पुतिन की राह आसान, डोनाल्ड ट्रंप के इस कदम से अब टूटने की कगार पर NATO!

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जिन्होंने वेनेज़ुएला पर हमला करने के बाद अब अपने ही यार दोस्तों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ट्रंप ने सीधे तौर पर ये कह दिया कि उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के नज़रिए से ग्रीनलैंड की ज़रूरत है।
तस्वीर में डोनाल्ड ट्रंप पुतिन के साथ ग्रीनलैंड की भी फोटो।
डोनाल्ड ट्रंप के इस कदम से खत्म होगा NATO X
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Summary

  • अमेरिका राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्कटिक रणनीति के नाम पर ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा चाहता है।

  • डेनमार्क के समर्थन में यूरोपीय देशों ने ट्रंप का विरोध कर NATO में दरार का संकेत दिया।

  • NATO कमजोर हुआ तो रूस को रणनीतिक बढ़त मिलेगी और यूक्रेन और असुरक्षित होगा।

आप सबने एक गाना जरूर सुना होगा, 'अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का, यार ने ही लूट लिया घर यार का', ऐसी ही कुछ हालत यूरोपीय संघ के नेताओं की हुई होगी। इन सबके पीछे हैं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जिन्होंने वेनेज़ुएला पर हमला करने के बाद अब अपने ही यार दोस्तों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ट्रंप ने सीधे तौर पर ये कह दिया, कि उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के नज़रिए से ग्रीनलैंड की ज़रूरत है, क्योंकि इस जगह के आसपास रूसी और चीनी जहाज़ मौजूद हैं और अमेरिका इस देश पर कब्जा कर लेगा।

डोनाल्ड ट्रंप का ये बयान जैसे ही सामने आया, उसके बाद यूरोपीय संघ के नेताओं के बीच भूचाल मच गया। भूचाल इसलिए क्योंकि, ग्रीनलैंड पर डेनमार्क का कब्जा है और डेनमार्क खुद NATO का हिस्सा है। ऐसे में ट्रंप के बयान के बाद फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन, ब्रिटेन और डेनमार्क ने मिलकर एक संयुक्त बयान जारी किया है। अब इन सारी परिस्थितियों को देखकर ऐसा लग रहा है, NATO में फूट पड़ने वाली है और इसका सीधा फायदा रूस के राष्ट्रपति पुतिन को होने वाला है। आइये इस प्रकरण को समझते हैं।

ट्रंप के खिलाफ हुए यूरोपीय देश

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जब ये कहा कि वेनेज़ुएला के बाद उनकी नज़र ग्रीनलैंड पर है, तो सभी यूरोपीय संघ के नेता हैरान रह गए। फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन और यूनाइटेड किंगडम के नेताओं ने डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन (Mette Frederiksen) के साथ मिलकर एक संयुक्त बयान साझा किया। सबने मिलकर साफ़ कहा कि ग्रीनलैंड वहां के लोगों का है और इसके भविष्य पर फैसला ग्रीनलैंड और डेनमार्क ही कर सकते हैं, अमेरिका नहीं।

डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन (Mette Frederiksen) ने तो ट्रंप को चेतावनी तक दे दी। उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका ने अपने ही किसी सहयोगी देश पर हमला किया, तो इसका मतलब होगा कि NATO (North Atlantic Treaty Organization) खत्म हो जाएगा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जो सुरक्षा व्यवस्था बनी थी, वो भी पूरी तरह से बिखर जाएगा।

वहीं, पोलैंड के पीएम ने कहा, कि एक नाटो सदस्य द्वारा दूसरे को धमकाना गठबंधन के मतलब को ही खत्म कर देता है, जबकि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर (Keir Starmer) और फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी डेनमार्क को सपोर्ट किया। मैक्रों ने साफ़ कहा कि "ग्रीनलैंड डेनमार्क की संप्रभुता के अधीन एक क्षेत्र है और वह वैसा ही रहेगा जबकि स्टारमर बोले कि ग्रीनलैंड के भविष्य का फैसला सिर्फ़ ग्रीनलैंड और डेनमार्क ही कर सकते हैं, कोई तीसरा देश नहीं।

इस बयान पर पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टुस्क, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर, डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन, इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, स्पेन के प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और जर्मनी के चांसलर मर्ज के हस्ताक्षर हैं। यूरोपीय नेताओं का कहना है, कि आर्कटिक की सुरक्षा मिल-जुलकर होनी चाहिए, न कि किसी देश पर कब्ज़ा करके।

ग्रीनलैंड पर कैसे हैं डेनमार्क का कब्जा?

यहाँ एक सवाल यह उठता है कि ग्रीनलैंड आखिर कैसे डेनमार्क का हिस्सा है और डोनाल्ड ट्रंप क्यों इसपर हमला करना चाहते हैं, जबकि ये NATO (North Atlantic Treaty Organization) का हिस्सा है? इसे समझने के लिए इतिहास में थोड़ा पीछे चलते हैं। दरअसल, ग्रीनलैंड पर डेनमार्क का हक़ बहुत पुराना है। पहले डेनमार्क और नॉर्वे एक साथ थे और ग्रीनलैंड भी उन्हीं के पास था लेकिन जब 1814 में डेनमार्क और नॉर्वे अलग हुए, तो ग्रीनलैंड डेनमार्क के हिस्से में ही रह गया।

इसको लेकर विवाद भी हुआ, तब अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने 1933 में यह फैसला सुनाया कि ग्रीनलैंड डेनमार्क के पास ही रहेगा। वहीं, 2009 में ग्रीनलैंड को छोटे-मोटे फैसले लेने की आज़ादी जरूर मिली लेकिन सुरक्षा (फौज), दूसरे देशों से बातचीत और पैसे का इंतज़ाम डेनमार्क ही करता है। इसीलिए क़ानूनी तौर पर ग्रीनलैंड डेनमार्क का ही हिस्सा माना जाता है।

बता दें, कि 1949 में जब डेनमार्क NATO (North Atlantic Treaty Organization) का हिस्सा बना, तो ग्रीनलैंड खुद ही इसके अन्तर्गत आ गया। शीत युद्ध (Cold War) के दौरान इसकी भौगोलिक स्थिति अमेरिका और यूरोप की सुरक्षा के लिए बेहद अहम थी। साथ ही सोवियत संघ (रूस) से अमेरिका पर मिसाइल हमले का सबसे छोटा रास्ता उत्तरी ध्रुव और ग्रीनलैंड के ऊपर से होकर जाता था, इसलिए इसे इसे एक ढाल की तरह इस्तेमाल किया गया। NATO देशों ने यहाँ रडार और मिलिट्री बेस बनाए ताकि रूसी मिसाइलों का पता लगाया जा सके और अटलांटिक महासागर में रूसी पनडुब्बियों की घुसपैठ को रोका जा सके।

क्या है NATO?

अब ये समझते हैं, कि आखिर NATO (North Atlantic Treaty Organization) है क्या? दरअसल, ये अमेरिका और यूरोपीय देशों का एक सैन्य गठबंधन जो 1949 में बनाया गया था। इसका मकसद था सोवियत संघ (रूस) के बढ़ते दबदबे को रोकना। दूसरे विश्व युद्ध के बाद पश्चिमी देशों को डर था कि रूस उन पर हमला कर सकता है। अपनी सुरक्षा के लिए ये देश एक साथ आए। इसका आर्टिकल 5 (Article 5) कहता है, कि अगर किसी देश ने NATO से जुड़े सदस्य पर हमला किया, तो इस सदस्य के सभी देश मिलकर उसपर हमला करेंगे।

NATO का अंत पुतिन के लिए वरदान!

24 फ़रवरी 2022 वो तारीख है, जब से रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध चल रहा है लेकिन इसकी खटपट 2014 से ही शुरू हो चुकी थी, जब पुतिन के नेतृत्व में रूस ने क्रीमिया पर कब्जा किया। इसके बाद पूर्वी यूक्रेन के डोनबास क्षेत्र में रूस-समर्थित अलगाववादी संघर्ष शुरू हुआ। रूस का कहना था, कि यूक्रेन NATO (North Atlantic Treaty Organization) का हिस्सा बन सकता है और ये उनकी देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा है, जबकि यूक्रेन इसे अपनी संप्रभुता और स्वतंत्रता की रक्षा बता रहा था। 5 साल हो गए और ये युद्ध आज तक चल रहा है।

अब यहाँ सोचने वाली चीज है कि डोनाल्ड ट्रंप अगर ग्रीनलैंड पर हमला करते हैं और NATO (North Atlantic Treaty Organization) अलग-थलग पड़ जाए, तो ये रूसी राष्ट्रपति पुतिन के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, क्योंकि जिस चीज के लिए वो यूक्रेन पर बम बरसा रहे हैं, उसकी जड़ ही खत्म हो जाएगी।

बता दें, कि डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार धमकी दी है, कि वो NATO (North Atlantic Treaty Organization) को छोड़ सकते हैं। जुलाई 2018 के नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान उनके पूर्व सलाहकार जॉन बोल्टन के मुताबिक वे नाटो छोड़ने के बेहद करीब पहुँच गए थे। इसके बाद 10 फरवरी 2024 को जब वो दोबारा राष्ट्रपति बने तो एक कार्यक्रम में उन्होंने यहाँ तक कह दिया, कि जो देश रक्षा बजट नहीं देंगे, रूस उनके साथ "जो चाहे वो करे," वे उन्हें नहीं बचाएंगे।

अब जब ग्रीनलैंड पर ट्रंप हमला करना चाहते हैं, तो इससे कहीं ना कहीं ये लगता है, कि वो NATO (North Atlantic Treaty Organization) को खत्म कर पुतिन की राह आसन कर रहे हैं और अगर ऐसा होता है, तो ये यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की (Volodymyr Zelenskyy) के लिए अच्छी खबर नहीं है क्योंकि वो तो पूरी तरह से अमेरिका पर ही निर्भर होकर बैठे हैं, कि USA उन्हें हथियार देगा, जिसका इस्तेमाल वो रूस के खिलाफ करेंगे।

क्यों अमेरिका करना चाहता है ग्रीनलैंड पर कब्जा?

गौर करने वाली बात है, कि ये पहला मौका नहीं है जब अमेरिका ग्रीनलैंड पर कब्जा करना चाहता है। इससे पहले 1867 में अलास्का (इसे सोवियत संघ ने अमेरिका को बेचा था) के बाद पहली बार इस पर विचार हुआ। फिर 1946 में राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने डेनमार्क को 10 करोड़ का ऑफर दिया, लेकिन इसे ठुकरा दिया गया। फिर 2019 और अब 2026 में अमेरिका इसपर अपना दावा ठोक रहा है। इसके पीछे की जो वजह है, वो है यहाँ मौजूद कीमती खनिज (Rare Earth Minerals) और आर्कटिक के नज़रिये से समुद्री रास्तों पर नियंत्रण, जो अमेरिका की रणनीति के लिहाज से ज़रूरी है।

हालांकि, गौर करने वाली बात यह है, कि आज अगर डोनाल्ड ट्रंप अपने ही साथी दोस्त यानी यूरोपीय संघ के खिलाफ मोर्चा खोल रहे हैं, तो इसमें कहीं ना कहीं यूरोपीय नेताओं की गलती भी है। जब ट्रंप दुनिया में टैरिफ का डंका बजा रहे थे, अगर उसी वक़्त यहाँ के नेताओं ने मिलकर इसका विरोध किया होता, तो शायद आज ये स्तिथि नहीं होती।

बता दें, कि जब फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने डेनमार्क का समर्थन किया था, तो ट्रंप ने बयान को चुनौती देते हुए कहा कि अगर ग्रीनलैंड सच में वहां के लोगों का है, तो डेनमार्क का कब्जा उसपर क्यों है? ऐसे में यह साफ़ दिखता है कि ट्रंप और यूरोपीय देशों के बीच अनबन चल रही है। खैर, देखना होगा कि ग्रीनलैंड को लेकर क्या रणनीति अपनाते हैं?

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