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हिंदुत्व की रक्षा के लिए जरूरी है हिन्दुओं का आगे आना

धर्मान्तरण कर तेजी से अपने धर्म का विस्तार कर रहे बाहरी शक्तियों से बचाव के लिए जरूरी है हिन्दू फिर से अपने महान ग्रंथों की शरण में जाएं।

हिंदुत्व की रक्षा भी है जरूरी। (wikimedia commons)

भारत एक ऐसा देश है जिसने अनेक धर्मों , संस्कृतियां और विचारों को अपने अंदर समेट रखा है। सभी की आस्थाओं को साथ लेकर चलने वाला अपना ये देश आज कहीं न कहीं अपने मूल धर्म हिंदुत्व को भूलता जा रहा है। प्रत्येक धर्म को समान अधिकार प्रदान करते करते अपने स्वदेशी हिन्दुओं को उनके मूल अधिकारों से वंचित कर दिया है। हमारा भारतीय संविधान बहुसंख्यक हिन्दुओं को उन अधिकारों से वंचित करता है जो अल्पसंख्यक गैर -हिन्दुओं को दिए हैं।

हालाँकि हिन्दुओं के पास पूर्ण राजनितिक अधिकार हैं परन्तु अल्पसंख्यकों की तुलना में उन्हें राज्य के हस्तक्षेप के बिना अपने शिक्षण संस्थान चलाने की स्वतंत्रता नहीं है। राज्य सरकारें अधिक से अधिक हिंदू मंदिरों और उनकी संपत्तियों का राष्ट्रीयकरण करती रही हैं जबकि मस्जिदों और चर्चों को उनके धर्मों पर छोड़ दिया जाता है। इसका उदाहरण हाल ही में उत्तराखंड सरकार द्वारा 50 से अधिक चारधाम मंदिरों का राष्ट्रीयकरण है।यह अनुमान है कि 1,00,000 से अधिक हिंदू मंदिरों के साथ-साथ उनकी लाखों एकड़ भूमि, उनकी लाखों करोड़ की चल संपत्ति और हजारों करोड़ की वार्षिक आय का राज्य सरकारों द्वारा राष्ट्रीयकरण किया गया है।


यही नहीं उनके प्राचीन ग्रंथों को भी सार्वजनिक शिक्षा से हटा दिया गया है जिससे हिन्दू युवाओं को अपने धर्म और प्राचीन विरासत के विषय में पूरी जानकारी नहीं मिल पाती है और इसका फायदा उठाकर गैर धर्म के लोग उन्हें बहलाकर उनका धर्म परिवर्तन करवाने में सफल हो जाते हैं। अपने धर्म की शिक्षा का अभाव ही उन्हें अपने ही धर्म से घृणा करने को तैयार करता है।

समाज में यह कहकर गलत तरीके से भ्रम फैलाया जा रहा की हिन्दू बहुसंख्यक हैं और अल्प संख्यकों का शोषण कर सकते हैं ,इसलिए अल्प संख्यकों को विशेष अधिकार प्रदान किये जाने चाहिए। जबकि समाज में ठीक इसका विपरीत हो रहा है। हिन्दू धर्म एक गैर-विस्तारवादी और गैर-धर्मांतरण करने वाला धर्म है जिसने कभी किसी अन्य धर्म के लोगो को हिन्दू धर्म में परिवर्तित करने के लिए कोई भ्रम नहीं फैलाया, कोई जाल नहीं बुना।जबकि धर्मान्तरण करने वाले अन्य विस्तारवादी धर्म लगातार हिन्दुओं को बहकावे में लेकर अपने धर्म में शामिल करते रहे हैं।

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जहाँ हिन्दू बहुसंख्यक हैं वहां किसी प्रकार से दुसरे धर्म के लोगो को बहिस्कृत नहीं किया जाता पर जहाँ हिंदु अल्पसंख्यक बन गए हैं वहां उनके साथ हर प्रकार का शोषण किया जा रह है। इसका साक्षात् उदहारण है कश्मीर जहाँ हर दिन कश्मीरी हिन्दुओं को प्रताड़ित किया जाता है। कभी उनपर पत्थरों की बरसात की जाती है तो कभी सरे आम गोलियों से भून दिया जाता है। कश्मीर कश्मीरी हिंदुओं की मातृभूमि है, और सभ्यता की शुरुआत से ही ऐसा है। पर आक्रमणकारियों के वहां आकर बसने के बाद से ही वहां हिन्दुओं का जीना दूभर हो गया। लगभग 30 साल पहले कश्मीर से लाखों हिंदुओं का नरसंहार धार्मिक रूप से किया गया था जिससे घबरा कर लाखों हिन्दु अपना घर ,संपत्ति सब छोड़ कर पलायन करने को मजबूर हो गए। उनका अपराध क्या था? केवल इतना ही की वो हिन्दू थे।

संविधान के अनुच्छेद 25-30 धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों और स्वतंत्रता से संबंधित हैं। देखिए किस तरह से हिन्दुओं को उनके हर अधिकार से वंचित किया जा रह है।

अनुच्छेद 25 धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। इसके तीन घटक हैं- धर्म का पेशा, अभ्यास और प्रचार। हिंदुओं के इस अधिकार के उल्लंघन के इतने उदहारण हैं जिन्हे कुछ शब्दों में बता पाना मुश्किल है। समान नागरिक संहिता के लिए अनुच्छेद 44 में संवैधानिक निर्देश की अनदेखी करते हुए, हिंदू-विशिष्ट व्यक्तिगत कानूनों को लागू करके हिंदू धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप किया जा रहा है। शनि मंदिर, जल्लीकट्टू, दिवाली, होली, आदि जैसे हिंदू धार्मिक परंपराओं और त्योहारों के उत्सव को गैर कानूनी बताकर और उनपर प्रतिबन्ध लगाकर उन्हें हत्तोत्साहित किया जा रहा है।


hinduism , save hinduism ग्रंथों में छिपा है जीवन का रहस्य। [Wikimedia Commons]


अनुच्छेद 26 सभी को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। लेकिन हकीकत में राज्य सरकारें अधिक से अधिक हिंदू मंदिरों और उनकी संपत्तियों का राष्ट्रीयकरण करना जारी रखती हैं जबकि मस्जिदों और चर्चों को उनके धर्मों पर छोड़ दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने मंदिरों के राज्य नियंत्रण के खिलाफ फैसला सुनाया है पर कान इसका पालन किया जा रहा है। अदालत ने यह भी फैसला सुनाया है कि अगर कुछ मंदिरों में कुप्रबंधन के आरोप लगते हैं तो सरकार का हस्तक्षेप केवल सीमित अवधि के लिए अनुच्छेद 31 ए (1) (बी) के अनुसार चीजों को ठीक करने के लिए हो सकता है। लेकिन यह सब बेकार है। राज्य सरकारों द्वारा लगभग सभी हिंदू मंदिरों का राष्ट्रीयकरण किया जा रहा है। मंदिर हिंदू धर्म का जीवन और आत्मा हैं। मंदिरों ने धार्मिक शिक्षा, आत्म-सुधार और आत्म रक्षा की क्षमता प्रदान की। उन्होंने जरूरतमंद हिंदुओं की सेवा करने के लिए संसाधन क्षमता बढ़ाने में भी मदद की। मंदिरों के इस प्रकार से सरकारी अधिग्रहण ने हिंदू धर्म को पूरी तरह से पंगु बना दिया है।

अनुच्छेद 27 यह निर्धारित करता है कि किसी भी व्यक्ति को किसी भी कर का भुगतान करने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा, जिसकी आय विशेष रूप से किसी विशेष धर्म के प्रचार या रखरखाव के खर्चों के भुगतान में विनियोजित की जाती है। फिर भी, बहुसंख्यक हिंदुओं को छोड़कर धार्मिक अल्पसंख्यकों से कर नहीं लिया जाता है। बल्कि उनके लाभ के लिए धर्मनिरपेक्ष सार्वजनिक निधि से तैयार की गई छात्रवृत्ति, सब्सिडी, योजनाओं, ऋणों और बजट के लिए विशेष प्रावधान हैं। तकनीकी रूप से, किसी धर्म के लाभ के लिए विशेष रूप से कोई कर नहीं लगाया जाता है। पर अल्पसंख्यकों के धार्मिक पहचान के आधार पर बड़ी मात्रा में सार्वजनिक धन आवंटित किया जाता है। किसी धर्मनिरपेक्ष सार्वजनिक निधि से एकत्र किये गए धन का इस प्रकार से इस्तेमाल कितना सही है ?

अनुच्छेद 28 धार्मिक निर्देशों को सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली से बाहर रखता है। कोई भी सभ्यता तभी तक जीवित रह सकती है, जब तक उसके पालन-पोषण की व्यवस्था हो। हमारी हिन्दू सभ्यता हमेशा से एक ज्ञान आधारित सभ्यता रही है जिसमें विभिन्न विषयों पर ज्ञान और साहित्य का विशाल भंडार है। ऋग्वेद दुनिया का सबसे पुराना ज्ञात ग्रंथ है,वहीँ महाभारत दुनिया की अब तक लिखी गई सबसे लंबी कविता है। ऐसी विरासत पर किसी भी देश को गर्व होगा।

फिर भी, हमारे प्राचीन ग्रंथों जैसे वेदों,उपनिषदों , रामायण , महाभारत को सार्वजनिक शिक्षा के माध्यम से पढ़ाना प्रतिबंधित है। राज्य हिंदुओं को उनके सांस्कृतिक ज्ञान से वंचित कर रहा है। यदि वे ग्रन्थ सभ्यता सिखाते हैं तो उन्हें सार्वजनिक शिक्षा में पढ़ाने में क्या बुराई है?

hindutva, hindu, religion,hinduism हिन्दू धर्मरक्षकों को बताया जा रहा है पाखंडी।[ Pixabay ]


अनुच्छेद 29 सभी को उनकी भाषा, लिपि या संस्कृति को संरक्षित करने के लिए सांस्कृतिक अधिकार प्रदान करता है। इसमें भी अल्पसंख्यक शब्द लोगो में एक ऐसी समझ पैदा करता है की संविधान ने केवल अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक अधिकारों की गारंटी दी है, न कि बहुसंख्यक हिंदुओं को।

अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का अधिकार प्रदान करता है। वहीँ हिन्दू बहुसंख्यकों के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। नतीजतन, अनुचित राज्य हस्तक्षेप हिंदू शैक्षणिक संस्थानों के काम - काज को कमजोर करता है, जबकि अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यक संस्थानों की रक्षा करता है।

अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के नाम पर इस तरह के भेदभाव करना किकिस हद तक सही है ? हिंदुओं को उनकी पसंद के शिक्षण संस्थानों के प्रबंधन के अधिकार से वंचित करना न केवल हिंदुओं को उनके धार्मिक और सांस्कृतिक बंधनों से दूर कर रहा है, बल्कि हिंदू समाज के विखंडन को भी बढ़ावा दे रहा है। यदि अभी भी हिन्दू अपने धर्म के संरक्षण के लिए आगे नहीं आये तो वो दिन दूर नहीं जब धर्मान्तरण करने वाले अपने धर्म का पूरी तरह से विस्तार कर लेंगे और हम हिन्दू बस देखते रह जाएंगे।

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