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मनोरंजन

मैं आज भी पैसों के लिए नहीं लिखता : अन्नू रिज़वी

अपने बारे में बताते हुए अन्नू रिज़वी ने स्वंत्रत रूप से अपने विचार रखे हैं।

अन्नू रिज़वी ने 1994 में ” मेरी सहेली ” सीरियल से टीवी इंडस्ट्री में कदम रखा था। (Facebook)

डॉ मुनीश रायज़ादा द्वारा निर्देशित, ट्रांसपेरेंसी : पारदर्शिता डॉक्यूमेंटरी के गीतों में बा-कमाल बोल लिखने वाले अन्नू रिज़वी ने, टीवी इंडस्ट्री को, लेखक और गीतकार के रूप में अपने जीवन के 25 साल समर्पित किए हैं। हाल फिलहाल, वह ओपी जिंदल यूनिवर्सिटी में स्पोर्ट्स मैनेजर हैं। इसके बावजूद उनकी कलम कुछ ना कुछ रचती ही रहती है। बातचीत के दौरान उन्होंने स्वंत्रत भाव से अपने विचार रखे। उनसे हुई बातचीत के अंश नीचे मौजूद हैं –

अभिषेक : हमारे पाठकों को ज़रा अपने सफर के बारे में बताएं। किस तरह से एक गीतकार ने अपने सपनों की ओर उड़ान भरी ?

अन्नू रिज़वी : असल में, घर का माहौल ही शायराना था। घर पर कवि कोष्टियां हुआ करती थीं, अच्छे लोगों का आना जाना लगा रहता था। बचपन से ही, मैं मुशायरों और कवि सम्मेलनों में जाया करता था। मुझे याद है पांचवीं या छठी में, मैंने मीर तक़ी मीर का दीवान पढ़ा। उस वक़्त मुझे सूरदास भी बहुत पसंद थे, आज भी हैं। उसके बाद, जब दिल्ली आया तो 1991 में नवभारत टाइम्स का हिस्सा हुआ। उस वक़्त भी शौकिया तौर पर कविताएं लिखता रहता था। अपने लिए लिखता था। मैं आज भी पैसों के लिए नहीं लिखता।


बहरहाल, बाद में चलकर मैंने “मेरी सहेली” सीरियल का टाइटल ट्रैक लिखा। यह शो स्टार टीवी पर आया करता था। उसी दौरान “डिफरेंट स्ट्रोक्स” करके एक स्पोर्ट्स शो था। इसके गीत के लिए भी मैंने ही बोल दिए। इस शो को कपिल देव बना रहे थे। विशाल भारद्वाज का संगीत था और सुरेश वाडकर की आवाज़।
(इस बीच अन्नू जी ने, डिफरेंट स्ट्रोक्स में लिखे अपने टाइटल ट्रैक को याद करने की पुरज़ोर कोशिश की। फिर अंत में याद आने पर उन्होंने यह गीत हमें गाकर भी सुनाया।)

अब तक मैं नवभारत टाइम्स को छोड़, टीवी इंडस्ट्री का हिस्सा बन चुका था। फिर 2015 में फ़िल्मी जगत में अपनी किस्मत आज़माने पहुंचा। रोज़ी रोटी चलती रहे इसलिए दो तीन सीरियलों के लिए लिखता भी रहता था। उससे पहले भी एक दफा मुंबई में काम मिलने के आसार बन गए थे, पर उस वक़्त मैंने टाइम्स ग्रुप छोड़ना सही नहीं समझा।

वहां मुंबई में, विशाल शेखर के कहने पर मैंने “वही मेरा गांव” नाम से एक गीत लिखा। उन्हें मुखड़ा बहुत पसंद आया। उन्होंने गीत पूरा करने के लिए मुझे 25000 एडवांस भी दे दिए थे। यह कह कर कि यह पूरे नहीं हैं। लेकिन मैं उन्हें वो गीत कभी दे ना सका। पत्नी की तबियत अचानक ही नाज़ुक हो गयी थी। जिसके लिए मुझे लौटना पड़ा। अब वो इस दुनिया में नहीं है। बहरहाल ….

जो मुझे करना चाहिए था मैंने कर लिया। अब भी लिख लेता हूँ, इससे अच्छी कोई बात नहीं !

“वही मेरा गांव” को अवधि भाषा में सुनने के लिए यह वीडियो देखें –

यह वीडियो अन्नू रिज़वी के यूट्यूब चैनल नीली डायरी पर उपलब्ध है।

अभिषेक :  सर, आप 80-90 के दशक से इस इंडस्ट्री में हैं, तो आपके हिसाब से वहां इतने सालों में क्या कुछ बदला है ?

अन्नू रिज़वी : अभिषेक, हर जगह बदलाव आया है। फिर चाहे वो म्यूजिक हो, टेलीविज़न हो, मीडिया हो। कहीं अच्छा है, कहीं बुरा। और यह बदलाव सिर्फ मैं नहीं, हर कोई महसूस कर रहा है।

आज जहाँ एक तरफ बहुत अच्छी फिल्में बन रही हैं, कई अच्छे कवि आ रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ हाल बुरा भी है। और सबसे बड़ा नुकसान तो म्यूजिक का हो रहा है, साहित्य का हो रहा है। क्यूंकि आज भी आप लोगों से पूछो तो, उन्हें किशोर और रफ़ी के गाने ही याद होंगे। नए गाने कहाँ याद रहते हैं किसी को !

यह भी पढ़ें – कब तक ट्विटर सच को छुपाता रहेगा?

अभिषेक : सर, आपके अनुसार एक गीतकार के लिए आज सबसे बड़ी चुनौती क्या हो गयी है ?

अन्नू रिज़वी : आज लिरिक्स राइटर के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि, लिखवाने वाले को नहीं पता की क्या लिखवाना है। 

अगर आप अच्छे म्यूजिक डायरेक्टर या प्रोडूसर के पास पहुंच गए फिर तो आपकी किस्मत अच्छी है। और अगर ऐसा नहीं हुआ…फिर कोई कुछ भी लिखवा रहा है। अब हाल यह है कि लोग गलत सुन कर, उसी को सही समझ रहे हैं। पहले हमारी फिल्म इंडस्ट्री बहुत पढ़ी लिखी हुआ करती थी। शैलेन्द्र, साहिर जैसे गीतकार थे। उन सब में, शैलेन्द्र ने मुझे बड़ा प्रभावित किया है। आप उनके गाने सुनेंगे तो उनके गीतों की हर लाइन अपने आप में पूरी कहानी है।

अब मामला यह है कि वो मीनिंगफुल गीत कम हो गए हैं। इसलिए मेरी हमेशा कोशिश रही है कि मीनिंगफुल ही लिखूं। और यही कोशिश डॉक्यूमेंटरी के दोनों गीतों के वक़्त भी रही। जो महसूस किया, वो लिखा।

अभिषेक : ट्रांसपेरेंसी : पारदर्शिता डॉक्यूमेंटरी से जुड़ने के पीछे क्या किस्सा रहा ? और ऐसा क्या था जिसने आपको इस प्रोजेक्ट से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया ?

अन्नू रिज़वी : हमारा एक दोस्त है दिनेश गौतम, टीवी एंकर है। उसका एक बार रात में कॉल आया , उसने कहा कि मैंने आपका नंबर किसी को दिया है। कुछ लिखवाना है उन्हें। मैंने कहा ठीक है। और फिर बाद में मुनीश जी का कॉल आया। हमारा मिलना हुआ , बातें हुईं। 

मज़े की बात है कि हम दोनों की केमिस्ट्री काफी अच्छे से मैच कर गयी। 

बाकी जब उन्होंने बताया कि वो कुछ इस तरह के मुद्दे पर डॉक्यूमेंटरी बना रहे हैं तो मुझे सुनते ही बहुत पसंद आया। आंदोलन के दौरान मैं एक न्यूज़ चैनल में प्रोग्रामिंग हेड था। उस वक़्त मैं खुद अरविन्द केजरीवाल के समर्थन में खड़ा था। मेरी टीम हर वक़्त वहां रहती थी। वो लोग शूट कर के लाते थे। फिर हम उससे पंद्रह मिनट का फुटेज काट कर ब्रॉडकास्ट करते थे। 

मुख्यमंत्री बनने के बाद जब उन्होंने अपने पैतरे बदले। बाकियों की तरह मुझे भी बड़ा अफ़सोस हुआ। इस हिसाब से “बोल रे दिल्ली बोल” गाना मैंने बड़ा सोच समझ कर लिखा है। क्यूंकि जब चीज़ें सही नहीं होती तो लिखना बनता है। 

पारदर्शिता – अपनों द्वारा छली गयी दिल्ली की अनसुनी कहानी

अभिषेक : डॉक्यूमेंटरी ने पारदर्शिता का जो मुद्दा उठाया है, उस पर आपके क्या विचार हैं ? क्या इस तरह की साहसिक डॉक्युमेंट्रीज़ और बननी चाहिए ?

अन्नू रिज़वी : बिलकुल बननी चाहिए। समाज में अवेयरनेस लाना बहुत ज़रूरी है। “कितना चंदा जेब में आया” गाने की लाइन भी कुछ यूँ ही है कि, “पारदर्शिता पानी जैसी, ये ना हो तो ऐसी तैसी”। इस लिहाज़ से ट्रांसपेरेंसी हर जगह होनी चाहिए। 

“कितना चंदा जेब में आया” सुनने के लिए यह वीडियो देखें :

अभिषेक : ऐसा सुनने में भी आया था कि ” बोल रे दिल्ली बोल ” गाने की रिलीज़ के वक़्त लोगों पर तरह तरह के सियासी दबाव बनाए जा रहे थे। आप पर किसी तरह का दबाव था ?

अन्नू रिज़वी : नहीं, मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ। कोई ऊपरी दबाव नहीं था। मैंने तो आम पार्टी के ही कार्यकर्ता हैं, जावेद जाफरी , उनसे डॉक्यूमेंटरी और उसके गानों को लेकर चर्चा भी की थी। काफी अच्छे दोस्त हैं हम दोनों।

“बोल रे दिल्ली बोल” सुनने के लिए यह वीडियो देखें :

अभिषेक : डॉक्यूमेंटरी रिलीज़ हुए काफी महीने हो चुके हैं, अब किस तरह का रिस्पांस मिल रहा है आपको ? 

अन्नू रिज़वी : हाँ, मुझे आज भी अक्सर फ़ोन आते हैं। हफ्ते में दो तीन कॉल आ ही जाते हैं। सब यही बोलते हैं कि सर आपने बड़ा अच्छा लिखा है। 

अभिषेक : सर, आप ट्रांसपेरेंसी : पारदर्शिता डॉक्यूमेंटरी के अभिन्न अंग रहे हैं, तो डॉ मुनीश रायज़ादा और प्रवेश मल्लिक के साथ कैसा अनुभव रहा आपका ?

अन्नू रिज़वी : बहुत अच्छा अनुभव रहा, अभिषेक। मुनीश जी बहुत ही अच्छे इंसान हैं। प्रवेश की बाते करें तो वो मेरा पुराना दोस्त है। मुंबई की यादें हैं उसके साथ। प्रवेश काफी क्रिएटिव है। मैंने ही मुनीश जी को उसका नाम रेफर किया था। इस तरह से हम तीनों एक साथ आए। और जो बना वो बेहतरीन बना। 

मैंने मुनीश जी से कहा भी था कि कोई फीचर फिल्म बनाइये , गाने मैं लिखूंगा। कुल मिलाकर यह क्रिएटिव लोगों की टुकड़ी रही। और बड़ा मज़ा आया साथ काम कर के।

अभिषेक : हमारे युवा लेखकों और पाठकों को आप क्या सलाह देना चाहेंगे ?

अन्नू रिज़वी : आप लोग किताबें पढ़िए, साहित्य पढ़िए। पढ़ने से आप अवेयर रहते हैं, काफी कुछ सीखते भी हैं। आपको नए विचार आते हैं। आज हमारे उन युवाओं को पढ़ने की बहुत ज़रूरत है जो फ़ोन पर ही लगे रहते हैं। देखिए लिख तो कोई भी सकता है मगर जब आप अच्छे लोगों को पढ़ेंगे तो अच्छा ही लिखेंगे। 

और इस तरह यह गुफ़तगू अपने अंतिम छोर पर आ गयी। मेरे साथी शांतनू मिश्रा ने जब उनसे पत्रकारिता की मौजूदा हालात पर बात छेड़ी तो उन्होंने पहले के पत्रकारों में सच को उजागर करने की ज़िद का उदाहरण देते हुए वर्तमान में पनप रहे उनके ढीलेपन की ओर दुःख ज़ाहिर किया।


जाते हुए अन्नू रिज़वी ने अपने लिखे नए गीत के कुछ बोल भी हमसे साझा किए –

“रहने दो, मत दीप जलाओ
शीतल है अँधियारा
दीप का सूरज, राख ना कर दे
मन का घर चौबारा
रहने दो, मत दीप जलाओ “

 

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