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संस्कृति

श्रीमद्भगवद्गीता और अज़ान पर क्यों अटकाई गई सूई?

श्रीमद्भगवद्गीता और अज़ान पर अब नई बहस छिड़ी हुई है। शिवसेना के नेता पांडुरंग सकपाल ने अज़ान प्रतियोगिता के आयोजन की पेशकश की थी। साथ ही यह तर्क दिया कि गीता पढ़ने की प्रतियोगिता हो सकती है अज़ान की क्यों नहीं।

(Wikimedia Commons)

हाल ही में शिवसेना ने एक नए मुद्दे को जन्म दिया है। जिसमे शिवसेना के ही नेता पांडुरंग सकपाल का यह कहना है कि उन्हें अज़ान पढ़ने की प्रतियोगिता का सुझाव आया था और उन्हें यह सुझाव अच्छा भी लगा। साथ में यह तर्क भी पेश किया कि अगर श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ने के प्रतियोगिता का आयोजन हो सकता है तो अज़ान का करने में कोई पशोपेश नहीं रहना चाहिए। चौकाने वाली बात यह रही की शिवसेना ने अपने ही नेता के सुझाव से खुद को किनारा कर लिया और ऐसी किसी प्रतियोगिता होने को अस्वीकार किया। किन्तु जब इस सुझाव को पांडुरंग सकपाल ने सबके सामने डिजिटल माध्यम से रखा तब एनसीपी नेता नवाब मलिक ने इसको अपना समर्थन दिया।

अगर किसी ने अज़ान की तुलना श्रीमद्भगवद्गीता से की है तो इसका स्पष्टीकरण करना हमारा दायित्व है। क्योंकि चाहे जितनी बार हम खुद को धर्मनिरपेक्ष कह लें मगर संस्कृति और संस्कृत के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है क्योंकि अज़ान और श्रीमद्भगवद्गीता में जमीन आसमान का अंतर है। दोनों के अर्थ को देखने के लिए गहराई में जाएंगे तब एक नए पहलु को अपने सामने पाएंगे। वह इसलिए क्योंकि अज़ान में यह साफ-साफ लिखा है कि “अश-हदू अल्ला-इलाहा इल्लल्लाह” जिसका हिंदी अनुवाद यह है कि “मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के सिवा कोई दूसरा इबादत के काबिल नहीं”; “अल्लाहु अकबर-अल्लाहु अकबर” अनुवाद यह है कि “अल्लाह सबसे महान”। किन्तु श्रीमद्भगवद्गीता में यह कहीं नहीं लिखा है कि एक धर्म और एक ही भगवान है। चाहे विष्णु हों या महेश हों आपकी जिसमे श्रद्धा है आपको उन्हें पूजने का अधिकार है। बल्कि श्रीमद्भगवद्गीता, महाभारत महाकाव्य की उपकथा है जिसमे कलयुग में और गृहस्त में आने वाली बाधाओं और उनके समाधान को बताया गया है।


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“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥” यह श्रीमद्भगवद्गीता के अट्ठारवें अध्याय का 66वां श्लोक है जिसका भावार्थ यह है कि “संपूर्ण धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर!” अब इन पंक्तियों को पढ़कर कुछ बुद्धिजीवियों का यह तर्क भी होगा कि यहाँ पर भी परमात्मा को सर्वशक्तिमान कहा गया है। इसका भी जवाब श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में दिया गया है:

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् |
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: || 11||

जिसका भावार्थ यह है कि “हे पृथानन्दन ! जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण आते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे मार्ग का अनुकरण करते हैं।” रामकृष्ण परमहंस जी ने बड़े सुलझे ढंग से इस श्लोक का भावार्थ प्रस्तुत किया है कि “ईश्वर किसी एक धर्म का नहीं है, सभी धर्म ईश्वर के हैं। आप सभी रास्तों के माध्यम से उससे संपर्क कर सकते हैं, सभी धर्म उसी की ओर ले जाते हैं। अलग-अलग दृष्टिकोणों में एक ही चीज़ के अलग-अलग विचार होंगे, एक दृश्य दूसरे को अमान्य नहीं करता है।”

श्रीमद्भगवद्गीता यह कभी नहीं कहता कि अल्लाह महान है या राम, किन्तु यह जरूर बताता है कि अच्छे कर्मों से आप दोनों को ही पा सकते हो। एक ही भगवान को महान कहना हिन्दू धर्म नहीं सिखाता क्योंकि सिख, जैन, बुद्ध और अन्य कई धर्म हैं जो हिंदुत्व से जन्मे हैं। तुलनात्मक टीका-टिप्पणी करना किसी के लिए भी आसान काम है। किन्तु सवाल यह कि सही कौन?

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(NewsGram Hindi)

अगले वर्ष भारत एक बार फिर सबसे बड़े राजनीतिक धमाचौकड़ी का साक्षी बनने जा रहा है। जिसकी तैयारी में अभी से राजनीतिक दल अपना खून पसीना एक कर रहे हैं। यह चुनावी बिगुल फूंका गया है राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, जहाँ जातीय समीकरण, विकास और धर्म पर खूब हो-हल्ला मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश चुनाव में जहाँ एक तरफ भाजपा हिन्दुओं को अपने पाले करने में जुटी वहीं विपक्ष ब्राह्मणों को अपनी तरफ करने के प्रयास में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। आने वाला उत्तर प्रदेश चुनाव क्या मोड़ लेगा इसका उत्तर तो समय बताएगा, किन्तु ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

आपको बता दें कि वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सभी पार्टियों ने खूब खून-पसीना बहाया था, किन्तु सफलता का परचम भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटों को जीत कर लहराया था। वहीं अन्य पार्टियाँ 50 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। भाजपा की इस जादुई जीत का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के धुआँधार रैली और मुख्यमंत्री चेहरे को जाहिर न करने को गया। किन्तु उत्तर-प्रदेश 2022 का आगामी चुनाव सत्ता पक्ष के चुनौतियों से भरा हो सकता है। वह इसलिए क्योंकि सभी राजनीतिक पार्टी अब धर्म एवं जाति की राजनीति के अखाड़े में कूद गए हैं। इसमें सबसे आगे हैं यूपी में राजनीतिक बसेरा ढूंढ रहे एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन औवेसी! जो खुलकर रैलियों में और टीवी पर यह कहते हुए सुनाई दे जाते हैं कि वह प्रदेश के मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए उत्तर प्रदेश आए हैं।

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(NewsGram Hindi, Shantanoo Mishra)

हिन्दू या हिंदुत्व, एक धर्म है या विचार इसका फैसला आज के समय में ग्रंथ, पुराण या धर्माधिकारी नहीं करते, अपितु इसका फैसला करता है कंप्यूटर के सामने बैठा वह तथाकथित बुद्धिजीवि जिसे न तो धर्म का ज्ञान है और न ही सनातन संस्कृति की समझ। इन्हें हम आम भाषा में लिब्रलधारी या लिब्रान्डू भी कहते हैं। यही तबका आज देश में ‘हिन्दू बांटों आंदोलन‘ का मुखिया बन गया है। समय-समय पर इस तबके ने देश में हिन्दुओं को हिंदुत्व के प्रति ही भड़काने का काम किया है। महिलाऐं यदि हिन्दू परंपरा अनुसार वस्त्र पहनती हैं तो वह इस तबके के लिए अभिव्यक्ति की आजादी पर चोट है और साथ ही यह पुराने जमाने का है, किन्तु इसी तबके के लिए हिजाब सशक्तिकरण की मूरत है। जब लव-जिहाद या धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाई गई थी तब भी इस तबके ने इसे प्रेम पर चोट या अभिव्यक्ति की आजादी जैसा बेतुका रोना रोया था। दिवाली पर जानवरों के प्रति झूठा प्रेम दिखाकर पटाखे न जलाने की नसीहत देते हैं और बकरी-ईद के दिन मौन बैठकर, सोशल मीडिया पर मिया दोस्त द्वारा कोरमा खिलाए जाने का इंतजार करते हैं।

सवाल करना एक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, किन्तु स्वयं को लिब्रलधारी बताने के लिए श्री राम और सनातन धर्म की परम्पराओं पर प्रश्न-चिन्ह उठाना कहाँ की समझदारी है? इसी तबके ने भारत में मुगलिया शासन को स्वर्णिम युग बताया था, साथ ही हिन्दुओं को मारने वाले टीपू सुल्तान जैसे क्रूर शासक को करोड़ों का मसीहा भी बताया था। लेकिन आज जब भारत का जागरुक युवा ‘छत्रपति सम्राट शिवाजी महाराज’ का नाम गर्व से लेता है तो यह तबका उसे भी संघी या बजरंग दल का बताने में देर नहीं करता। इस तबके के लिए हिंदुत्व धर्म नहीं एक पार्टी की विचारधारा और यह इसी मानसिकता को विश्व में अन्य लोगों तक पहुंचाकर हिन्दुओं को बदनाम करने का कार्य कर रहे हैं।

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(NewsGram Hindi, साभार: Wikimedia Commons)

आज शहीद स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे(Mangal Pandey) की 194वीं जयंती है। मंगल पांडे(Mangal Pandey) पराधीन भारत की आजादी के वह जननायक थे जिनके एक नारे ने स्वतंत्रता के संग्राम को नई ऊर्जा दिया था। मंगल पांडे(Mangal Pandey) को स्वतंत्रता का जनक भी कहा जाता है जिनके नक्शे-कदम पर चलकर शहीद भगत सिंह, आजाद जैसे वीरों ने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। मंगल पांडे(Mangal Pandey) उन वीरों में से थे जिनके लिए धर्म एवं स्वाभिमान भी बड़ा था और राष्ट्र की स्वतंत्रता भी।

मंगल पांडे!

शहीद मंगल पांडे 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में जन्में थे। मंगल पांडे(Mangal Pandey) क्रांतिकारी के रूप में उभरने से पूर्व कलकत्ता (कोलकाता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री” के सिपाही थे। अंग्रेजों ने भारतीय सिपाहियों को भी बहुत प्रताड़ित किया था। मंगल पांडे के साथ-साथ अन्य सैनिकों ने भी इन प्रताड़नाओं को सहा, किन्तु पानी सर से तब ऊपर चला गया जब भारतीय सैनिकों को सूअर और गाय की चर्भी लगे बारूद वाली बंदूक दी गईं। मंगल ब्राह्मण थे जिस वजह से उन्होंने अपने साथी सिपाहियों के साथ इसकी शिकायत बड़े अधिकारीयों से की। किन्तु इस मामले पर सुनवाई न होता देख उनमें प्रतिशोध की भावना उमड़ पड़ी।

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