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राजनीति

क्या ‘भाग्यनगर’ का उपाय हैदराबाद को पसंद आया?

बिहार चुनाव के बाद हैदराबाद नगर निगम चुनाव ने सबका ध्यान अपनी ओर केंद्रित किया। जिसमे सत्तारूढ़ पार्टी टीआरएस ने 55 और भाजपा ने 48 सीटें जीती।

हैदराबाद नगर निगम चुनाव में भाजपा 2 बड़ी पार्टी उभर कर आई। (Pixabay)

भारत में राजनीति कब किस मोड़ पलट जाए, यह कोई नहीं जानता। आज हवा इधर की तरफ तो कल उधर की। इस बार जनता ने अपने मिज़ाज को छुपा कर रखा और हैदराबाद नगर निगम चुनाव(GHMC) में अपने रुख को साफ़ कर दिया। भले ही वह रुख चुनाव के जरिए हो मगर हिंदुत्व का डंका जरूर बजा है। यह चुनाव इस नज़र से भी खास रहा क्योंकि हर पार्टी ने अपने बड़े चेहरों को चुनाव प्रचार में उतारा। भाजपा से अमित शाह, जेपी नड्डा और योगी आदित्यनाथ जैसे धाकड़ चेहरे प्रचार के मैदान उतरे और भाजपा को 48 सीट जीताने में अहम भुमिका निभाई। वहीं असदुद्दीन ओवैसी, जिनका हैदराबाद मजबूत खेमा माना जाता है वह 44 सीट जीतकर तीसरी बड़ी पार्टी बन गई। और सबसे बड़ी पार्टी बनकर आई सरकार में बैठी टीआरएस ने जिसने 55 सीट जीते।

भले ही यह नगर निगम का चुनाव था मगर हैदराबाद की जनता ने यह जता दिया है कि निज़ामी कट्टरता और उसकी हुकूमत हैदराबाद से जा चुकी है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रचार के दौरान जिस तरह से हैदराबाद का नाम बदल कर प्राचीन नाम ‘भाग्यनगर’ रखने का प्रस्ताव रखा तब से ही देश में हिंदुत्व के विचारकों में नया जोश आ गया। सभी के द्वारा सोशल मीडिया माध्यमों से भाग्यनगर के प्रस्ताव का स्वागत किया गया, और कईयों ने ‘भाग्यनगर’ नाम होने के सबूत तक पेश किए हैं।


मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने भाषण में कहा था “कुछ लोग मुझसे पूछ रहे थे कि क्या हैदराबाद का नाम फिर से भाग्यनगर हो सकता है? मैंने कहा क्यों नहीं. जब फैजाबाद का नाम अयोध्या हो सकता है, इलाहाबाद का नाम प्रयागराज हो सकता है तो हैदराबाद का नाम भाग्यनगर क्यों नहीं हो सकता।” 

यह भी पढ़ें: गृहमंत्री शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ जानिए क्यों किसानों की बैठक में नहीं हुए शामिल?

गृहमंत्री अमित शाह का भाग्यलक्ष्मी मंदिर जाना इसी कड़ी का दूसरा पहलु था। क्योंकि हैदराबाद की शान चार मीनार को तो दुनिया के कई लोगों ने देखा था। मगर चार मीनार के साथ ही सटे भाग्यलक्ष्मी मंदिर को अनसुना कर दिया जाता रहा। कानूनी लड़ाई के बाद आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने मंदिर में किसी भी प्रकार के स्थायी निर्माण पर रोक लगा दिया। पुजारियों का दावा है कि यह मंदिर 800 साल पुराना है। दरअसल, कुछ लोग यह दावा भी करते हैं कि भाग्यनगर के नाम से ही भाग्यलक्ष्मी मंदिर का नाम पड़ा था।

हैदराबाद का इतिहास जो भी रहा हो किन्तु 2020 में भाजपा के लिए यह अहम चुनाव था। क्योंकि भाजपा अपना विस्तार दक्षिण भारत में भी करने की कोशिश कर रही है। हालाँकि गौर करने वाली बात यह है कि भाजपा दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन कर आई है वह भी तब, जब किसान आंदोलन अपने चरम पर है। लेकिन टीआरएस का इस चुनाव में इतने कम सीटें आने का यह कारण बताया जा रहा है कि उनके द्वारा किए गए कई वादों पर काम ही नहीं शुरू हुआ है। जिस वजह से हैदराबाद की जनता उनसे नाखुश है।

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(NewsGram Hindi)

अगले वर्ष भारत एक बार फिर सबसे बड़े राजनीतिक धमाचौकड़ी का साक्षी बनने जा रहा है। जिसकी तैयारी में अभी से राजनीतिक दल अपना खून पसीना एक कर रहे हैं। यह चुनावी बिगुल फूंका गया है राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, जहाँ जातीय समीकरण, विकास और धर्म पर खूब हो-हल्ला मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश चुनाव में जहाँ एक तरफ भाजपा हिन्दुओं को अपने पाले करने में जुटी वहीं विपक्ष ब्राह्मणों को अपनी तरफ करने के प्रयास में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। आने वाला उत्तर प्रदेश चुनाव क्या मोड़ लेगा इसका उत्तर तो समय बताएगा, किन्तु ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

आपको बता दें कि वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सभी पार्टियों ने खूब खून-पसीना बहाया था, किन्तु सफलता का परचम भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटों को जीत कर लहराया था। वहीं अन्य पार्टियाँ 50 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। भाजपा की इस जादुई जीत का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के धुआँधार रैली और मुख्यमंत्री चेहरे को जाहिर न करने को गया। किन्तु उत्तर-प्रदेश 2022 का आगामी चुनाव सत्ता पक्ष के चुनौतियों से भरा हो सकता है। वह इसलिए क्योंकि सभी राजनीतिक पार्टी अब धर्म एवं जाति की राजनीति के अखाड़े में कूद गए हैं। इसमें सबसे आगे हैं यूपी में राजनीतिक बसेरा ढूंढ रहे एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन औवेसी! जो खुलकर रैलियों में और टीवी पर यह कहते हुए सुनाई दे जाते हैं कि वह प्रदेश के मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए उत्तर प्रदेश आए हैं।

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(NewsGram Hindi, Shantanoo Mishra)

हिन्दू या हिंदुत्व, एक धर्म है या विचार इसका फैसला आज के समय में ग्रंथ, पुराण या धर्माधिकारी नहीं करते, अपितु इसका फैसला करता है कंप्यूटर के सामने बैठा वह तथाकथित बुद्धिजीवि जिसे न तो धर्म का ज्ञान है और न ही सनातन संस्कृति की समझ। इन्हें हम आम भाषा में लिब्रलधारी या लिब्रान्डू भी कहते हैं। यही तबका आज देश में ‘हिन्दू बांटों आंदोलन‘ का मुखिया बन गया है। समय-समय पर इस तबके ने देश में हिन्दुओं को हिंदुत्व के प्रति ही भड़काने का काम किया है। महिलाऐं यदि हिन्दू परंपरा अनुसार वस्त्र पहनती हैं तो वह इस तबके के लिए अभिव्यक्ति की आजादी पर चोट है और साथ ही यह पुराने जमाने का है, किन्तु इसी तबके के लिए हिजाब सशक्तिकरण की मूरत है। जब लव-जिहाद या धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाई गई थी तब भी इस तबके ने इसे प्रेम पर चोट या अभिव्यक्ति की आजादी जैसा बेतुका रोना रोया था। दिवाली पर जानवरों के प्रति झूठा प्रेम दिखाकर पटाखे न जलाने की नसीहत देते हैं और बकरी-ईद के दिन मौन बैठकर, सोशल मीडिया पर मिया दोस्त द्वारा कोरमा खिलाए जाने का इंतजार करते हैं।

सवाल करना एक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, किन्तु स्वयं को लिब्रलधारी बताने के लिए श्री राम और सनातन धर्म की परम्पराओं पर प्रश्न-चिन्ह उठाना कहाँ की समझदारी है? इसी तबके ने भारत में मुगलिया शासन को स्वर्णिम युग बताया था, साथ ही हिन्दुओं को मारने वाले टीपू सुल्तान जैसे क्रूर शासक को करोड़ों का मसीहा भी बताया था। लेकिन आज जब भारत का जागरुक युवा ‘छत्रपति सम्राट शिवाजी महाराज’ का नाम गर्व से लेता है तो यह तबका उसे भी संघी या बजरंग दल का बताने में देर नहीं करता। इस तबके के लिए हिंदुत्व धर्म नहीं एक पार्टी की विचारधारा और यह इसी मानसिकता को विश्व में अन्य लोगों तक पहुंचाकर हिन्दुओं को बदनाम करने का कार्य कर रहे हैं।

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(NewsGram Hindi, साभार: Wikimedia Commons)

आज शहीद स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे(Mangal Pandey) की 194वीं जयंती है। मंगल पांडे(Mangal Pandey) पराधीन भारत की आजादी के वह जननायक थे जिनके एक नारे ने स्वतंत्रता के संग्राम को नई ऊर्जा दिया था। मंगल पांडे(Mangal Pandey) को स्वतंत्रता का जनक भी कहा जाता है जिनके नक्शे-कदम पर चलकर शहीद भगत सिंह, आजाद जैसे वीरों ने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। मंगल पांडे(Mangal Pandey) उन वीरों में से थे जिनके लिए धर्म एवं स्वाभिमान भी बड़ा था और राष्ट्र की स्वतंत्रता भी।

मंगल पांडे!

शहीद मंगल पांडे 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में जन्में थे। मंगल पांडे(Mangal Pandey) क्रांतिकारी के रूप में उभरने से पूर्व कलकत्ता (कोलकाता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री” के सिपाही थे। अंग्रेजों ने भारतीय सिपाहियों को भी बहुत प्रताड़ित किया था। मंगल पांडे के साथ-साथ अन्य सैनिकों ने भी इन प्रताड़नाओं को सहा, किन्तु पानी सर से तब ऊपर चला गया जब भारतीय सैनिकों को सूअर और गाय की चर्भी लगे बारूद वाली बंदूक दी गईं। मंगल ब्राह्मण थे जिस वजह से उन्होंने अपने साथी सिपाहियों के साथ इसकी शिकायत बड़े अधिकारीयों से की। किन्तु इस मामले पर सुनवाई न होता देख उनमें प्रतिशोध की भावना उमड़ पड़ी।

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