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ओपिनियन

क्या राजनीति सच में मैली है या इसे राजनेताओं ने मैला कर दिया है?

8 दिसंबर को कृषि कानून के खिलाफ आंदोलन पर बैठे किसानों ने भारत बंद का आह्वान किया था। देखा जाए तो इस आह्वान का कोई आंदोलनकारी प्रभाव नहीं पड़ा। परन्तु भारत बंद की आड़ में उस दिन केजरीवाल सरकार आकर्षण का केंद्र बनी रही।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने किसानों से मिलने के लिए सिंघु सीमा का दौरा किया था। (AAP)

शीर्षक पर अंकित सवाल के जवाब में, मैंने खुद को हाल की कुछ घटनाओं के सुरंग में बेचैन पाया। मामला इतना भी मार्मिक नहीं कि सम्पूर्ण राजनीतिक गतिविधियों को सही गलत के तराजू में तौल लिया जाए। मगर बातों का छोटा या बड़ा होना तो मात्र व्यक्तिगत अनुभव है।

कहा जाता है कि जिस देश में विपक्षी दल मजबूत नहीं, वहां पूर्ण लोकतंत्र का होना मुश्किल है। मगर उस स्थिति में क्या किया जाए जब विपक्षी दल और सत्तारूढ़ पार्टी देश में चल रही समस्याओं की आड़ में अपना उल्लू सीधा करने में लगी हो।


अगर आप अपने आस पास की हलचल को लेकर सचेत रहते हैं तो मुमकिन है आपको इस लेख की विषय वस्तु का अंदाज़ा लग चुका होगा। 8 दिसंबर को कृषि कानून के खिलाफ आंदोलन पर बैठे किसानों ने भारत बंद का आह्वान किया था। देखा जाए तो इस आह्वान का कोई आंदोलनकारी प्रभाव नहीं पड़ा। परन्तु भारत बंद की आड़ में उस दिन केजरीवाल सरकार आकर्षण का केंद्र बनी रही।

पार्टी के मुख्य चेहरों ने दावा ठोका कि अरविंद केजरीवाल को हाउस अरेस्ट कर लिया गया है। यानी दिल्ली के मुख्यमंत्री को उन्हीं के घर में नज़रबंद कर दिया गया है। केजरीवाल ने स्वयं इस पर कहा कि वो किसानों के साथ जा कर बौठना चाहते थे पर उन्हें जाने नहीं दिया।

सिर्फ इतना ही नहीं, पार्टी के कार्यकर्ताओं ने अरविंद केजरीवाल के हाउस अरेस्ट के खिलाफ मोर्चे भी निकाले। पर घटना के दूसरे पहलु पर नज़र डालें तो दिल्ली पुलिस ने इस ओर अपना स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री को हाउस अरेस्ट नहीं किया गया, न ही उनकी मूवमेंट को किसी भी प्रकार से बाधित किया गया है।

इन दोनों पक्षों को जानने के बाद मेरे और आप जैसे लोग किसकी बात पर विश्वास करेंगे? भारत की राजधानी दिल्ली की तख़्त पर बैठे मुखिया की या दिल्ली की कानून व्यवस्था की बागडोर संभाले अधिकारियों की? चलिए जवाब पर आने से पहले मैं आपके सामने एक और तथ्य रख देता हूँ।

राजनीतिज्ञ कपिल मिश्रा यूँ तो आम आदमी पार्टी के खिलाफ कई बार बोलते आए हैं। और देखा जाए तो वो इस बार भी नहीं चूके। कपिल मिश्रा ने ट्विटर पर एक वीडियो जारी किया जिसमें अरविंद केजरीवाल अपनी गाड़ी से निकल कर कहीं जाते हुए देखे जा सकते हैं।

इस विषय में कई भाजपा नेताओं ने दिल्ली के मुख्यमंत्री के खिलाफ वीडियो जारी करते हुए उनके हाउस अरेस्ट के दावे को झूठा ठहराया। दूसरी तरफ दिल्ली सरकार भी अपने दावे पर टिकी रही।

पर मेरा सवाल यह है कि इस आरोप प्रत्यारोप की निरंतर श्रृंखला से किसानों की समस्या का हल कैसे निकलेगा? क्योंकि इस तमाशे की जड़ किसान आंदोलन को ही बताया जा रहा है।

अंग्रेज़ी में खबर पढ़ने के लिए – Second Edition of Odisha’s Eco Retreat Festival Begins

‘भाजपा’ और ‘आप’

भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी के बीच यह खींचातानी अचानक ही सुर्ख़ियों में आने लगी है। और जब से किसानों ने दिल्ली और हरियाणा बॉर्डर की ओर रुख किया है, यह दोनों पार्टियां एक दूसरे पर अलग अलग तरीके से वार कर रहीं हैं।

केजरीवाल सरकार का कहना है कि दिल्ली सरकार का किसान आंदोलन को समर्थन देना, भाजपा में हो रही नई बौखलाहट का मुख्य कारण है। पर दिल्ली सरकार यह भूल गयी कि किसी को समर्थन देने के लिए बाज़ार में तमाशा खड़ा करने की ज़रूरत नहीं होती।

हाल ही में दिल्ली सरकार के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने ट्वीट कर के यह खबर दी कि उनके घर पर, उनकी अनुपस्थिति में कुछ लोगों ने हमला किया। जिन्हें वो बीजेपी के गुंडे कह कर संबोधित कर रहे हैं। ट्विटर पर जारी हुई इस वीडियो में इस वारदात को देखा जा सकता है।

इससे पहले भाजपा ने भी आम आदमी पार्टी पर मारपीट का आरोप लगाया था। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष आदेश कुमार गुप्ता ने एक वीडियो जारी कर कहा, “जब मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की असलियत सबके सामने आ गई तो आम आदमी पार्टी नेता मारपीट पर उतर आए।” दरअसल, दिल्ली के नगर निगमों का आरोप है कि दिल्ली सरकार उनके फंड को दबाए बैठी है। इसी वजह से अरविंद केजरीवाल के आवास के बाहर लोग धरने पर बैठे हैं।

इन सब बातों को जानने के बाद भी मेरा सवाल वही है कि क्या राजनीति सच में मैली है या इसे राजनेताओं ने मैला कर दिया है?

यह सवाल और तीव्र हो गया जब मैंने डॉ मुनीश रायज़ादा द्वारा निर्देशित डॉक्यूमेंट्री सीरीज़, ट्रांसपेरेंसी : पारदर्शिता (Transparency: Pardarshita) देखी। उसमें आम आदमी पार्टी की चंदा चोरी से लेकर उनके कई काले राज़ पर से पर्दा उठाया गया है।

यह भी पढ़ें – ‘ट्रांसपेरेंसी: पारदर्शिता’ देखने के बाद !

लगता है कि कहीं ना कहीं हर बड़ी राजनीतिक पार्टी किसी अंधेरनगरी में बैठी अपने हलक में अटके तमस के घूंट पी रही है।

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