फूलन देवी से हाथरस तक : न्याय, बदला और ‘छोटी जात’ के संघर्ष की अनसुनी कहानी

दलित महिलाओं पर अत्याचार, न्याय में देरी और जातिगत भेदभाव की पृष्ठभूमि में फूलन देवी (Phoolan Devi) की कहानी आज भी संघर्ष और बदले की प्रतीक है। हाथरस (Hathras incident) से बेहमई तक, दशकों बाद भी सवाल वही है, क्या न्याय और बराबरी का यह फ़ासला कभी खत्म होगा ?
इस तस्वीर में फूलन देवी दिखाई दे रही हैं। उन्होंने हरे रंग की साड़ी पहनी हुई है और काले रंग की शॉल ओढ़ी हुई है। गले में उन्होंने एक माला भी पहन रखी है। उनकी तस्वीर का बैकग्राउंड भी हरे रंग का है।
चंबल के बीहड़ों से निकली फूलन देवी, दलित महिलाओं के संघर्ष की प्रतीक बनीं। (Sora AI)
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‘छोटी जात’ (Mallah community) से बगावत तक

चंबल के बीहड़ का नज़ारा कुछ अलग ही है। ढलती शाम को जब आप चंबल (Chambal) नदी के किनारे खड़े होते हैं, तो इस सूने और कठिन इलाके की सादगी महसूस होती है। यह वही जगह है, जहां कभी डकैतों का राज था। और इन्हीं कहानियों में आज भी ज़िंदा है एक नाम, फूलन देवी। फूलन देवी (Phoolan Devi), एक दलित (Mallah community) परिवार में पैदा हुई थीं। उनके बचपन की कहानियां आज भी गांवों में सुनाई देती हैं। ठाकुरों के ज़ुल्म और बेइज्ज़ती के बाद फूलन ने डकैतों का गिरोह बना लिया। 17 साल की उम्र में बेहमई गांव के ठाकुरों द्वारा सामूहिक बलात्कार झेलने के बाद, उन्होंने कथित तौर पर 1981 में बेहमई में 22 ठाकुरों की हत्या कर दी। इस घटना ने उन्हें "डकैतों की रानी" और कई लोगों की नज़रों में "दलितों की रॉबिनहुड" बना दिया। चंबल (Chambal) का यह बंजर इलाका राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला है। सड़कों और कुछ विकास कार्यों के बावजूद यहां का जीवन अब भी कठिन है। नदी का कटाव और ऊबड़-खाबड़ ज़मीन इसे अलग दुनिया जैसा बना देता है।

हाथरस (Hathras incident) की घटना और फूलन का नाम

साल 2020 में हाथरस में एक 19 वर्षीय दलित लड़की से ठाकुर जाति के लोगों द्वारा कथित बलात्कार और हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी, अगर इंसाफ़ नहीं मिला तो दलित महिलाएं भी फूलन देवी (Phoolan Devi) की तरह हथियार उठा सकती हैं। सोशल मीडिया पर #DalitLivesMatter ट्रेंड हुआ, लेकिन समय के साथ यह मामला सुर्खियों से हट गया। आज भी पीड़िता का परिवार न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है। बेहमई में आज भी लोग उस दिन को याद करते हैं। गांव में एक स्मारक बना है, जिस पर मारे गए 20 लोगों के नाम दर्ज हैं। चार दशक बाद भी अदालत का फैसला नहीं आया। जनवरी में फैसला आना था, लेकिन एक पुलिस डायरी के गायब होने से मामला फिर टल गया। गांव के प्रधान और लोग मानते हैं कि फूलन ने निर्दोषों की हत्या की और उन्हें इंसाफ़ चाहिए।

इस तस्वीर में फूलन देवी अपने हाथ में बंदूक लिए हुई दिखाई दे रही हैं। उनके पीछे तीन व्यक्ति खड़े हैं। एक व्यक्ति उंगली दिखाकर कुछ कह रहा है। दूसरी एक महिला शांत होकर खड़ी है। तीसरी महिला दोनों हाथों से अपना चेहरा ढके हुए है। उनके पीछे एक मूर्ति बनी हुई है, जिसके एक हाथ में तराजू और दूसरे हाथ में तलवार है।
फूलन के गांव में एकलव्य सेना द्वारा उनकी मूर्ति लगाई गई है। यहां उन्हें देवी की तरह पूजा जाता है। (Sora AI)

फूलन (Phoolan Devi) के गांव में एकलव्य सेना द्वारा उनकी मूर्ति लगाई गई है। यहां उन्हें देवी की तरह पूजा जाता है। गांव के लोग याद करते हैं कि वह गरीबों की मदद करती थीं, लड़कियों की शादी के लिए जेवर, पैसों की मदद, और हमेशा मां दुर्गा की छोटी प्रतिमा साथ रखती थीं। मल्लाह समाज के लोकगीतों में आज भी उनका नाम गाया जाता है। 1983 में फूलन ने मध्य प्रदेश के भिंड में अपने गिरोह के साथ आत्मसमर्पण किया। पत्रकारों ने उन्हें "दस्यु सुंदरी" कहा, लेकिन हकीकत में वो छोटी कद की, साधारण दिखने वाली युवती थीं। बिना मुकदमे के 11 साल जेल में रहने के बाद, 1994 में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने सभी आरोप हटा दिए और उन्हें रिहा कर दिया। 1996 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर मिर्ज़ापुर से लोकसभा का चुनाव जीता और 1999 में फिर से सांसद बनीं। लेकिन 2001 में दिल्ली में उनके घर के बाहर उनकी हत्या कर दी गई।

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इस तस्वीर में फूलन देवी दिखाई दे रही हैं। उन्होंने हरे रंग की साड़ी पहनी हुई है और काले रंग की शॉल ओढ़ी हुई है। गले में उन्होंने एक माला भी पहन रखी है। उनकी तस्वीर का बैकग्राउंड भी हरे रंग का है।
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फूलन (Phoolan Devi) के गांव में वो आज भी मसीहा हैं, जबकि बेहमई में उन्हें हत्यारिन माना जाता है। दोनों जगहों पर उनके नाम पर स्मारक हैं, एक बदले का प्रतीक, दूसरा हत्या के शोक का। लेकिन दोनों गांव एक-दूसरे से दूरी बनाए रखते हैं। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में रोज़ औसतन 10 दलित लड़कियों के साथ बलात्कार होता है। महिलाओं पर हिंसा और यौन अपराधों में उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर है। यही कारण है कि फूलन देवी, OBC होने के बावजूद, ‘छोटी जातियों’ के संघर्ष की प्रतीक बन गईं। फूलन देवी का गांव आज भी पिछड़ा हुआ है। पुल और कॉलेज की मांग अधूरी है। लोग चाहते हैं कि यहां फूलन देवी (Phoolan Devi) का म्यूज़ियम बने, जिसमें उनकी वर्दी, लाल गमछा, शॉल और जूते जैसी चीज़ें रखी जाएं। गांव की लड़कियां अपने आपको गर्व से फूलन देवी के गांव की बेटी कहती हैं, लेकिन डर है कि समय के साथ उनकी यादें धुंधली न हो जाएं।

इस तस्वीर में फूलन देवी अपने हाथ में बंदूक लिए हुई दिखाई दे रही हैं। उनके पीछे एक महिला बैठी हुई है। उसके सिर के ऊपर एक हाथ दिखाई दे रहा है, जो एक उंगली दिखा रहा है। उनके पीछे कई लोगों की परछाइयाँ भी नजर आ रही हैं।
फूलन (Phoolan Devi) के गांव में वो आज भी मसीहा हैं, जबकि बेहमई में उन्हें हत्यारिन माना जाता है। (Sora AI)

न्याय और दूरी का सवाल

हाथरस (Hathras incident) और बेहमई, दोनों घटनाओं के बीच करीब पांच घंटे की दूरी और 40 साल का फ़ासला है। लेकिन असल में यह न्याय और अन्याय के बीच की दूरी है। अदालत और जनता, दो समुदायों, और दो सच के बीच की दूरी है। आज सवाल वही है, क्या यह फ़ासला कभी मिटेगा ? [Rh/PS]

इस तस्वीर में फूलन देवी दिखाई दे रही हैं। उन्होंने हरे रंग की साड़ी पहनी हुई है और काले रंग की शॉल ओढ़ी हुई है। गले में उन्होंने एक माला भी पहन रखी है। उनकी तस्वीर का बैकग्राउंड भी हरे रंग का है।
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