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नोआखाली नरसंहार : इतिहास में हिन्दुओं के लिए काला दिन

10 अक्टूबर 1946 , जब हिंदुस्तान की मिट्टी पर मुसलमानों ने हिन्दुओं का ही खून बहाया था।

नोआखाली में हुआ हिन्दू नरसंहार। [Wikimedia commons]

10 अक्टूबर 1946 , यह दिन हिन्दुओं के लिए काले अक्षर में लिखा जाना चाहिए। यही वो दिन है जब आज से ठीक 75 साल पहले नोआखाली ( जो इस समय बांग्लादेश का हिस्सा है ) में दंगों की शुरुआत हुई जिसमें मुसलामानों ने भयंकर नरसंहार किया। लाखों की संख्या में हिन्दुओं को मारा गया। कोजागरी लक्ष्मी पूजा के दिन शुरू हुआ यह नरसंहार लगभग एक सप्ताह तक चला जिसमे नोआखली के आसपास के इलाकों के 95 प्रतिशत हिन्दू जनसंख्या को गायब कर दिया गया।

इसकी शुरुआत फरवरी 1946 से ही हो गयी थी जब देश को आजादी मिलने वाली थी। अंग्रेज भारत छोड़ कर जाने वाले थे। ब्रिटिश प्रधान मंत्री क्लेमेंट एटली ने भारत में कैबिनेट मिशन भेजा। मिशन का उद्देश्य था के भारत के साथ समझौता करके एक संविधान बनाने वाली संस्था को तैयार करना और भारतीय दलों के समर्थन से एक कार्यकारी परिषद् की स्थापना करना। मिशन तब फेल होने लगा जब कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मतभेद शुरू हुए। कांग्रेस पार्टी एक मज़बूत भारत चाहती थी वहीं मुस्लिम लीग बंटवारे के जिद्द पर अड़ गई थी। मतभेद जब ज्यादा बढ़ने लगे तब जून 1946 में मिशन द्वारा एक नयी योजना प्रस्तावित की गयी। इस योजना ने एक हिन्दू बहुल भारत और एक मुस्लिम बहुल भारत यानि पाकिस्तान बनाने का प्रस्ताव पेश किया जिसे जवाहर लाल नेहरू ,सरदार वल्लभ भाई पटेल आदि कांग्रेस नेताओं ने ठुकरा दिया। इससे बौखलाए मोहम्मद अली जिन्नाह ने 16 अगस्त 1946 को '' डायरेक्ट एक्शन डे '' लांच कर दिया जिसके बाद सांप्रदायिक हिंसा भड़क गई और देश के अलग अलग हिस्से में हिन्दू-मुस्लिम दंगे शुरू हो गए।


10 अक्टूबर को जब भारी संख्या में बंगाली हिन्दू कोजागरी लक्ष्मी पूजा के लिए एकत्रित हुए हुए थे तब मुस्लिम दंगाइयों ने उनपर हमला कर दिया। वहां मौजूद सभी हिन्दुओं को मार दिया गया। इस दंगे को भड़काने में मुस्लिम नेता सरवर हुसैनी का सबसे बड़ा हाथ माना जाता है। वह मुस्लिमों को हिन्दुओं के खिलाफ हमेशा से भड़कता था। इन दंगों की शुरुआत ने उसके मंसूबे को और मजबूत कर दिया। इसके बाद वह और भड़काऊ भाषण देने लगा जिससे प्रभावित होकर मुसलमान हिन्दुओं को मारने लगे। इसके बाद 12 अक्टूबर को चित्तरंजन दत्त रायचौधरी जो एक स्वतंत्रता सेनानी थे , उनके निवास पर भी मुस्लिम समुदाय द्वारा हमला किया गया और उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। स्वतंत्रता सेनानी लालमोहन सेन को भी नहीं बख्शा गया। उनका घर भी लूट कर ढहा दिया गया।

13 अक्टूबर की दोपहर को खतरनाक हथियारों से लैस मुसलमानों का एक झुण्ड चंगीर गांव में हिन्दुओं पर हमला कर देता है। उनके घरों को लूट कर उनमे आग लगा दिया जाता है और उन्हें जबरन इस्लाम कुबूल करने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। हिन्दुओं को मारने काटने के बाद भी उनका पेट नहीं भरा तो हिंदू मंदिरों को भी तोड़ दिए। हिंदुओं को गायों को मारने और गोमांस खाने के लिए मजबूर किया गया।

"लगभग 200 वर्ग मील के क्षेत्र में दंगों की भीड़ से घिरे निवासियों का नरसंहार किया जा रहा है, उनके घरों को जलाया जा रहा है, उनकी महिलाओं को जबरन ले जाया जा रहा है और हजारों का जबरन धर्म परिवर्तन किया जा रहा है। हजारों गुंडों ने गांवों पर हमला किया, उन्हें (हिंदुओं को) अपने मवेशियों को मारने और खाने के लिए मजबूर किया। प्रभावित गांवों में सभी पूजा स्थलों को अपवित्र कर दिया गया है। नोआखली के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक ने इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। ''

- (द स्टेट्समैन ; दिनांक - 16/10/1946)

''आज 13वें दिन, नोआखली जिले के रामगंज, लक्ष्मीपुर, रायपुर, बेगमगंज और सेनबाग थानों (पुलिस स्टेशन) के लगभग 120 गाँव, जिनकी हिंदू आबादी 90,000 है और तिप्पेरा (कोमिला) जिले के चांदपुर और फरीदगंज थानों में करीब 70,000 ग्रामीण हैं। गुंडों द्वारा घेर लिया गया। मौत इन क्षेत्रों के लोगों को उनके चेहरे पर घूरती है और सेना की मदद से इन क्षेत्रों में तत्काल आपूर्ति की जाती है, जो अकेले ऐसा कर सकता है, इन लोगों के जीवन को बचाएगा, जिनमें से अधिकांश पिछले कुछ दिनों से भोजन के बिना हैं ।"

- (अमृता बाजार पत्रिका ; दिनांक - 23/10/46 )

इस दंगे में 5000 हिन्दुओं को बेरहमी से मार दिया गया और 4 लाख की आबादी का 95 % को इस्लाम धर्म में जबरन परिवर्तित कर दिया गया। ये अत्याचार यहीं नहीं थमे , सैकड़ों हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार हुए।

"सबसे बुरी स्थिति महिलाओं की थी। उनमें से कई को अपने पतियों की हत्या होते हुए देखना पड़ा और फिर उनका जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया और उनकी मृत्यु के लिए जिम्मेदार लोगों में से कुछ से शादी कर ली गई। उन महिलाओं की मरी हुई नज़र थी। यह निराशा नहीं थी, इतना सक्रिय कुछ भी नहीं था। यह कालापन था ……… गोमांस खाने और इस्लाम के प्रति निष्ठा की घोषणा को उनके जीवन की कीमत के रूप में कई हजारों पर मजबूर किया गया है"

- [नोआखाली को भेजी गई राहत समिति की सदस्य ' मिस म्यूरियल लिस्टर ' ने 6 नवंबर,1946 को लिखा, (वी.वी. नागरकर - उत्पत्ति - पृष्ठ 446 )

"प्रामाणिक स्रोतों से यह ज्ञात हुआ है कि मुसलमानों द्वारा एक स्थान पर 400 और अन्य 300 महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था। मुस्लिम भीड़ के लिए, हिंदू महिलाओं के सम्मान के उल्लंघन का मतलब हिंदू पहचान और धर्म के सबसे संरक्षित पहलू का प्रदर्शन था।

- (श्री सिम्पसन, आईसीएस नेअपने पत्रों में लिखा है )

एक हफ्ते से ज्यादा चले इस दंगे में हिन्दुओं को बचाने के लिए कोई नहीं आया।

इसके बाद 6 नवंबर को महात्मा गाँधी जब नोआखली पहुंचे और उसके आस पास के इलाकों का दौरा करने निकले तो मुस्लिम उपद्रवियों ने उनके रस्ते में भी कांटे बिछाए , उनके रास्ते पर गोमांस तक फेंक दिया गया जिससे वो ये दौरा न कर पाएं। गाँधी ने वहां गांव-गांव घूम कर सभाएं की जिससे दंगा रोका जा सके, पर सब विफल रहा। अंत में महात्मा गाँधी ने भी हाथ खड़े कर दिए और हिन्दुओं से बोल दिया की अगर जान बचानी है तो नोआखाली छोड़ दें। हिन्दू जब नोआखली से भागकर बिहार में शरण लेने पहुंचे तो वहां जिन्नाह ने पहले से अपने आदमी खड़े कर रखे थे जिन्होंने बिहार पहुँचते ही हिन्दुओं का क़त्ल करना शुरू कर दिया। बाद में जवाब में बिहार के छपरा जिले से हिन्दुओं ने भी मुस्लिमों को मारना शुरू कर दिया।

यह भी पढ़ें : हिंदुत्व की रक्षा के लिए जरूरी है हिन्दुओं का आगे आना

ये वही जिन्नाह था जिसने एक वक़्त पर कहा था की मैं एक सच्चा भारतीय हूँ और आखिरी दम तक भारत के लिए काम करता रहूँगा। आज यही जिन्नाह भारत की मिट्टी पर ही उसके सपूतों का खून बहा रहा था। जिन्नाह कट्टरपंथ को आतंक की शक्ल देने वाला मुसलमान था और इससे बड़ा सबूत और क्या होगा।

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