित्यकार इस तर्क से सहमत नहीं है। हिंदी साहित्यकार पृथ्वीराज रासो का हवाला देते हुए बताते हैं कि दूसरे युद्ध के उपरांत आंखें खोने के बावजूद पृथ्वीराज चौहान अपनी युद्ध कला से मोहम्मद गौरी को मारने में कामयाब रहे थे।

दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर हंसराज सुमन बताते हैं कि पृथ्वीराज रासो एक प्रमाणिक ग्रंथ है। सुमन के मुताबिक लंबे समय से यह दिल्ली विश्वविद्यालय में एम ए हिंदी में पढ़ाया जा रहा है। सुमन कहते हैं कि दिल्ली विश्वविद्यालय में लंबे समय से छात्रों को पृथ्वीराज चौहान की इस पारंगत युद्ध कला के विषय में पृथ्वीराज रासो के माध्यम से पढ़ाया जा रहा है।

पृथ्वीराज रासो ग्रंथ बताता है कि पहले युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को बुरी तरह पराजित किया। हालांकि दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की पराजय हुई जिसके बाद मोहम्मद गौरी उन्हें बंदी बना कर अपने साथ अफगानिस्तान ले गया। अफगानिस्तान में पृथ्वीराज चौहान की आंखें फोड़ दी गई। बावजूद इसके अपने एक सहयोगी चंद्रवरदाई की मदद से पृथ्वीराज चौहान ने तीर चला कर मोहम्मद गौरी को मार दिया, लेकिन इतिहासकार इस बात से असहमत हैं।

(आईएएनएस/JS)

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