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टेक्नोलॉजी

साल 2025 तक भारत में 90 करोड़ एक्टिव इंटरनेट यूजर्स होंगे : रिपोर्ट

स्मार्टफोन यूजर्स की संख्या में तेजी से वृद्धि होने के साथ ग्रामीण भारत में डिजिटल अपनाने की प्रकिया में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है।

ग्रामीण भारत में डिजिटल अपनाने की प्रकिया में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। (Pixabay)

स्मार्टफोन यूजर्स (Smart Phone Users) की संख्या में तेजी से वृद्धि होने के साथ ग्रामीण भारत में डिजिटल अपनाने की प्रकिया में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। गुरुवार को सामने आई एक नई रिपोर्ट के मुताबिक इस ट्रेड को देखते हुए चार साल बाद यानी 2025 तक कुल सक्रिय इंटरनेट आबादी के 90 करोड़ तक पहुंचने की संभावना है। पिछले साल इनकी संख्या 62.2 करोड़ थी। शहरी भारत में इंटरनेट उपयोगकतार्ओं (Internet users) की संख्या में 4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। साल 2020 में ये आंकड़ा 32.3 करोड़ उपयोगकतार्ओं (शहरी आबादी का 67 प्रतिशत) तक पहुंच गया। ग्रामीण भारत में डिजिटल अपनाने की प्रक्रिया तेजी से जारी है। ये आंकड़े द इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आईएएमएआई) (IAMAI) की ओर से जारी रिपोर्ट में सामने आए हैं।

रिपोट के मुताबिक मोबाइल (Mobile) अभी भी शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में इंटरनेट तक पहुँचने के लिए पसंदीदा उपकरण बना हुआ है। सस्ते डेटा प्लान की उपलब्धता के साथ-साथ मोबाइल उपकरणों की सामथ्र्य को देखते हुए, मोबाइल डिवाइस के माध्यम से इंटरनेट तक पहुंच स्पष्ट रूप से पहली पसंद बन गई है,


रिपोर्ट ने सुझाव दिया कि भले ही शहरी क्षेत्रों में इंटरनेट की पहुंच ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में 2 गुना अधिक है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में उपयोगकर्ता की संख्या साल-दर-साल तेजी से बढ़ रही है।

द इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के कार्यकारी उपाध्यक्ष विश्वप्रिया भट्टाचार्जी ने कहा, 2025 तक, शहरी भारत की तुलना में ग्रामीण भारत में इंटरनेट (Internet) उपयोगकतार्ओं की अधिक संख्या होगी। इसे देखते हुए, इस उभरती जनसांख्यिकी की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र को विकसित करने की आवश्यकता होगी।

शहरी भारत में इंटरनेट उपयोगकतार्ओं (Internet users) की संख्या में 4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। (Pixabay)

भट्टाचार्जी ने एक बयान में कहा, अगले कुछ वर्षों में स्थानीय भाषा, आवाज और वीडियो डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गेम चेंजर के रूप में उभरेंगे। निष्कर्षों से पता चलता है कि 10 सक्रिय इंटरनेट उपयोगकतार्ओं में से नौ हर दिन इंटरनेट का उपयोग करते हैं । औसतन वे प्रतिदिन लगभग 107 मिनट (1.8 घंटे) सक्रिय रूप से इंटरनेट पर बिताते हैं।

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हालांकि, ग्रामीण भारत की तुलना में शहरी भारत में दैनिक उपयोगकतार्ओं का अनुपात थोड़ा अधिक है। शहरी भारत में एआईयू (सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ता) ग्रामीण भारत की तुलना में 17 प्रतिशत अधिक समय व्यतीत कर रहा है। छोटे शहरों में पांच सक्रिय इंटरनेट उपयोगकतार्ओं में से लगभग दो लोग हैं, जबकि शीर्ष 9 महानगरों में शहरी भारत में सक्रिय इंटरनेट उपयोगकतार्ओं का 33 प्रतिशत हिस्सा है।

रिपोर्ट में कहा गया है, हालांकि, ग्रामीण भारत में सक्रिय रूप से इंटरनेट का उपयोग नहीं करने वाली एक बड़ी आबादी है , लेकिन अगले कुछ वर्षों में इसमें विकास की बहुत बड़ी गुंजाइश है। दिलचस्प बात यह है कि ग्रामीण और शहरी भारत में पुरुष से महिला एआईयू का अनुपात लगभग समान है।

शहरी भारत में, पुरुष से महिला इंटरनेट उपयोगकतार्ओं का अनुपात लगभग 57:43 है जबकि ग्रामीण भारत में, पुरुष से महिला इंटरनेट उपयोगकतार्ओं के बीच का अनुपात 58:42 है। आईएएमएआई ने कहा कि भारत में इंटरनेट की बढ़ती पहुंच सभी हितधारकों को डिजिटल क्रांति का लाभ उठाने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करती है। (आईएएनएस-SM)

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एप्पल वॉच,सांकेतिक चित्र (Pixabay)

एक नए अध्ययन से जानकारी समाने आया है कि एप्पल वॉच सीरीज 6 'नियंत्रित परिस्थितियों में फेफड़ों की बीमारियों के रोगियों में हृदय गति और ऑक्सीजन संतृप्ति (एसपीओ2) प्राप्त करने का एक विश्वसनीय तरीका है।'

जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट में प्रकाशित अध्ययन ने 9टू5मैक की रिपोर्ट 'एप्पल वॉच डिवाइस कमर्शियल ऑक्सीमीटर के बीच मजबूत सकारात्मक सहसंबंध' देखा गया है।

ऐप्पल वॉच या वाणिज्यिक ऑक्सीमीटर उपकरणों में त्वचा के रंग, कलाई की परिधि, कलाई के बालों की उपस्थिति और एसपीओ 2 के लिए तामचीनी कील और हृदय गति माप के मूल्यांकन में कोई सांख्यिकीय अंतर नहीं था।

साओ पाउलो विश्वविद्यालय की ओर से अध्ययन एक आउट पेशेंट न्यूमोलॉजी क्लिनिक से क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज और इंटरस्टिशियल लंग डिजीज के 100 रोगियों के साथ किया गया।

इसने ऐप्पल वॉच सीरीज 6 के साथ एसपीओ 2 और हृदय गति डेटा एकत्र किया और उनकी तुलना दो वाणिज्यिक पल्स ऑक्सीमीटर से की।

परीक्षण स्वस्थ व्यक्तियों, इंटरस्टीशियल लंग डिजीज और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज वाले लोगों के साथ किए गए थे।

oximeter, corona virus, covid 19 कोरोना काल में ऑक्सीमीटर का सबसे अधिक उपयोग किया गया है।(Pixabay)

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बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार। (Twitter, Nitish Kumar)

जातीय जनगणना को लेकर बिहार में सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के दो बडे दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और जनता दल (युनाइटेड) अब सीधे तौर पर आमने-सामने नजर आने लगे हैं। केंद्र की भाजपा नीत राजग सरकार जहां जाति आधारित जनगणना कराने से इंकार कर रही है वहीं जदयू के नेता नीतीश कुमार इस मामले को लेकर विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के साथ मुखर हैं। ऐसे में कयास लगाया जाने लगा है कि क्या फिर से बिहार की सियासी समीकण बदलेंगे। हालांकि इस मुद्दे को लेकर कोई भी नेता अब तक खुलकर बात नहीं कर रही है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दिल्ली में रविवार को स्पष्ट कर चुके हैं कि जाति जनगणना देश के लिए जरूरी है। उन्होंने दिल्ली में कहा कि केंद्र सरकार को जातिगत जनगणना करानी चाहिए। इसके कई फायदे हैं।

उन्होंने कहा कि आजादी के पहले जनगणना हुई थी, आजादी के बाद नहीं हुई। जातीय जनगणना होगी तभी लोगों के बारे में सही जानकारी होगी। तब पता चलेगा कि जो पीछे है, उसे आगे कैसे किया जाए। जातीय के साथ उपजातीय जनगणना भी कराई जाए। उन्होंने यह भी कहा कि इसको लेकर एक बार फिर राज्य में सभी दलों के साथ बैठक कर आगे का निर्णय लेंगे। नीतीश के इस बयान के बाद तय है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जातिगत जनगणना के मामले में पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। इधर, भाजपा के नेता इसमें व्यवहारिक दिक्कत बता रहे हैं।

बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और सांसद सुशील कुमार मोदी कहते हैं कि तकनीकी और व्यवहारिक तौर पर केंद्र सरकार के लिए जातीय जनगणना कराना संभव नहीं है। इस बाबत केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार अगर चाहे तो वे जातीय जनगणना कराने के लिए स्वतंत्र है।


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अगरबत्ती उपयोग पर त्रिपुरा अपने खोए हुए गौरव को वापस पाने का संभव कोशिश कर रहा है। (Unsplash)

अगरबत्ती उपयोग पर त्रिपुरा अपने खोए हुए गौरव को वापस पाने का संभव कोशिश कर रहा है, जिसे पहले वियतनाम और चीन द्वारा नियंत्रण किया जा रहा था। त्रिपुरा इंडस्ट्रियल विकास निगम के अधिकारियों के अनुसार राज्य में बांस की छड़ियों का उत्पादन में भारी गिरावट आई है 2010 में 29,000 मीट्रिक टन से गिरकर 2017 में 1,241 मीट्रिक टन हो गया था, क्योंकि भारत कि प्रतिवर्ष 70,000 (96 प्रतिशत) मीट्रिक टन गोल बास की छड़ियां (46प्रतिशत) वियतनाम और (47 प्रतिशत) चीन द्वारापूरी की जा रही थी।

टीआईडीसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने आईएएनएस को बताया कि 2019 में, केंद्र सरकार ने सीमा शुल्क 25 प्रतिशत बढ़ा दिया और बांस के उत्पादों को प्रतिबंधित सूची में शामिल कर दिया गया, जिससे दूसरे देशों के लिए समस्या उत्पन्न हुई। वर्तमान में, पूर्वोत्तर राज्य 2,500 मीट्रिक टन बांस की छड़ें पैदा कर रहा है और आने वाले कुछ वर्षों में उत्पादन (12,000 मीट्रिक टन) पढ़कर हो जाएगा, क्योंकि आधुनिक मशीनों के साथ 14 और नई बांस की छड़ें निर्माण इकाइयां जल्द ही पूरे राज्य में आ जाएंगी।उन्होंने कहा, पहले त्रिपुरा के कारीगर हाथ से बांस की छड़ें बनाते थे ,परंतु कुछ साल पहले सरकार ने उनकी अनुकूल मशीन खरीदने में सहायता की।

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