जेन ज़ी, सोशल मीडिया और ट्रीट कल्चर

जेन ज़ी के लिए ट्रीट कल्चर सिर्फ खर्च नहीं, पहचान और खुशी का तरीका है
जेन ज़ी
जेन ज़ीSora AI
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आज की नई पीढ़ी यानी जेन ज़ी (Gen Z) के लिए ट्रीट कल्चर (Treat Culture) सिर्फ पैसे खर्च करने की आदत नहीं है, बल्कि खुद को समझने और जताने का तरीका है। माचा (Matcha), लाटे (Latte) पीना, रास्ते से फूल खरीदना या कोई छोटा खिलौना लेना उनके लिए सामान्य चीज़ नहीं है। ये सब छोटे-छोटे इशारे बताते हैं कि वे अपनी मेहनत को मानते हैं और अपने दिन को खास बनाना चाहते हैं। पहले की पीढ़ियाँ पैसों को जमा करने में ज्यादा भरोसा करती थीं, लेकिन आज की युवा पीड़ी मानती है कि छोटी-छोटी खुशियाँ आज ही जी लेनी चाहिए।

सोशल मीडिया और ट्रीट कल्चर

सोशल मीडिया ने ट्रीट कल्चर को और बड़ा बना दिया है। अब कॉफ़ी (Coffee) पीना या केक खाना सिर्फ अपनी बात नहीं रही, बल्कि ये इंस्टाग्राम (Instagram) और टिकटॉक (Tik Tok) पर वीडियो और फोटो बन जाती हैं। लोग हर छोटी ट्रीट को शेयर करते हैं ताकि दूसरों को दिखा सकें कि वे कैसे जी रहे हैं और कितने खुश है। इस वजह से ट्रीट लेना अब सिर्फ खुद की खुशी नहीं, बल्कि समाज में अपनी जगह दिखाने या सोशल वेलिडेशन (Social Validation) प्राप्त करने का ज़रिया बन गया है।

खुशी और ओवरस्पेंडिंग का संघर्ष

ट्रीट कल्चर खुशी तो देता है, लेकिन साथ ही जेब पर भारी भी पड़ता है। कई रिपोर्ट बताती हैं कि आधे से ज्यादा जेन ज़ी (Gen Z) हर हफ्ते खुद को ट्रीट करती है और मानती है कि इससे उनका बजट बिगड़ता है। जो छोटी-सी खरीद उस वक्त सस्ती लगती है, वही महीने के आखिर में बड़ा खर्च बन जाती है। इसी से बचने के लिए उन्होंने ने कुछ नेए तरीके खोजे है और अपनाए हैं, जैसे सिर्फ नकद खर्च करना, या “ट्रीट फंड” (Treat Fund) बनाना जिसमें खासकर ट्रीट्स के लिए ही पैसे रखे जाते हैं। ये दिखाता है कि खुशी और पैसों के बीच संतुलन बनाना अब जरूरी हो गया है।

अगर इसे बिना सीमा के अपनाया गया, तो यही आदत भविष्य में बड़ा आर्थिक बोझ भी बन सकती है।
अगर इसे बिना सीमा के अपनाया गया, तो यही आदत भविष्य में बड़ा आर्थिक बोझ भी बन सकती है।Sora AI

ट्रीट कल्चर और ज़िम्मेदारियों का मेल

भारत (India) के युवाओं ने इस ट्रीट कल्चर को अपने खास अंदाज़ में अपनाया है। यहाँ सिर्फ खुद के लिए खर्च नहीं किया जाता, बल्कि परिवार और परंपरा का भी ख्याल रखा जाता है। बहुत से युवा अपनी पहली तनख्वाह से परिवार को गिफ्ट देते हैं। साथ ही कई लोग ट्रीट्स लेने के साथ-साथ सोने में या सेविंग प्लान में निवेश भी करते हैं। यानी भारतीय जेन ज़ी (Gen Z) आधुनिक ट्रेंड्स को अपनाती है, लेकिन अपनी जड़ों और जिम्मेदारियों को भी नहीं भूलती। पहले की पीडी अपने घर, परिवार और आगे आने वाले समय के लिए बचती थी कई बार अपनी ज़रुतो और ख्वाईशो को मार्के पर आज कल की जनरेशन अपनी आज की खुशियों का भी ख्याल रखना जानती है, अपने परिवार के प्रति अपनी ज़िम्मेदारिया निभाना भी और आगे के सोच समझके बचाना और इन्वेस्ट करना भी।

सिर्फ खर्च नहीं, कहानी भी है ट्रीट कल्चर

ट्रीट कल्चर असल में सिर्फ पैसे का हिसाब नहीं है, बल्कि ये एक कहानी है। हर छोटी खरीदारी किसी इंसान की पहचान, उसकी पसंद और उसके जीने के तरीके को बताती है। किसी के लिए कॉफ़ी पीना बस कैफीन नहीं, बल्कि दिन की थकान से आराम पाने का तरीका है। किसी के लिए लबुबु (Labubu) जैसे खिलौना खरीदना सिर्फ सामान नहीं, बल्कि मज़ाक, यादें और अपना अंदाज़ दिखाने का ज़रिया है। इस तरह ट्रीट कल्चर जेन ज़ी (Gen Z) को अपने जीवन की छोटी कहानियाँ गढ़ने का मौका देता है।

निष्कर्ष

अंत में कहा जा सकता है कि जेन ज़ी (Gen Z) का ट्रीट कल्चर एक साथ राहत भी है और बोझ भी। ये पलभर की खुशी देता है, सोशल मीडिया पर पहचान बनाता है और कई बार समझदारी से खर्च करना भी सिखाता है। लेकिन अगर इसे बिना सीमा के अपनाया गया, तो यही आदत भविष्य में बड़ा आर्थिक बोझ भी बन सकती है।

इसलिए ज़रूरी है कि ट्रीट और सेविंग के बीच बैलेंस बनाया जाए। जब छोटी खुशियाँ भी रहें और बड़ी जिम्मेदारियाँ भी पूरी हों, तभी ट्रीट कल्चर सच में जीवन को आसान बनाएगा, मुश्किल नहीं।

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