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Interview

क्या चुनाव चिन्ह को हटा देना चाहिए ?

आज के दिन में जहां हम जब भी चुनावों में वोट देने की बात करते हैं की चुनाव में हम एक व्यक्ति को वोट देते है और एक पार्टी को अपना वोट दान में देकर आ जाते हैं। इससे यह सवाल गहरा हो जाता है की क्या हमें चुनाव चिन्ह को हटा देना चाहिए ?

सामाजिक कार्यकर्ता लोकेश कुमार

"चुनाव"(Elections) आज कल यह शब्द हर भारतीय के कानो में गूँज रहा है। गूंजे भी क्यों ना आज कल हमारे देश में माहौल भी चुनाव का है। वैसे तो यह माहौल लगभग हर साल ही बना रहता है क्योंकि हर साल विभिन्न राज्यों में आये दिन कोई न कोई चुनाव होते ही हैं लेकिन यहां पर सवाल यह उठता है की चुनाव आखिर लड़ता कौन है ? एक आम आदमी या फिर एक बड़ी राष्ट्रिय पार्टी के बैनर वाला एक नेता।

यह बहुत ही गंभीर सवाल है क्योंकि आज के दिन में हम जब भी चुनावों में वोट देने की बात करते हैं तो हम ज़्यादातर या तो कमल कहते हैं या फिर हाथ। हम उस आम आदमी को तो भूल ही जाते हैं जोकि सारी काबिलियत होने के बावजूद चुनाव नहीं लड़ पाता और हम बड़ी पार्टी के बैनर तले चुनाव लड़ने वाले एक अमीरज़ादे प्रत्याशी को अपना नेता चुन लेते हैं।


अब इन सब बातों से यह सवाल बहुत ज़्यादा गहरा हो जाता है की क्या जिन चुनाव चिन्हों को आज बड़ी-बड़ी पार्टियों ने एक तरह से आरक्षित कर लिया है, तो क्या हमारे देश में चुनाव कराने के लिए चुनाव चिन्ह की ज़रूरत है ?

इसी सवाल को लेकर टीम न्यूज़ग्राम ने माननीय Lokesh Kumar जी जोकि पेशे से एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं के साथ एक साक्षात्कार किया।

ज्योति शुक्ला- लोकेश कुमार जी, कृपया अपने बारे में कुछ बताएं।

लोकेश कुमार- मैं पेशे से एक कंप्यूटर साइंस टीचर हूँ जिससे मेरे घर की रोज़ी-रोटी चलती है और इसके साथ-साथ मुझे 10-12 साल का प्रशासनिक अनुभव भी है। मैं दिल्ली के आरके पुरम इलाके में रहता हूँ जहां पर 20 से 22 मलिन बस्तियां हैं। इन्ही मलिन बस्तियों में हम एक अभियान चलाते हैं Mission To Education For Employment जिससे मैं शौकिया तौर पर जुड़ा हूँ। इस अभियान में हम कक्षा 8, 9, 10 के बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करते हैं क्योंकि आज के ज़माने में इस उम्र के बच्चे जल्दी भटक जाते हैं। इसके अलावा हम बच्चों को मुफ्त में पुरानी किताबें बांटते हैं। मैं इसलिए वहां पर "लोकेश मास्टर जी बुकबैंक" के नाम से मशहूर हूँ। इन सभी के साथ-साथ मैं Mission Clean Politics जोकि एक तरीके से हमारा मुख्य अभियान हैं के साथ जुड़ा हूँ। इसमें हमारा मुख्य मकसद यही होता है की हम चुनावी भ्रष्टाचार को ख़त्म करें। चुनावी भ्रष्टाचार वो भ्रष्टाचार है जोकि हमारे सामने हो रहा होता है और इसे हम नज़रअंदाज़ कर देते हैं। तो अगर चुनावी भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा तो लगभग हर प्रकार के भ्रष्टाचार अपने आप खत्म हो जाएंगे।

स्वाति मिश्रा- चुनाव चिन्हो(Election Symbols) को हटाने की ज़रूरत क्यों है ?

लोकेश कुमार- संविधान ने सिर्फ और सिर्फ व्यक्ति को चुनाव लड़ने का अधिकार दिया है। क्योंकि चुनाव वही लड़ सकता है जिसका नाम वोटर लिस्ट में होता है और पार्टियों का नाम तो वोटर लिस्ट में होता नहीं, तो पार्टियों को चुनाव लड़ाने व वोट देने की घातक व्यवस्था क्यों बनी??

जिसे चुनाव लड़ने का अधिकार है उसी को वोट देने की सुविधा चुनाव चिन्ह लगाया गया तो इस चिन्ह पर पार्टियों का कब्जा क्यों हो गया??

अगर बच्चों को ये कह दें कि आप तो स्कूल के नाम पर ही पास हो जाओगे तो ज्यादातर बच्चे ना तो ढंग से पढ़ेंगे और ना ही काबिल बनेंगे।

दुर्भाग्य से यही व्यवस्था आज भारतीय राजनीति में है।

पार्टियों को वोट देकर, पार्टियों के नाम पर नेताओं को जिताने से, अच्छे नेता बनने की जरूरत ही खत्म हो गई।

अब जरूरत सिर्फ एक ही बात की रह गई कि जिस पार्टी के नाम पर जीता जा सकता है उस पार्टी का टिकट कैसे हासिल किया जाए और टिकट हासिल करने की इस लड़ाई में अक्सर कौन लोग मोर्चा बाजी मार लेते हैं ये आप भी अच्छे से समझते हैं। इसी वजह से राजनीति में अच्छे लोगों की संख्या लगातार घट रही है।

संगठन हमेशा अच्छा माना जाता है बशर्ते उद्देश्य भी अच्छा हो।

पार्टियां भी संगठन ही हैं पर पार्टियों में 2 दोष आने से बहुत भारी नुकसान हुआ है।

1. पार्टियों के लिए आरक्षित बिकाऊ चुनाव चिन्ह, जिसकी वजह से टिकट बिक्री का धंधा चलता है और ये टिकट बिक्री का धंधा ही भ्र्ष्टाचार की मूल जड़ है।

2. पार्टियों का व्हिप जारी करना जो जीते हुए जनप्रतिनिधियों को पार्टियों का गुलाम बनाता है।

मुग्धा दूबे- इस समस्या का समाधान क्या है ?

लोकेश कुमार- आज हमारे देश में पार्टीतंत्र और लोकतान्त्रिक पार्टी मॉडल के आधार पर चुनाव लड़े जाते हैं। पार्टियां एक तरीके से संगठन होती हैं जोकि एक बहुत अच्छी बात है परन्तु आज के दिन में इनके अंदर दो दोष आ गए हैं जोकि लोकतंत्र और संविधान का गला काट रहे हैं। पहला दोष ये की आज के दिन में पार्टियों का चुनाव चिन्ह आरक्षित होना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है, दूसरा दोष ये की आज के दिन में पार्टियों का व्हिप जारी करना। इससे जिस आदमी को हमने जनसेवक के तौर पर चुना है वो आज के दिन में पार्टी सेवक बनकर रह गया है।

EVM से चुनाव चिन्ह या तो हटा दिया जाए या चुनाव चिन्ह का पार्टियों के लिए आरक्षण खत्म कर दिया जाए या फिर जनता पार्टियों के बजाय अच्छे उम्मीदवारों को वोट दें।

लोगों को देशहित में राजनीतिक रूप से जागरूक करने में आपकी मदद की जरूरत है।

2 जरूरी जानकारियां लोगों तक पहुंचानी हैं।

1. चुनाव चिन्ह 1951 में उम्मीदवार की पहचान के लिए लगाया गया है और पार्टियों की संपत्ति नही है। 1968 में चुनाव चिन्ह को पार्टियों के लिए आरक्षित करके डेमोक्रेसी का कत्ल किया गया।

2. अब उम्मीदवार को पहचानने के लिए उसकी फोटो EVM पर लगी होती है। चेहरा चुनें, चिन्ह नही।

यह भी पढ़ें- पूरा विश्व आज विश्व हिंदी दिवस मनाता है, जाने क्यों ?

सक्षम नागर- आज के दिन में कहा जाता है की हमारी राजनीति का स्तर गिर गया है तो इसपर आपका क्या कहना है ?

लोकेश कुमार- आज के दिन में राजनीतिक स्तर के साथ-साथ सामाजिक स्तर भी गिरता जा रहा है, या फिर आप यह कह सकते हैं की इसे गिराया जा रहा है। आज के दिन में नेता लोगों के बीच शराब बाँट रहे हैं और अगर उन्हें मना करो तो कहते हैं की जनता लेना बंद कर दे हम बाँटना बंद कर देंगे। तो जब तक हम अपने सामाजिक स्तर में सुधार नहीं करते तब-तक हमारे राजनैतिक स्तर में सुधार नहीं होगा।

Edited By: Saksham Nagar

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