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ड्राइवर का ध्यान होता है कम टेस्ला ऑटोपायलट से - रिपोर्ट

टेस्ला त्रैमासिक सुरक्षा रिपोर्ट जारी कर रहा है, जिसका उपयोग वे दावा करने के लिए करते हैं कि ऑटोपायलट लगे टेस्ला वाहनों में औसत कार की तुलना में दुर्घटना में शामिल होने की संभावना 10 गुना कम है।

इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता कंपनी टेस्ला की कार।(Wikimedia Commons)

एक नई रिपोर्ट आई है , जिसके अनुसार दुनिया की सबसे बड़ी , इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता कंपनी टेस्ला के ऑटोपायलट के सक्रिय होने पर चालक के ध्यान में कमी आती है। इस बात का जिक्र एमआईटी एडवांस्ड व्हीकल टेक्नोलॉजी डेटा के आधार पर हुआ जहा एक नइ रिपोर्ट आई इसके अनुसार, गाड़ी चलाते हुए ड्राइवर ऑटोपायलट के सक्रिय होने पर अधिक बार और अधिक समय तक ड्राइविंग से संबंधित चीजों को देखते हैं।
सर्वे में पाया गया , कि मॉडल सभी ड्राइवरों में देखे गए नजर पैटर्न को दोहराता है। मॉडल के घटकों से पता चलता है कि ऑफ-रोड झलकियां बिना ऑटोपायलट के सक्रिय थीं और उनकी आवृत्ति विशेषताओं में बदलाव आया था।
ड्राइविंग से संबंधित ऑफ-रोड मैनुअल ड्राइविंग की तुलना में ऑटोपायलट के सक्रिय होने के साथ कम होती है, जबकि डाउन/सेंटर-स्टैक क्षेत्रों में गैर-ड्राइविंग संबंधित झलक सबसे अधिक बार और सबसे लंबी थी ।

\u091f\u0947\u0938\u094d\u0932\u093e टेस्ला के ऑटोपायलट के सक्रिय होने पर चालक के ध्यान में कमी आती है। (wikimedia commons)



आप को बता दे की मॉडल 290 मानव द्वारा शुरू किए गए ऑटोपायलट के युगों के नजर डेटा पर आधारित है।
लेखकों ने कहा कि मॉडल का उपयोग सुरक्षा मूल्यांकन के संदर्भ में या ड्राइवर प्रबंधन प्रणालियों के लिए डिजाइन लक्ष्य तैयार करने के लिए किया जा सकता है।
ऑटो-टेक वेबसाइट इलेक्ट्रेक के अनुसार, टेस्ला त्रैमासिक सुरक्षा रिपोर्ट जारी कर रहा है, जिसका उपयोग वे दावा करने के लिए करते हैं कि ऑटोपायलट लगे टेस्ला वाहनों में औसत कार की तुलना में दुर्घटना में शामिल होने की संभावना 10 गुना कम है।

यह भी पढ़े : पूर्ण टीकाकरण वाले लोगों में कोविड संक्रमित होने का खतरा 3 गुना कम : स्टडी

ऑटोपायलट (1.0 से 3.0) के वर्जन से लैस अधिकांश टेस्ला वाहनों में, ऑटोपायलट सुविधाओं का उपयोग ज्यादातर राजमार्ग ड्राइविंग के लिए किया जा रहा है। औसतन वाहन गाडियों के लिए भी यही अंतर पाया जाता है, और जिस पर अमेरिका में राष्ट्रीय राजमार्ग यातायात सुरक्षा प्रशासन (एनएचटीएसए) का सभी दुर्घटना डाटा बेस आधारित है ।(आईएएनएस-PS)

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पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने स्लीपर सेल्स के ज़रिये दिल्ली में लगवाई आईईडी- रिपोर्ट (Wikimedia Commons)

एक सूत्र ने कहा कि आरडीएक्स-आधारित इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (IED), जो 14 जनवरी को पूर्वी दिल्ली के गाजीपुर फूल बाजार में पाया गया था और उसमें "एबीसीडी स्विच" और एक प्रोग्राम करने योग्य टाइमर डिवाइस होने का संदेह था।

कश्मीर और अफगानिस्तान में सक्रिय जिहादी आतंकवादियों द्वारा लगाए गए आईईडी में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किए जाने वाले इन स्विच का पाकिस्तान(Pakistan) सबसे बड़ा निर्माता है। सूत्र ने कहा कि इन फोर-वे स्विच और टाइमर का उपयोग करके विस्फोट का समय कुछ मिनटों से लेकर छह महीने तक के लिए सेट किया जा सकता है।

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8 जनवरी को चुनाव आयोग(Election Commission of India) द्वारा जारी के गए 5 राज्यों के विधान सभा चुनावों(Vidhan Sabha Election 2022) के तारिखों के ऐलान से चुनावी गहमा-गहमी चरम पर है। आपको बता दें कि वर्ष 2022 में 5 अहम राज्यों में विधान सभा चुनाव आयोजित होने जा रहे हैं। यह राज्य हैं उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखण्ड, गोवा एवं मणिपुर। साथ ही उत्तर प्रदेश(Uttar Pradesh) में होने जा रहे चुनाव को 7 चरणों में बांटा गया है, मणिपुर 2 चरणों में और गोवा, उत्तराखण्ड, पंजाब(Punjab) में चुनाव 1 चरण में आयोजित किया जाएगा। चुनाव तारीखों के घोषित होने बाद सभी राजनीतिक दल एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं और हर वह हथकंडा अपना रहे हैं जिससे मतदाता आकर्षित हों। साथ ही अब यह भी संभावना अधिक है कि इस बीच चुनावी जमाखोरी बढ़ जाएगी।

पिछले चुनाव में पार्टियों ने कितना खर्च किया था?

आपको जानकारी के लिए बता दें कि 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में करीब 5,500 करोड़ रूपये बड़ी पार्टियों द्वारा चुनाव अभियान में खर्च किए गए थे। साथ ही एक मीडिया रेपोर्ट के अनुसार 1000 करोड़ से अधिक पैसा मतदाताओं को पैसे से या शराब से लुभाने में खर्च किए गए थे। आपको यह भी बता दें कि 2017 में ही हुए 5 राज्यों में विधान सभा चुनाव में 1.89 अरब रूपये खर्च किए गए थे, जिसमें बाहरी खर्च कितना था इसका कोई हिसाब-किताब नहीं है।

इसके साथ विधानसभा में चुनाव आयोग ने निर्धारित की खर्च सीमा प्रति उम्मीदवार 30 लाख तय किया है, किन्तु यह सभी जानते हैं कि इसका पालन नहीं होता है। बल्कि बाहरी खर्च और वोट के लिए नोट का इस्तेमाल कर बेहिसाब पैसा बहाया जाता है। सभी पार्टियां, पार्टी चंदे को भी चुनाव में होने वाले खर्च के लिए इस्तेमाल करती हैं। साथ ही टिकट बिक्री को भी चुनावी जमाखोरी में गिना जा सकता है। हालही में आम आदमी पार्टी के खुदके विधायक ने अरविन्द केजरीवाल पर करोड़ों रुपयों के बदले टिकट बेचने का आरोप लगाया है।
जैसा की आपको पता है कि इस साल होने वाले 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव सभी पार्टियों की नाक की बात बन गई है, जिस वजह से हर कोई अपने-अपने तरीके से लोगों को जुटाने में और चीजों को भुनाने में जुटा हुआ है। चाहे वह बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा हो या 'मैं लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ', किन्तु आज भी हम यह कह सकते हैं कि किसी भी प्रदेश ने महिलाओं की सुरक्षा का ठोस आश्वासन नहीं दिया है। इसी तरह भ्रष्टाचार और पैसों की जमाखोरी पर किसी भी सरकार को निर्दोष करार दे देना समझदारी का काम नहीं होगा। आपको बता दें कि एक समय ऐसा भी था जब समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता और सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल यादव ने यह स्वीकारा था कि समाजवादी पार्टी के सरकार में भ्रष्टाचार होता था।

यह भी पढ़ें: क्या चुनाव चिन्ह को हटा देना चाहिए ?

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राष्ट्रपति भवन (Wikimedia Commons)

दक्षिणी दिल्ली नगर निगम(South Delhi Municipal Corporation) में भाजपा के मुनिरका वार्ड से पार्षद भगत सिंह टोकस ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द(Ramnath Kovind) को एक पत्र लिखकर राष्ट्रपति भवन(Rashtrapati Bhavan) में स्थित मुगल गार्डन का नाम बदल कर पूर्व राष्ट्रपति मिसाइल मैन डाक्टर अब्दुल कलाम वाटिका(Abdul Kalam Vatika) के नाम पर रखने की मांग की है। निगम पार्षद भगत सिंह टोकस ने राष्ट्रपति को भेजे अपने पत्र में लिखा है, मुगल काल में मुगलों द्वारा पूरे भारत में जिस प्रकार से आक्रमण किए गए और देश को लूटा था। वहीं देशभर में मुगल आक्रांताओं के नाम से लोगों में रोष हैं। जिन्होंने भारत की संस्कृति को खत्म करने का प्रयास किया उनको प्रचारित न किया जाए।

rastrapati bhavan, mughal garden राष्ट्रपति भवन स्थित मुगल गार्डन (Wikimedia Commons)

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