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संस्कृति

बच्चों तक कैसे पहुंचाएं श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान?

श्रीमद्भगवद्गीता वह ज्ञान है जिसे अर्जित कर नास्तिक भी कर्म के पथ पर बिना किसी बाधा के चल पड़ता है। किन्तु सवाल यह की इस ज्ञान को बच्चों तक कैसे पहुंचाएं?

बच्चों में भगवद्गीता का ज्ञान सभी दुर्गुण को दूर रखता है।(Wikimedia Commons)

श्रीमद्भगवद्गीता वह ज्ञान है जिसे अर्जित कर नास्तिक भी कर्म के पथ पर बिना किसी बाधा के चल पड़ता है।भगवद्गीता के ज्ञान से पापी एवं लोभी भी हर प्रकार की बुराई छोड़कर अच्छे कर्मों का हाथ थाम लेते हैं। किन्तु हमें यह ध्यान रखना होगा कि इन सभी सद्गुणों को अर्जित करने के लिए गीता के ज्ञान को अपने मस्तिक्ष एवं हृदय में समाहित करना होगा। गीता के हर भाव से अपने कर्मों को परिचित कराना होगा जिसका आरम्भ यदि बाल्यावस्था से हो, तब वह और भी लाभदायक माना जाता है।

लोभ का इस्तेमाल गीता के ज्ञान में…

आज के आधुनिक युग में बच्चों और युवाओं में कर्म का लोभ कम और पैसे या इनाम का लोभ अधिक है। वह इनाम के लिए किसी भी प्रतियोगिता के लिए हाँ! कह सकते हैं। तो क्यों न इसी लोभ का प्रयोग ज्ञान चक्षु को बढ़ाने में किया जाए। माता-पिता एवं शिक्षण संस्थान समय-समय पर बच्चों में भगवत गीता के उच्चारण की प्रतियोगिता आयोजित कर सकते हैं। जिसमें जीतने वालों को इनाम और सभी भाग लेने वाले विद्यार्थियों को प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सकती है। इससे यह होगा कि बच्चों में इनाम जीतने की ललक बढ़ेगी और गीता के श्लोक को धीरे-धीरे कंठस्त कर लेंगे साथ ही गीता पढ़ते हुए उन सभी श्लोकों के सार का मतलब भी उन्हें पता चल जाएगा। माता-पिता अपने बच्चों से घर पर भी पैतरे का प्रयोग कर बच्चों में गीता के ज्ञान बच्चों तक पहुँचाने में कर सकते हैं। और कुछ समय बाद स्वयं बच्चे में भगवद्गीता के विषय में और जानने की ललक जागृत हो जाएगी, तब लोभ नहीं केवल लाभ होगा।


इन उपायों को कुछ शिक्षण संस्थान प्रयोग में भी ला चुके हैं और इससे उन्हें अधिक से अधिक बच्चों तक गीता के ज्ञान को पहुँचाने में सहायता प्राप्त हुई है। पिछले कुछ वर्षों से हरियाणा सरकार गीता महोत्सव के जरिए इसी प्रकार से गीता के ज्ञान का प्रचार एवं प्रसार करने का प्रयास कर रही है।

श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान विश्व के सम्पूर्ण रहस्य का सत्य है।(Wikimedia Commons)

माता-पिता के द्वारा बच्चों में धर्म के विषय में जागरुकता लाना…

“धर्मो रक्षति रक्षतः”; आज के धर्मनिरपेक्ष समाज में इस कथन के भाव को अवास्तविक रूप से प्रस्तुत किया जाता है, और इसे हिंसा या घृणा से जोड़ा जाता है। जबकि, यह भाव वास्तविक रूप से न ही किसी से घृणा करने को कहा जा रहा है और न ही हिंसा फैलाने को, बल्कि इस भाव का अर्थ है कि यदि हम अपने धर्म की रक्षा करेंगे तो धर्म हमारी रक्षा करेगा। धर्म की रक्षा तलवार या घृणा फैलाकर नहीं अपितु हर जन में धर्म के सद्भाव को जागृत करना होगा।

इसी भाव का प्रयोग माता-पिता या घर के बड़े-बुजुर्ग, बच्चों में धर्म के विषय में सकारात्मक भावना को उतपन्न करने में कर सकते हैं। अधिकांश घरों में दादा जी या दादी अपने पोते-पोतियों को गायत्री मंत्र का उच्चारण करवाते हैं, यदि इसके साथ वे गीता के ज्ञान को भी उन तक पहुंचाएंगे तो और अधिक लाभ होगा। साथ ही वह माता-पिता जिन्हें भगवत गीता के विषय में कोई ज्ञान नहीं है वह भी अपने बच्चों के साथ मिलकर उस परम ज्ञान को अर्जित कर सकेंगे।

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नियमतता ही नियम है, इस सिद्धांत को अपनाना होगा…

श्रीमद्भगवद्गीता को अपने जीवन का अभिन्न-अंश बनाना होगा। हर दिन, नियमित रूप से आधा या एक घंटा बच्चों के साथ भगवत गीता के ज्ञान और श्लोकोच्चारण को समर्पित करें। कुछ समय बाद यह कर्म भी आपके दिनचर्या का हिस्सा बन जाएगा। गीता के श्लोक एक या दो बार से नहीं कंठस्त होंगे उसके लिए आपको नियमित अभ्यास की आवश्यकता होती है और जब आप इस दिनचर्या को स्वयं पर लागू करेंगे तब बच्चों में भी इसके प्रति उत्साह एवं विचार उत्पन्न होगा।

पुस्तकों के जरिए बच्चों तक गीता को पहुँचाएं…

आज के आधुनिक युग में जहाँ छोटे से छोटा चीज ऑनलाइन उपलब्ध है वहाँ से आप कुछ ऐसी किताबें भी मंगवा सकते हैं तो आपके बच्चों को बड़े ही रोचक रूप से गीता का ज्ञान देंगे। अब तो किताबों को भी ऑनलाइन पढ़ा जा सकता है, अमेज़न किंडल आपको यह सुविधा भी प्रदान करता है। इस सुविधा का प्रयोग बच्चों तक गीता का ज्ञान पहुँचाने में कर सकते हैं।

ज्ञान, बच्चे और बड़े दोनों के लिए एक खजाने की तरह है। आप जितना उसे पाने की कोशिश करते हैं आपको उतना ही लाभ प्राप्त होता है। लाभ एवं लोभ में केवल एक मात्रा अंतर है किन्तु ज्ञान इस अंतर को सम्पूर्ण रूप से खत्म कर देता है।

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प्री-एक्लेमप्सिया गर्भावस्था के 20वें सप्ताह के बाद रक्तचाप में अचानक वृद्धि है। (Unsplash)

एक नए अध्ययन के अनुसार, जो महिलाएं गर्भावस्था के दौरान कोविड संकमित होती हैं, उनमें प्री-एक्लेमप्सिया विकसित होने का काफी अधिक जोखिम होता है। यह बीमारी दुनिया भर में मातृ और शिशु मृत्यु का प्रमुख कारण है। प्री-एक्लेमप्सिया गर्भावस्था के 20वें सप्ताह के बाद रक्तचाप में अचानक वृद्धि है। अमेरिकन जर्नल ऑफ ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी में प्रकाशित अध्ययन से पता चला है कि गर्भावस्था के दौरान सॉर्स कोव2 संक्रमण वाली महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान संक्रमण के बिना प्रीक्लेम्पसिया विकसित होने की संभावना 62 प्रतिशत अधिक होती है।

वेन स्टेट यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में आणविक प्रसूति और आनुवंशिकी के प्रोफेसर रॉबटरे रोमेरो ने कहा कि यह जुड़ाव सभी पूर्वनिर्धारित उपसमूहों में उल्लेखनीय रूप से सुसंगत था। इसके अलावा, गर्भावस्था के दौरान सॉर्स कोव 2 संक्रमण गंभीर विशेषताओं, एक्लम्पसिया और एचईएलएलपी सिंड्रोम के साथ प्री-एक्लेमप्सिया की बाधाओं में उल्लेखनीय वृद्धि के साथ जुड़ा है। एचईएलएलपी सिंड्रोम गंभीर प्री-एक्लेमप्सिया का एक रूप है जिसमें हेमोलिसिस (लाल रक्त कोशिकाओं का टूटना), ऊंचा लिवर एंजाइम और कम प्लेटलेट काउंट शामिल हैं। टीम ने पिछले 28 अध्ययनों की समीक्षा के बाद अपने निष्कर्ष प्रकाशित किए, जिसमें 790,954 गर्भवती महिलाएं शामिल थीं, जिनमें 15,524 कोविड -19 संक्रमण का निदान किया गया था।

गर्भावस्था के दौरान संक्रमण के बिना प्रीक्लेम्पसिया विकसित होने की संभावना 62 प्रतिशत अधिक होती है। (Unsplash)

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राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने बुधवार को दोहराया कि भारत सामूहिक स्वास्थ्य और आर्थिक कल्याण सुनिश्चित करने के लिए Covid-19 महामारी के खिलाफ एक निर्णायक और समन्वित प्रतिक्रिया देने के वैश्विक प्रयासों में सबसे आगे रहा है। कोविंद ने यह भी कहा कि दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण अभियान के तहत भारतीयों को अब तक 80 करोड़ से अधिक खुराक मिल चुकी है।

राष्ट्रपति भवन से एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने बुधवार को एक आभासी समारोह में आइसलैंड, गाम्बिया गणराज्य, स्पेन, ब्रुनेई दारुस्सलाम और श्रीलंका के लोकतांत्रिक गणराज्य के राजदूतों/उच्चायुक्तों से परिचय पत्र स्वीकार किए।

अपना परिचय पत्र प्रस्तुत करने वाले राजदूत निम्न हैं : महामहिम गुडनी ब्रैगसन, आइसलैंड के राजदूत, महामहिम मुस्तफा जवारा, गाम्बिया गणराज्य के उच्चायुक्त, महामहिम जोस मारिया रिडाओ डोमिंगुएज, स्पेन के राजदूत, महामहिम दातो अलैहुद्दीन मोहम्मद ताहा, ब्रुनेई दारुस्सलाम के उच्चायुक्त, महामहिम अशोक मिलिंडा मोरागोडा, श्रीलंका के लोकतांत्रिक समाजवादी गणराज्य के उच्चायुक्त।


इस अवसर पर अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने इन सभी राजदूतों को उनकी नियुक्ति पर बधाई दी और उन्हें भारत में एक सफल कार्यकाल के लिए शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि भारत के इन सभी पांच देशों के साथ घनिष्ठ संबंध हैं और भारत इनके साथ शांति, समृद्धि का एक समन्वित दृष्टिकोण साझा करता है।

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देश भर से जमा की गई 2 लाख से अधिक ईंटें। (IANS)

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