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मनोरंजन

मुझे अपने नाम के लिए लड़ना पड़ा: लता मंगेशकर

नसरीन मुन्नी कबीर के साथ बातचीत में, लता मंगेशकर ने बॉलीवुड के प्लेबैक गायकों और गीतकारों के लिए श्रेय की लड़ाई के बारे में बात की।

(सोशल मीडिया)

‘लता मंगेशकर’ भारतीय एवं अंतराष्ट्रीय मंच पर एक बहतरीन गायिका के रूप में जानी जाती हैं। अब तक उन्होंने लगभग 25000 से ज्यादा गाने अलग-अलग भाषाओं में गाएं हैं। किन्तु उन्होंने एक साक्षात्कार में यह बताया था कि एक समय ऐसा भी आया था जब उन्हें अपने नाम को सबके सामने लाने के लिए भी लड़ना पड़ा था। ‘नसरीन मुन्नी कबीर’ द्वारा लिए गए साक्षात्कार में लता मंगेशकर ने बताया कि उन्होंने गाने और रिकॉर्डिंग के लिए कितनी मेहनत की। लता मंगेशकर बताती है कि “मैंने कड़ी मेहनत की, सुबह से लेकर रात तक गाने रिकॉर्ड किए। एक स्टूडियो से दूसरे में भागी। मुझे इसके(गाने) इलावा कुछ भी करने का कभी मन नहीं किया। मैं पूरा दिन भूखा रहती, क्योंकि मुझे पता भी नहीं था कि रिकॉर्डिंग स्टूडियो में कैंटीन भी होते हैं और मैं कुछ खाने के लिए खरीद सकती हूँ। मैं अक्सर पूरे दिन बिना खाना और पानी के रह जाती थी। अगर किसी ने बता दिया कि स्टूडियो में एक कैंटीन है, तो मैं कुछ खा लेती थी। केवल यही सोचा करती थी कि किसी भी तरह से मैं अपने परिवार देखभाल करूँ।”

जब लता मंगेशकर से उनके वित्तीय स्थिति के विषय में पूछा गया तब उन्होंने बताया कि “मैं यह नहीं कह सकती कि मेरी वित्तीय स्थिति अच्छी थी, लेकिन मेरे लिए तो यह बुरा भी न था, क्योंकि मेरे पास बहुत काम था। हमने नानाचौक में उन्हीं दो कमरों में रहने का फैसला किया, जहां प्रफुल्ला पिक्चर्स ने पहले हमें रखा था। मैंने वहां किराया देना शुरू कर दिया।” वह आगे बतातीं हैं कि “1952 और 1960 के बीच, हम वलकेश्वर में एक तीन बेडरूम के फ्लैट में रहते थे, जिसे हम खरीदने में सफल रहे।” यह पहली बार था जब उनके पास अपना खुद का अलग कमरा था। उन्होंने 1960 में वलकेश्वर में फ्लैट बेचा और पेडर रोड पर प्रभु कुंज में पहली मंजिल का फ्लैट खरीदा और तब से यहीं रहते हैं।”


उन्होंने यह भी बताया कि वह कमाई के पूरे पैसे ‘माई(माँ)’ को लाकर दे देती थीं। उनकी माँ घर चलातीं और जितना बच पाता उतना बचा लेतीं। ज़्यादा काम होने के बावजूद भी, उन्हें समय पर पैसे नहीं मिलते थे। कुछ निर्माताओं ने पैसों को रोक भी दिया था। लता मंगेशकर ने कहा कि “कई बार हमें पैसे दिए भी नहीं जाते थे। हम गायकों ने तब फैसला किया कि हमें उसी समय पैसों का भुगतान किया जाना चाहिए। सच तो यह है कि, पैसा मेरे लिए उतना मायने नहीं रखता था क्योंकि उन दिनों हमने जो गाने गाए थे, उससे मुझे बहुत खुशी मिली थी।”

लता मंगेशकर ने अपने काम के दिनों याद करते हुए बताया कि “1948 में, मैं महल, बरसात, अंदाज़, दुलारी, बड़ी बहन और गर्ल्स स्कूल में काम कर रही थी, एक फ़िल्म जिसका संगीत अनिल विश्वास ने बनाया था उसमे काम कर रही थी- ये फ़िल्में 1949 में रिलीज़ हुई थीं। इसलिए बहुत काम चल रहा था और अच्छा भी चल रहा था।” इतने व्यस्त दिनचर्या होने की वजह से वह सुबह में दो गाने, दोपहर में दो, शाम को दो और रात में दो गाने रिकॉर्ड किया करती थीं। वह सुबह घर से निकलतीं और अगले दिन सुबह 3 बजे वापस आतीं और तब जाकर खाना खाती थीं। कुछ घंटों की नींद के बाद, फिर छह बजे सुबहे उठती, ट्रेन पकड़ती और एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो से दूसरे में जाया करती। वह कहती हैं कि “हम युवा थे, इसलिए हम कड़ी मेहनत कर सकते थे। शायद आज यह संभव नहीं है।”

(Wikimedia Commons)

लता मंगेशकर गीत को याद रखने के सवाल बताती हैं कि “उन दिनों में, अधिकांश संगीत निर्देशकों ने हमें अपने संगीत कक्ष या किराए के हॉल में बुलाया, जहां हमने रिकॉर्डिंग सत्र से दो या तीन बार पहले गाने की रिहर्सल की। इसलिए, किसी भी दिन, हम नौशाद साहब या अनिल बिस्वास के दो गीतों को रिकॉर्ड करने के लिए तैयार थे। लेकिन गानों को हमेशा पहले से रिहर्सल किया गया था।”

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लता मंगेशकर ने बताया कि उस समय प्लेबैक गायकों को कोई महत्व नहीं दिया जाता था। निर्माता सोचते थे ‘उन्हें रिकॉर्ड करने दो, भुगतान करो और जाने दो।’ और कहानी खत्म। एक घटना को याद करते हुए वह बताती हैं कि ‘आएगा आनेवाला’ के रिकॉर्ड में लेबल पर गायिका की सूचि में कामिनी का नाम है। यह ‘महल’ में मधुबाला का स्क्रीन नाम था। जिस वजह से वह परेशान हो गईं कि उनके नाम कहीं भी प्रदर्शित नहीं किए जाते। उन्होंने बताया कि “मुझे ऐसा करने के लिए लड़ना पड़ा और हम निर्माताओं से पूछते रहे कि आप हमें श्रेय क्यों नहीं देते?” उसके बाद पहली बार उनके नाम स्क्रीन पर और डिस्क पर 1949 में दिखाई दिए। और उसी वर्ष दो अन्य फिल्मो में भी लता मंगेशकर के नाम आए जिनमे अंदाज़ और बड़ी बहन शामिल थे। बरहाल, ‘आयेगा आनेंवाला’ ’इतना लोकप्रिय हो गया कि रेडियो स्टेशन को हजारों अनुरोध पत्र आने लगे। लोग यह पूछते हुए लिखा करते थे कि ‘यह गाना कौन गा रहा है? हम उसका नाम जानना चाहते हैं।’ जिस वजह रेडियो पर भी घोषित किया गया कि ‘यह गीत लता मंगेशकर द्वारा गाया गया है।’

लता मंगेशकर उन दिनों के स्टूडियोज़ को याद करते हुए बताया कि “उन दिनों इतने स्टूडियो नहीं थे और जो प्रसिद्ध और मुख्य थे वह सब तारदिओ(मुंबई में एक जगह) में थे। महालक्ष्मी में भी प्रसिद्ध स्टूडियो थे। उन्होंने बताया कि स्टूडियो में रिकॉर्डिंग के लिए छोटे हॉल थे। गोरेगांव में फिल्मिस्तान के पास एक छोटा रिकॉर्डिंग स्टूडियो भी था, हालाँकि कई मौकों पर बड़े स्टूडियो फ्लोर पर भी रिकॉर्ड करने का मौका मिला। यहां तक ​​कि फिल्मिस्तान के अपने प्रोडक्शंस, नागिन और अनारकली के गाने, जो बेहद सफल फिल्में थीं, एक स्टूडियो स्टेज पर रिकॉर्ड किए गए थे।

अंत में लता मंगेशकर बताती हैं कि “जब दिन की शूटिंग समाप्त हो जाती थी और सभी लोग चले जाते थे, तो हम स्टूडियो फ्लोर पर जाकर और रातभर रिकॉर्ड किया करते थे। जगह धूल से भरी हुई होती थी, लाइटें भी गर्म जल रही थीं। पंखों से आवाज़ बहुत आता था इसलिए उसे भी नहीं चलाते थे। मैंने मुश्किल और कठोर स्थितियों में इतने सारे गाने रिकॉर्ड किए हैं।”

स्रोत: The Print

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(NewsGram Hindi)

अगले वर्ष भारत एक बार फिर सबसे बड़े राजनीतिक धमाचौकड़ी का साक्षी बनने जा रहा है। जिसकी तैयारी में अभी से राजनीतिक दल अपना खून पसीना एक कर रहे हैं। यह चुनावी बिगुल फूंका गया है राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, जहाँ जातीय समीकरण, विकास और धर्म पर खूब हो-हल्ला मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश चुनाव में जहाँ एक तरफ भाजपा हिन्दुओं को अपने पाले करने में जुटी वहीं विपक्ष ब्राह्मणों को अपनी तरफ करने के प्रयास में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। आने वाला उत्तर प्रदेश चुनाव क्या मोड़ लेगा इसका उत्तर तो समय बताएगा, किन्तु ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

आपको बता दें कि वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सभी पार्टियों ने खूब खून-पसीना बहाया था, किन्तु सफलता का परचम भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटों को जीत कर लहराया था। वहीं अन्य पार्टियाँ 50 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। भाजपा की इस जादुई जीत का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के धुआँधार रैली और मुख्यमंत्री चेहरे को जाहिर न करने को गया। किन्तु उत्तर-प्रदेश 2022 का आगामी चुनाव सत्ता पक्ष के चुनौतियों से भरा हो सकता है। वह इसलिए क्योंकि सभी राजनीतिक पार्टी अब धर्म एवं जाति की राजनीति के अखाड़े में कूद गए हैं। इसमें सबसे आगे हैं यूपी में राजनीतिक बसेरा ढूंढ रहे एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन औवेसी! जो खुलकर रैलियों में और टीवी पर यह कहते हुए सुनाई दे जाते हैं कि वह प्रदेश के मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए उत्तर प्रदेश आए हैं।

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(NewsGram Hindi, Shantanoo Mishra)

हिन्दू या हिंदुत्व, एक धर्म है या विचार इसका फैसला आज के समय में ग्रंथ, पुराण या धर्माधिकारी नहीं करते, अपितु इसका फैसला करता है कंप्यूटर के सामने बैठा वह तथाकथित बुद्धिजीवि जिसे न तो धर्म का ज्ञान है और न ही सनातन संस्कृति की समझ। इन्हें हम आम भाषा में लिब्रलधारी या लिब्रान्डू भी कहते हैं। यही तबका आज देश में ‘हिन्दू बांटों आंदोलन‘ का मुखिया बन गया है। समय-समय पर इस तबके ने देश में हिन्दुओं को हिंदुत्व के प्रति ही भड़काने का काम किया है। महिलाऐं यदि हिन्दू परंपरा अनुसार वस्त्र पहनती हैं तो वह इस तबके के लिए अभिव्यक्ति की आजादी पर चोट है और साथ ही यह पुराने जमाने का है, किन्तु इसी तबके के लिए हिजाब सशक्तिकरण की मूरत है। जब लव-जिहाद या धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाई गई थी तब भी इस तबके ने इसे प्रेम पर चोट या अभिव्यक्ति की आजादी जैसा बेतुका रोना रोया था। दिवाली पर जानवरों के प्रति झूठा प्रेम दिखाकर पटाखे न जलाने की नसीहत देते हैं और बकरी-ईद के दिन मौन बैठकर, सोशल मीडिया पर मिया दोस्त द्वारा कोरमा खिलाए जाने का इंतजार करते हैं।

सवाल करना एक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, किन्तु स्वयं को लिब्रलधारी बताने के लिए श्री राम और सनातन धर्म की परम्पराओं पर प्रश्न-चिन्ह उठाना कहाँ की समझदारी है? इसी तबके ने भारत में मुगलिया शासन को स्वर्णिम युग बताया था, साथ ही हिन्दुओं को मारने वाले टीपू सुल्तान जैसे क्रूर शासक को करोड़ों का मसीहा भी बताया था। लेकिन आज जब भारत का जागरुक युवा ‘छत्रपति सम्राट शिवाजी महाराज’ का नाम गर्व से लेता है तो यह तबका उसे भी संघी या बजरंग दल का बताने में देर नहीं करता। इस तबके के लिए हिंदुत्व धर्म नहीं एक पार्टी की विचारधारा और यह इसी मानसिकता को विश्व में अन्य लोगों तक पहुंचाकर हिन्दुओं को बदनाम करने का कार्य कर रहे हैं।

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(NewsGram Hindi, साभार: Wikimedia Commons)

आज शहीद स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे(Mangal Pandey) की 194वीं जयंती है। मंगल पांडे(Mangal Pandey) पराधीन भारत की आजादी के वह जननायक थे जिनके एक नारे ने स्वतंत्रता के संग्राम को नई ऊर्जा दिया था। मंगल पांडे(Mangal Pandey) को स्वतंत्रता का जनक भी कहा जाता है जिनके नक्शे-कदम पर चलकर शहीद भगत सिंह, आजाद जैसे वीरों ने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। मंगल पांडे(Mangal Pandey) उन वीरों में से थे जिनके लिए धर्म एवं स्वाभिमान भी बड़ा था और राष्ट्र की स्वतंत्रता भी।

मंगल पांडे!

शहीद मंगल पांडे 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में जन्में थे। मंगल पांडे(Mangal Pandey) क्रांतिकारी के रूप में उभरने से पूर्व कलकत्ता (कोलकाता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री” के सिपाही थे। अंग्रेजों ने भारतीय सिपाहियों को भी बहुत प्रताड़ित किया था। मंगल पांडे के साथ-साथ अन्य सैनिकों ने भी इन प्रताड़नाओं को सहा, किन्तु पानी सर से तब ऊपर चला गया जब भारतीय सैनिकों को सूअर और गाय की चर्भी लगे बारूद वाली बंदूक दी गईं। मंगल ब्राह्मण थे जिस वजह से उन्होंने अपने साथी सिपाहियों के साथ इसकी शिकायत बड़े अधिकारीयों से की। किन्तु इस मामले पर सुनवाई न होता देख उनमें प्रतिशोध की भावना उमड़ पड़ी।

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