Never miss a story

Get subscribed to our newsletter


×
इतिहास

गोवा में मिशनरी द्वारा किए गए अत्याचारों का कहीं भी उल्लेख क्यों नहीं?

गोवा अधिग्रहण का वह काला अतीत न तो किसी दस्तावेज में मौजूद हैं और न ही इनके विषय में कोई लिबरल इतिहासकर बात करना चाहता है।

(Wikimedia Commons)

गोवा आज भारत के विकसित और पर्यटन के क्षेत्र में संपन्न राज्य है। गोवा को उसके मोहक समुद्री किनारों और सुंदर दृश्यों के लिए जाना जाता है। किन्तु आज, अगर आपको गोवा में पुर्तगाली या ईसाई छाप ज़्यादा देखने को मिलती है तो उसका भी एक काला अतीत है। जब पुर्तगाली आक्रमणकारियों द्वारा भारत पर हमला किया गया तब उन पुर्तगाली मिशनरियों का एक-मात्र उद्देश्य था केवल जबरन धर्म परिवर्तन करवाना। किन्तु इससे जुड़े दस्तावेजों को या तो गबन कर लिया या फिर नष्ट कर दिया गया।

गोवा अधिग्रहण का काला समय 1560 से लेकर 1812 तक चला, जब पुर्तगालियों ने देश पर आक्रमण किया और गोवा को अपने शासन में सम्मिलित कर लिया। जिसका खामियाजा वहाँ पर रह रहे हिन्दुओं को झेलना पड़ा। क्रूर मिशनरियों ने हिन्दुओं पर धर्मपरिवर्तन के लिए हर संभव प्रताड़ना दी। कुछ ने भय में आकर ईसाई धर्म अपना लिया और कइयों को क्रूर प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। इन मिशनरियों का काम ईसाई चर्चों का गोवा में बढ़ावा देना, हिन्दुओं का धर्मांतरण करवाना और उन्हें प्रताड़ना देना था। साथ ही उन सभी हिन्दुओं की जमीन पर अधिग्रहण करना भी था, जिन्होंने इसका विरोध किया।


गोवा अधिग्रहण के समय गोवा की मूल भाषा कोंकणी बोलने पर भी पाबन्दी लगा दी गई थी। आप इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि उन मिशनरियों का उद्देश्य क्या था। इसका प्रमाण आपको 25 जनवरी 1545 को जेसुकेट मिशनरी फ्रांसिस जेवियर द्वारा पुर्तगाल के राजा जॉन तृतीय को लिखे गए एक पत्र मिलता है जिसमे उन क्रूर कानूनों को मंजूरी देने की बात लिखी गई थी।

लोगों को आग में झोंक दिया जाता था। (ट्विटर)

मिशनरियों द्वारा किए गए क्रूरता को इस प्रकार सोचिए: आग में जलता हुआ व्यक्ति, कटे हुए शरीर के अंग, महिलाओं पर प्रताड़ना, आँखों में छेद, इत्यादि। यह सब उस समय धार्मिक तौर पर कानूनन सही ठहराया गया। जब गोवा अधिग्रहण कानून लागु भी नहीं हुआ था उससे पहले ही पुर्तगाली चर्च ने यह फरमान जारी कर दिया था की राज्य के सभी हिन्दू मंदिरों को तोड़ दिया जाए और उनकी संपत्ति को जब्त कर लिया जाए।

1539 में नए बनाए गए ईसाईयों का भी भारी संख्या में कत्लेआम करवाया गया क्योंकि चर्च को यह शक था की वह सभी गुप्त तरीके से अपने देवी देवताओं को पूजते हैं। इस सब का आदेश चर्च द्वारा ही दिया गया था। किन्तु वामपंथी इतिहासकारों ने अमानवीयता के चेहरे रहे फ्रांसिस जेवियर, एलेक्सीओ डिआज फाल्को और हेनरी ली को दुनिया के सामने धर्मपरायणता, परोपकार और समाज सेवा के शब्दों से सम्बोधित किया।

आप उस समय हिन्दुओं पर किए गए प्रताड़ना का अंदाजा लगाने के लिए ईसाई चर्च द्वारा बनाए गए कानूनों की तरफ ध्यान केंद्रित करें, जिसके उपरांत आपको यह ज्ञात हो जाएगा कि पुर्तगाली किस मकसद से भारत में आए थे:

१. एक हिंदू अनाथ बच्चे को ईसाईयों द्वारा जब्त कर लिया जाता था और उसे ईसाई धर्म में परिवर्तित कर दिया जाता। पुर्तगाल द्वारा यह शाही आदेश 1559 में चर्च को दी गई थी। इस तरह से सभी अनाथालयों को जब्त कर लिया गया था।

गोवा अधिग्रहण का दृश्य एक चित्रकार द्वारा।(Wikimedia Commons)

२. हिंदू महिलाएं अगर ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गईं, तो उन्हें पैतृक संपत्ति प्राप्त करने का अधिकार मिलता था। उनके हिंदू भाई-बहनों के बीच संपत्ति के बंटवारे की अनुमति नहीं थी।

३. सभी कानूनी कार्यवाहियों में, सभी कानूनी सबूतों के गवाह बनने के लिए हिन्दू होना अस्वीकार्य था। केवल ईसाई गवाहों को ही कानूनी सबूत के रूप में अनुमति दी गई थी। इस प्रकार सभी कानूनी निर्णयों की वैधता ईसाइयों और चर्च द्वारा विनियोजित की गई।

४. पुर्तगाली गोवा में हिंदू मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया था। हिंदू मंदिर के लिए कोई मरम्मत, रखरखाव, पुनर्निर्माण की अनुमति नहीं थी। इस प्रक्रिया में पूर्व 16 वीं शताब्दी के सभी मंदिरों को उजाड़ा गया और ध्वस्त कर दिया गया। किन्तु इतिहास के वामपंथी चाटुकारों ने कही इसका उल्लेख भी नहीं किया।

५. अनुष्ठान और विवाह और अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में हिंदू पुजारियों का सामाजिक जुड़ाव वर्जित था। केवल चर्च को सभी सामाजिक कार्यक्रमों को करने की अनुमति थी।

यह भी पढ़ें: आज अगर हम सोते रहे तो कल जागना मुश्किल है!

भारत की यह बदनसीबी कहें या इतिहासकारों का एकतरफा रवैया, लेकिन यह बात सच है कि आज जो लोग धर्मनिरपेक्ष का चोगा ओढ़ कर समानता की बात करते हैं उन्हें अपने अतीत के विषय में न कोई ज्ञान है और न ही उनके ज्ञान का कोई स्रोत है।

Popular

(NewsGram Hindi)

अगले वर्ष भारत एक बार फिर सबसे बड़े राजनीतिक धमाचौकड़ी का साक्षी बनने जा रहा है। जिसकी तैयारी में अभी से राजनीतिक दल अपना खून पसीना एक कर रहे हैं। यह चुनावी बिगुल फूंका गया है राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, जहाँ जातीय समीकरण, विकास और धर्म पर खूब हो-हल्ला मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश चुनाव में जहाँ एक तरफ भाजपा हिन्दुओं को अपने पाले करने में जुटी वहीं विपक्ष ब्राह्मणों को अपनी तरफ करने के प्रयास में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। आने वाला उत्तर प्रदेश चुनाव क्या मोड़ लेगा इसका उत्तर तो समय बताएगा, किन्तु ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

आपको बता दें कि वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सभी पार्टियों ने खूब खून-पसीना बहाया था, किन्तु सफलता का परचम भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटों को जीत कर लहराया था। वहीं अन्य पार्टियाँ 50 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। भाजपा की इस जादुई जीत का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के धुआँधार रैली और मुख्यमंत्री चेहरे को जाहिर न करने को गया। किन्तु उत्तर-प्रदेश 2022 का आगामी चुनाव सत्ता पक्ष के चुनौतियों से भरा हो सकता है। वह इसलिए क्योंकि सभी राजनीतिक पार्टी अब धर्म एवं जाति की राजनीति के अखाड़े में कूद गए हैं। इसमें सबसे आगे हैं यूपी में राजनीतिक बसेरा ढूंढ रहे एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन औवेसी! जो खुलकर रैलियों में और टीवी पर यह कहते हुए सुनाई दे जाते हैं कि वह प्रदेश के मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए उत्तर प्रदेश आए हैं।

Keep Reading Show less
(NewsGram Hindi, Shantanoo Mishra)

हिन्दू या हिंदुत्व, एक धर्म है या विचार इसका फैसला आज के समय में ग्रंथ, पुराण या धर्माधिकारी नहीं करते, अपितु इसका फैसला करता है कंप्यूटर के सामने बैठा वह तथाकथित बुद्धिजीवि जिसे न तो धर्म का ज्ञान है और न ही सनातन संस्कृति की समझ। इन्हें हम आम भाषा में लिब्रलधारी या लिब्रान्डू भी कहते हैं। यही तबका आज देश में ‘हिन्दू बांटों आंदोलन‘ का मुखिया बन गया है। समय-समय पर इस तबके ने देश में हिन्दुओं को हिंदुत्व के प्रति ही भड़काने का काम किया है। महिलाऐं यदि हिन्दू परंपरा अनुसार वस्त्र पहनती हैं तो वह इस तबके के लिए अभिव्यक्ति की आजादी पर चोट है और साथ ही यह पुराने जमाने का है, किन्तु इसी तबके के लिए हिजाब सशक्तिकरण की मूरत है। जब लव-जिहाद या धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाई गई थी तब भी इस तबके ने इसे प्रेम पर चोट या अभिव्यक्ति की आजादी जैसा बेतुका रोना रोया था। दिवाली पर जानवरों के प्रति झूठा प्रेम दिखाकर पटाखे न जलाने की नसीहत देते हैं और बकरी-ईद के दिन मौन बैठकर, सोशल मीडिया पर मिया दोस्त द्वारा कोरमा खिलाए जाने का इंतजार करते हैं।

सवाल करना एक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, किन्तु स्वयं को लिब्रलधारी बताने के लिए श्री राम और सनातन धर्म की परम्पराओं पर प्रश्न-चिन्ह उठाना कहाँ की समझदारी है? इसी तबके ने भारत में मुगलिया शासन को स्वर्णिम युग बताया था, साथ ही हिन्दुओं को मारने वाले टीपू सुल्तान जैसे क्रूर शासक को करोड़ों का मसीहा भी बताया था। लेकिन आज जब भारत का जागरुक युवा ‘छत्रपति सम्राट शिवाजी महाराज’ का नाम गर्व से लेता है तो यह तबका उसे भी संघी या बजरंग दल का बताने में देर नहीं करता। इस तबके के लिए हिंदुत्व धर्म नहीं एक पार्टी की विचारधारा और यह इसी मानसिकता को विश्व में अन्य लोगों तक पहुंचाकर हिन्दुओं को बदनाम करने का कार्य कर रहे हैं।

Keep Reading Show less
(NewsGram Hindi, साभार: Wikimedia Commons)

आज शहीद स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे(Mangal Pandey) की 194वीं जयंती है। मंगल पांडे(Mangal Pandey) पराधीन भारत की आजादी के वह जननायक थे जिनके एक नारे ने स्वतंत्रता के संग्राम को नई ऊर्जा दिया था। मंगल पांडे(Mangal Pandey) को स्वतंत्रता का जनक भी कहा जाता है जिनके नक्शे-कदम पर चलकर शहीद भगत सिंह, आजाद जैसे वीरों ने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। मंगल पांडे(Mangal Pandey) उन वीरों में से थे जिनके लिए धर्म एवं स्वाभिमान भी बड़ा था और राष्ट्र की स्वतंत्रता भी।

मंगल पांडे!

शहीद मंगल पांडे 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में जन्में थे। मंगल पांडे(Mangal Pandey) क्रांतिकारी के रूप में उभरने से पूर्व कलकत्ता (कोलकाता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री” के सिपाही थे। अंग्रेजों ने भारतीय सिपाहियों को भी बहुत प्रताड़ित किया था। मंगल पांडे के साथ-साथ अन्य सैनिकों ने भी इन प्रताड़नाओं को सहा, किन्तु पानी सर से तब ऊपर चला गया जब भारतीय सैनिकों को सूअर और गाय की चर्भी लगे बारूद वाली बंदूक दी गईं। मंगल ब्राह्मण थे जिस वजह से उन्होंने अपने साथी सिपाहियों के साथ इसकी शिकायत बड़े अधिकारीयों से की। किन्तु इस मामले पर सुनवाई न होता देख उनमें प्रतिशोध की भावना उमड़ पड़ी।

Keep reading... Show less