Never miss a story

Get subscribed to our newsletter


×
थोड़ा हट के

क्या आज हिंदुत्व की बात करना मतलब घृणा फैलाना है?

तथाकथित धर्मनिरपेक्षों द्वारा भारत जैसे अखंड देश में भी धर्म पर तो मत बँट चुका है। वह इसलिए की देश के बड़े एवं महत्वपूर्ण स्थानों पर इस मानसिकता की पकड़ मजबूत है।

इस आग के पीछे कितने मुखौटे छुपे हैं, यह कोई नहीं जनता। (VOA)

आज भारत में एक तबका काफी सक्रीय भूमिका में है और वह है धर्मनिपेक्ष तबका। जिसका एक धर्म पर जुबान नहीं खुलता है और एक धर्म के विषय में कुछ अच्छा नहीं निकलता है। गलती निकालने में और गाली देने में बहुत बड़ा अंतर होता है। किन्तु इस अंतर को यह तबका नहीं समझ पाया है और कोई कसर नहीं छोड़ता है हिंदुत्व या हिन्दू को कोसने में। इस बात का सबूत है लव-जिहाद पर राज्य सरकारों द्वारा लाया गया कानून जिसका इस तबके ने यह कहते हुए विरोध किया कि एक पुरुष और स्त्री को अपना जीवन साथी चुनने का अधिकार है।

लेकिन जब लव-जिहाद से पीड़ित लड़कियों की बातें सामने आई तब इस तबके ने बड़ी सादगी से चुप्पी साध ली। क्योंकि उन्हें कुछ कहने को नहीं बन पा रहा है।


हाल ही में भारत की बहुचर्चित जोड़ी टीना डाबी और अतहर खान ने अपनी शादी के लिए तलाक की अर्ज़ी दायर की है। किन्तु इनकी शादी पर ही इस तबके ने बड़े अक्षरों में लिखा था कि “असहिष्णुता और सांप्रदायिक घृणा के इस बढ़ते दौर में’ इन दोनों का प्यार और परवान चढ़े और सभी भारतीयों के लिए प्रेरणा बने।”

धर्मनिरपेक्षों का इस तरह प्रभाव पड़ा है कि आज की युवा पीढ़ी में कोई भी हिंदुत्व की बात नहीं करना चाहता है। और अगर कोई करता भी है तो उसे एक विशेष राजनीतिक पार्टी का भक्त बता दिया जाता है या सांप्रदायिक तनाव को बढ़ाने वाला बता कर धुत्कारा दिया जाता है। भगवा रंग इन्हे सांप्रदायिक माहौल को बिगाड़ने वाला रंग लगता है और इसी लिए किसी सरकारी भवन पर भगवा रंग दिख जाए तब इन्हे असहिष्णुता होने लगती है।

यह भी पढ़ें: “नागा साधु बनना आसान नहीं”

उन सभी(तथाकथित धर्मनिरपेक्ष) को इस बात का भय है कि यह (हिन्दू) समाज एकजुट (जो पहले से है) हो गया तो धर्म-निर्पेक्ष तबके की कौन सुनेगा? और इसलिए यह सभी तनिष्क द्वारा दिखाया गए विज्ञापन और नेटफ्लिक्स पर मंदिर में दर्शाए गए अभद्र दृश्य के बचाव में बोलने से भी नहीं घबराते। यह वह है जो एक विश्वविद्यालय में भारत से आज़ादी की मांग करते हैं। यह वह समूह है जिसने दिल्ली में आग को जन्म दिया था।

तथाकथित सेक्युलर का चोगा राजनीति के गलियारे से लेकर बॉलीवुड के चमक-धमक में अधिकांश लोगों ने ओढ़ रखा है और यही वजह है कि इस तबके को इतना बढ़ावा मिलता है। क्योंकि धर्म पर हिंसा फैलाना अब पुराना हो चूका है, अब तो धर्मनिरपेक्ष के नाम पर एक ही धर्म दो गुट को भिड़ाना आसान हो गया है।

Popular

भारत में आधुनिक लिबरल संस्कृति ने, हिन्दुओं को कई गुटों में बाँट दिया है। कोई इस धर्म को पार्टी से जोड़ कर देखता है या किसी को यह धर्म ढोंग से भरा हुआ महसूस होता है। किन्तु सत्य क्या है, उससे यह सभी लिब्रलधारी कोसों दूर हैं। यह सभी उस भेड़चाल का हिस्सा बन चुके हैं जहाँ आसिफ की पिटाई का सिक्का देशभर में उछाला जाता है, किन्तु बांग्लादेश में हो रहे हिन्दुओं के नरसंहार को, उनके पुराने कर्मों का परिणाम बताकर अनदेखा कर दिया जाता है। यह वह लोग है जो इस्लामिक आतंकवादियों पर यह कहते हुए पल्ला झाड़ लेते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन जब आतंकी बुरहान वाणी को सुरक्षा बलों द्वारा ढेर किया जाता है तो यही लोग उसे शहीद और मासूम बताते हैं। ऐसे ही विषयों पर मुखर होकर अपनी बात कहने और लिखने वाली जर्मन लेखिका मारिया वर्थ(Maria Wirth) ने साल 2015 में लिखे अपने ब्लॉग में इस्लाम एवं ईसाई धर्म पर प्रश्न उठाते हुए लिखा था कि "OF COURSE HINDUS WON'T BE THROWN INTO HELL", और इसके पीछे कई रोचक कारण भी बताए थे जिनपर ध्यान केंद्रित करना आज महत्वपूर्ण है।

कुरान, गैर-इस्लामियों के विषय में क्या कहता है,

मारिया वर्थ, लम्बे समय से हिंदुत्व एवं सनातन धर्म से जुड़े तथ्यों को लिखती आई हैं, लेकिन 2015 में लिखे एक आलेख में उन्होंने ईसाई एवं इस्लाम से जुड़े कुछ ऐसे तथ्यों को उजागर किया जिसे जानना हम सबके के लिए आवश्यक है। इसी लेख में मारिया ने हिन्दुओं के साथ बौद्ध एवं अन्य धर्मों के लोगों को संयुक्त राष्ट्र में ईसाई एवं इस्लाम धर्म के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी और इसके पीछे उन्होंने यह कारण बताया कि ईसाई एवं इस्लाम दोनों ही धर्मों के बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि गैर-ईसाई या गैर-मुस्लिम नर्क की आग में जलेंगे। इसका प्रमाण देते गए उन्होंने क़ुरान की वह आयत साझा की जिसमें साफ-साफ लिखा गया है कि " जो काफिर होंगे, उनके लिये आग के कपड़े काटे जाएंगे, और उनके सिरों पर उबलता हुआ तेल डाला जाएगा। जिस से जो कुछ उनके पेट में है, और उनकी खाल दोनों एक साथ पिघल जाएंगे; और उन्हें लोहे की छड़ों से जकड़ा जाएगा।" (कुरान 22:19-22)

Keep Reading Show less

(NewsGram Hindi)

देश में धर्मांतरण का मुद्दा नया नहीं है, लेकिन जिन-जिन जगहों पर हाल के कुछ समय में धर्मांतरण बढ़े हैं वह क्षेत्र नए हैं। आपको बता दें की पंजाब प्रान्त में धर्मांतरण या धर्म-परिवर्तन का काला खेल रफ्तार पकड़ चुका है और अपने राज्य में इस रफ्तार पर लगाम लगाने वाली सरकार भी धर्मांतरणकारियों का साथ देती दिखाई दे रही है। आपको यह जानकर हैरानी होगी, कि पंजाब में धर्मांतरण दुगनी या तिगुनी रफ्तार पर नहीं बल्कि चौगनी रफ्तार पर चल रही है। जिस वजह से पंजाब में हो रहे अंधाधुंध धर्म-परिवर्तन पर चिंता होना स्वाभाविक हो गया है।

गत वर्ष 2020 में कांग्रेस नेता और पंजाब में कई समय से सुर्खियों में रहे नवजोत सिंह सिद्धु ने दिसम्बर महीने में हुए एक ईसाई कार्यक्रम में, यहाँ तक कह दिया था कि 'जो आपकी(ईसाईयों) तरफ आँख उठाकर देखेगा उसकी हम ऑंखें निकाल लेंगे' जो इस बात पर इंगित करता है कि कैसे सत्ता में बैठी राजनीतिक पार्टी पंजाब में हो रहे धर्म परिवर्तन को रोकने के बजाय उसे राजनीतिक शह दे रही है। आपको यह भी बता दें कि 3.5 करोड़ की आबादी वाले पंजाब राज्य में लगभग 33 लाख लोग ईसाई धर्म को मानने वाले रह रहे हैं। पंजाब के कई क्षेत्रों में छोटे-छोटे चर्च का निर्माण हो रहा है और कई जगह ऐसे चर्च मौजूद भी हैं।

Keep Reading Show less

(NewsGram Hindi)

अगले वर्ष भारत एक बार फिर सबसे बड़े राजनीतिक धमाचौकड़ी का साक्षी बनने जा रहा है। जिसकी तैयारी में अभी से राजनीतिक दल अपना खून पसीना एक कर रहे हैं। यह चुनावी बिगुल फूंका गया है राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, जहाँ जातीय समीकरण, विकास और धर्म पर खूब हो-हल्ला मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश चुनाव में जहाँ एक तरफ भाजपा हिन्दुओं को अपने पाले करने में जुटी वहीं विपक्ष ब्राह्मणों को अपनी तरफ करने के प्रयास में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। आने वाला उत्तर प्रदेश चुनाव क्या मोड़ लेगा इसका उत्तर तो समय बताएगा, किन्तु ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

आपको बता दें कि वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सभी पार्टियों ने खूब खून-पसीना बहाया था, किन्तु सफलता का परचम भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटों को जीत कर लहराया था। वहीं अन्य पार्टियाँ 50 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। भाजपा की इस जादुई जीत का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के धुआँधार रैली और मुख्यमंत्री चेहरे को जाहिर न करने को गया। किन्तु उत्तर-प्रदेश 2022 का आगामी चुनाव सत्ता पक्ष के चुनौतियों से भरा हो सकता है। वह इसलिए क्योंकि सभी राजनीतिक पार्टी अब धर्म एवं जाति की राजनीति के अखाड़े में कूद गए हैं। इसमें सबसे आगे हैं यूपी में राजनीतिक बसेरा ढूंढ रहे एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन औवेसी! जो खुलकर रैलियों में और टीवी पर यह कहते हुए सुनाई दे जाते हैं कि वह प्रदेश के मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए उत्तर प्रदेश आए हैं।

Keep reading... Show less