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संस्कृति

जब ‘भारतीय’ विदेशी कला पर ताली पीटते हैं और भारतीय कला और कलाकृति को नकारते हैं, तब पश्चिमी अजेंडा जीतता दिखता है!

आज भी विन्ची की 'मोनालिसा' के लिए भारतियों द्वारा तालियां पीटी जाती हैं, किन्तु राजा रवि वर्मा की 'शकुंतला' आज कुछ ही लोगों के ध्यान में है।

(NewsGram Hindi)

भारत की कला ही भारतीयता की पहचान है, साथ ही यह कला भारत की प्राचीन संस्कृति एवं समृद्धि को बड़ी बारीकी से बताती है। प्राचीन भारत में अनेकों चित्रकार एवं एवं शिल्पकार जन्में जिनके कार्य को देख आज भी हमारा सीना गर्व से लालायित हो जाता है। ऐसी कई कलाकृतियां(Indian Art and culture) भारत भूखंड पर उपस्थित हैं जिन्हें देख भारत के गौरव गान करने के लिए मन उत्सुक रहता है। किन्तु भारत के अधिकांश इतिहासकारों ने न तो इस कला(Indian Art and culture) को लोगों तक पहुँचने दिया और न ही अपने किताबों में इन्हें जगह दी। आज भी विन्ची की ‘मोनालिसा’ के लिए भारतियों द्वारा तालियां पीटी जाती हैं, किन्तु राजा रवि वर्मा की ‘शकुंतला'(Indian Art and culture) आज कुछ ही लोगों के ध्यान में है। ‘ताज महल'(जो शायद हिन्दू कलाकृति है) को मुगल कारीगरी और तथाकथित प्यार की निशानी के रूप में जाना जाता है, जिसके विदेशों में भी चर्चे हैं और इसके लिए वह वाह-वाही बटोरता है। किन्तु भारत के सोमनाथ मंदिर को जिन मुगलों ने 6 बार ध्वस्त करने का प्रयास किया और वह आज भी अडिग हैं, उन्हें भारत की नई आधुनिक पीढ़ी ने ही भुला दिया है।

भारत में ऐसी कई कलाकृतियां(Indian Artand culture ) भी उपस्थित हैं जिनका इतिहास भी अनोखा है और उनमें कई रहस्य भी छुपे हैं। लेकिन इस विषय का ज्ञान आज के आधुनिक और अंग्रेजी को मातृभाषा बताने वाले युवाओं को नहीं हैं। वह इसलिए क्योंकि इन्होंने राष्ट्र-विरोधी अजेंडाधारकों को अपना सरताज मान लिया है, और इनके लिए वह नेता ही सबसे ऊपर हैं जो देश-विरोध में बात करते हैं, श्री राम को मिथ्या कहते हैं और जो चुनाव आते ही मंदिर-मंदिर भटकते हैं। इस नस्ल ने स्वयं को लिबरल या उदारवादी बताया है, किन्तु इनका निशाना केवल हिन्दू ही रहता है। भारत की प्राचीन संस्कृति को इन्होंने आधुनिकरण का नाम देकर मिटाने का षड्यंत्र रचा हुआ है। इन लिब्रलधारियों के लिए सनातन धर्म केवल एक विचारधारा है जो किसी संगठन या राजनीतिक पार्टी से प्रेरित है। इन्हे यह नहीं पता जिस संगठन को हिंदूवादी विचारधारा बता रहे हैं वह सनातन धर्म से प्रेरित है और इन सभी संगठन की स्थापना हिन्दू धर्म के वक्ता के रूप में हुई। सनातन धर्म आदिकाल से पूजा जाने वाला और पालन किया जाने वाला धर्म है।


आपको बता दें कि भारतीय कला को रूढ़िवादी ताकतों ने हर समय नीचा दिखाया है। उनके लिए हिन्दू कला या हिंदुत्व से जुड़ी कलाकृति का बखान करना कट्टरपंथी अजेंडे को फैलाने जैसा है। इन्होंने न कभी देश के मंदिरों का बखान किया और न ही कभी मंदिरों में उपस्थित कला। जिन महान शासकों के शासनकाल में में इन मंदिरों और कलाकृतियों का निर्माण हुआ उन्हें भी इन रूढ़िवादी विचारकों ने नीचा दिखाया।

अब समय बदला है!

किन्तु अब समय बदला है, और कई युवा ऐसे हैं जिन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को अपने प्राचीन संस्कृति के प्रति जागरूक करने का बीड़ा उठाया है। यह सभी सोशल मीडिया पर पर ऐसे अनोखे कलाकृतियों एवं मंदिरों को सामने ला रहे है जिनसे कुछ समय पहले शायद हम अछूते थे। भारत, कला के विषय में कितना धनी यह अब हमें इन्हीं छोटी-छोटी कोशिशों से ज्ञात हो रहा है। साथ ही भारत के वामपंथी इतिहासकारों के द्वारा भारतीय कला को हमसे किस तरह छुपाया गया, वह अब समझ में आ रहा है। सोशल मीडिया पर ऐसे कई कोशिश-कर्ता हैं जिनमें से एक का नाम हैं, Lost Temples जो फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर पर अपने पोस्ट के माध्यम से जनता को जागरूक करने में जुटा है। साथ ही इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया पर ऐसे कई पेज और व्यक्तिगत कार्यकर्त्ता उपस्थित हैं, जो इस जागरूकता के कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं।

यह भी पढ़ें: “सनातन धर्म” की महिमा का गुणगान, विदेशियों की जुबान

भारतीय संस्कृति एवं कला को जिस प्रकार से आज भी दबाया जाता है उसमें ऐसे कुछ कोशिश कर्ता उम्मीद की किरण दिखाई देते हैं। यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जो धर्म और सेक्युलरिस्म पर ज्ञान बांचते हैं उन्हें इन मंदिरों के इतिहास और कला का कोई ज्ञान नहीं है, जिस वजह से अधिकांश लोग, खासकर युवा-वर्ग(जो इन्हे बड़े ध्यान से सुनता है) को सनातन धर्म के विषय एक अंश भी ज्ञान प्राप्त नहीं होता है। और अनेक कारणों में से यह भी एक कारण है कि युवा देश-विरोध में उठ रही आवाजों का भी साथ देते हैं।

‘आने’ वाले समय में देश की स्थिति ‘आज’ पर निर्भर कर रही है। बीते हुए कल को हम नहीं बदल सकते हैं, किन्तु, यदि हमने आज को बदलने के साथ भारतीयता को पुनर्स्थापित करने प्रण ले लिया, तो भविष्य भी हमें याद रखेगा और ‘कम’ हो रही राष्ट्रवादिता पुनः सुरक्षित होने का आश्वासन प्राप्त करेगी।

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बीते एक साल से जिन तीन कृषि कानूनों पर किसान दिल्ली की सीमा पर और देश के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शन कर रहे थे, उन कानूनों को केंद्र ने वापस लेने का फैसला किया है। आपको बता दें कि केंद्र के इस फैसले से उसका खुदका खेमा दो गुटों में बंट गया है। कोई इस फैसले का समर्थन कर रहा है, तो कोई इसका विरोध कर रहा है। किन्तु यह सभी जानते हैं कि वर्ष 2022 में 6 राज्यों में विधानसभा चुनाव 2022 आयोजित होने जा रहे हैं, जिनमें शमिल हैं उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल-प्रदेश, और गोवा। और यह चुनाव सीधे-सीधे भाजपा के लिए नाक का सवाल है, वह भी खासकर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में।

उत्तर प्रदेश एवं पंजाब का चुनावी बिगुल, चुनाव से साल भर पहले ही फूंक दिया गया था। और अब केंद्र सरकार द्वारा कृषि कानून पर लिए फैसले का श्रेय अन्य राजनीतिक दल लेने में जुटे हैं। विपक्ष में कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को इस फैसले का ताज पहनाना चाहते हैं, तो कुछ विपक्षी दल अपने-अपने सर पर यह ताज सजाना चाहते हैं। मगर इन सभी का लक्ष्य एक ही है 'विधानसभा चुनाव 2022'।

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भारत में आधुनिक लिबरल संस्कृति ने, हिन्दुओं को कई गुटों में बाँट दिया है। कोई इस धर्म को पार्टी से जोड़ कर देखता है या किसी को यह धर्म ढोंग से भरा हुआ महसूस होता है। किन्तु सत्य क्या है, उससे यह सभी लिब्रलधारी कोसों दूर हैं। यह सभी उस भेड़चाल का हिस्सा बन चुके हैं जहाँ आसिफ की पिटाई का सिक्का देशभर में उछाला जाता है, किन्तु बांग्लादेश में हो रहे हिन्दुओं के नरसंहार को, उनके पुराने कर्मों का परिणाम बताकर अनदेखा कर दिया जाता है। यह वह लोग है जो इस्लामिक आतंकवादियों पर यह कहते हुए पल्ला झाड़ लेते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन जब आतंकी बुरहान वाणी को सुरक्षा बलों द्वारा ढेर किया जाता है तो यही लोग उसे शहीद और मासूम बताते हैं। ऐसे ही विषयों पर मुखर होकर अपनी बात कहने और लिखने वाली जर्मन लेखिका मारिया वर्थ(Maria Wirth) ने साल 2015 में लिखे अपने ब्लॉग में इस्लाम एवं ईसाई धर्म पर प्रश्न उठाते हुए लिखा था कि "OF COURSE HINDUS WON'T BE THROWN INTO HELL", और इसके पीछे कई रोचक कारण भी बताए थे जिनपर ध्यान केंद्रित करना आज महत्वपूर्ण है।

कुरान, गैर-इस्लामियों के विषय में क्या कहता है,

मारिया वर्थ, लम्बे समय से हिंदुत्व एवं सनातन धर्म से जुड़े तथ्यों को लिखती आई हैं, लेकिन 2015 में लिखे एक आलेख में उन्होंने ईसाई एवं इस्लाम से जुड़े कुछ ऐसे तथ्यों को उजागर किया जिसे जानना हम सबके के लिए आवश्यक है। इसी लेख में मारिया ने हिन्दुओं के साथ बौद्ध एवं अन्य धर्मों के लोगों को संयुक्त राष्ट्र में ईसाई एवं इस्लाम धर्म के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी और इसके पीछे उन्होंने यह कारण बताया कि ईसाई एवं इस्लाम दोनों ही धर्मों के बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि गैर-ईसाई या गैर-मुस्लिम नर्क की आग में जलेंगे। इसका प्रमाण देते गए उन्होंने क़ुरान की वह आयत साझा की जिसमें साफ-साफ लिखा गया है कि " जो काफिर होंगे, उनके लिये आग के कपड़े काटे जाएंगे, और उनके सिरों पर उबलता हुआ तेल डाला जाएगा। जिस से जो कुछ उनके पेट में है, और उनकी खाल दोनों एक साथ पिघल जाएंगे; और उन्हें लोहे की छड़ों से जकड़ा जाएगा।" (कुरान 22:19-22)

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देश में धर्मांतरण का मुद्दा नया नहीं है, लेकिन जिन-जिन जगहों पर हाल के कुछ समय में धर्मांतरण बढ़े हैं वह क्षेत्र नए हैं। आपको बता दें की पंजाब प्रान्त में धर्मांतरण या धर्म-परिवर्तन का काला खेल रफ्तार पकड़ चुका है और अपने राज्य में इस रफ्तार पर लगाम लगाने वाली सरकार भी धर्मांतरणकारियों का साथ देती दिखाई दे रही है। आपको यह जानकर हैरानी होगी, कि पंजाब में धर्मांतरण दुगनी या तिगुनी रफ्तार पर नहीं बल्कि चौगनी रफ्तार पर चल रही है। जिस वजह से पंजाब में हो रहे अंधाधुंध धर्म-परिवर्तन पर चिंता होना स्वाभाविक हो गया है।

गत वर्ष 2020 में कांग्रेस नेता और पंजाब में कई समय से सुर्खियों में रहे नवजोत सिंह सिद्धु ने दिसम्बर महीने में हुए एक ईसाई कार्यक्रम में, यहाँ तक कह दिया था कि 'जो आपकी(ईसाईयों) तरफ आँख उठाकर देखेगा उसकी हम ऑंखें निकाल लेंगे' जो इस बात पर इंगित करता है कि कैसे सत्ता में बैठी राजनीतिक पार्टी पंजाब में हो रहे धर्म परिवर्तन को रोकने के बजाय उसे राजनीतिक शह दे रही है। आपको यह भी बता दें कि 3.5 करोड़ की आबादी वाले पंजाब राज्य में लगभग 33 लाख लोग ईसाई धर्म को मानने वाले रह रहे हैं। पंजाब के कई क्षेत्रों में छोटे-छोटे चर्च का निर्माण हो रहा है और कई जगह ऐसे चर्च मौजूद भी हैं।

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