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जब घर छोड़ने को मजबूर हुए थे कश्मीरी पंडित

1990 में जो कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अत्याचारों से उभर पाना बहुत मुश्किल है।

NewsGram Hindi

30 साल के ऊपर बीत जाने के बाद भी कश्मीरी पंडितों के घाव अभी हरे है। जिस तरह से उनके साथ दुराचार किया गया था और जिस तरीके से उन्हे अपनी जमीन, घर और नौकरियां छोड़ कर जाना पड़ा, वह पूरे देश को याद है। पंडितों को अपने ही देश में शरणार्थी बनना पड़ा था। इसी कारण से सभी का खून खौलता है।

1984 के बाद कांग्रेस की मदद से ग़ुलाम मोहम्मद शाह ने कश्मीर में सरकार बनाई थी, लेकिन 2 साल बाद ही कांग्रेस ने यह निर्णय लिया की अब ग़ुलाम मोहम्मद शाह का वह समर्थन नहीं करेंगे। इन 2 सालोंं में घाटी में बहुत अत्याचार होना शुरू हो गया था। ग़ुलाम की सरकार के समय हिंदुओं पर अत्यचार हुआ और कई मंदिर भी तोड़े गए। इतना सब होने के बाद भी ग़ुलाम मोहम्मद कुछ नहीं कर पाए। ऐसा भी माना जाता है कि यह खुद आतंकवादियों को बढ़ावा देते थे।


1987 दुबारा चुनाव कराए गए, लेकिन इन चुनावों में धांधली का आरोप लगाया गया। धांधली वाले चुनाव के बाद अब्दुल्ला ने सरकार बनाई, वह एक महत्वपूर्ण मोड़ था जिसके बाद उग्रवादियों ने घाटी में बढ़त बना ली थी। इसके बाद पाकिस्तान और आईएसआई ने जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट जैसे संगठनों के लोगों को हथियार देने शुरू करें जिससे आतंकवाद को बढ़ावा मिला। इसके बाद कश्मीर में आतंकवादियों ने भारत समर्थक नीतियों को खुलकर समर्थन करने वाले लोगों को मारना या धमकाना शुरू कर दिया और कश्मीरी पंडित इनका आसान निशाना बने।

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1989 में आतंकवादियों ने बीजेपी के नेता टीकालाल टपलू की और नीलकंठ गंजू जो कि एक रिटायर्ड जज थे उन्हें मार दिया था। जिसकी वजह से घाटी में रह रहे पंडितों में और ज्यादा भय पैदा हो गया था। टपलू उस समय के सबसे वरिष्ठ कश्मीरी हिंदू नेता थे। इन्होने इंदिरा गाँधी द्वारा लगाए गए अपातकाल का विरोध भी किया था। टपलू की मृत्यु से सभी कश्मीरी पंडितो में डर बैठ गया था। टपलू की मृत्यु सिर्फ बदला नहीं थी बल्कि यह एक समुदाय के ऊपर हमला था।

lal chowk, kashmir, india लाल चौक, कश्मीर(Wikimedia Commons)


1990 में स्थानीय अखबार ने हिज्बुल मुजाहिदीन का संदेश प्रकाशित किया था। जिसमें पंडितों को जाने के लिए कहा गया था। कश्मीरी पंडितों का कहना है कि मस्जिद से लाउडस्पीकर पर धमकी भरे नारे लग रहे थे। उस समय फारूक अब्दुल्ला सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था और राज्यपाल शासन लगाया गया था। लेकिन फिर भी 20 जनवरी से कश्मीरी पंडितों ने घाटी छोड़ना शुरू कर दिया। कश्मीरी पंडितों का दुःख शायद ही कोई समझ पाए जिन्हें अपना घर आतंकवादियों की वजह से छोड़ना पड़ा। इस बात का कोई भी अंदाजा नहीं लगा सकता कि कश्मीरी पंडितों को दुबारा वहां बसाने में कितना समय लगेगा।

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(NewsGram Hindi)

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