Monday, May 10, 2021
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केले, जूट, बांस और अन्य 25 प्राकृतिक फाइबर का उपयोग कर साड़ी बनाई गई।

चेन्नई के अनाकपुथुर की तीसरी पीढ़ी के बुनकर सी. सेकर ने केले, जूट, बांस, अनानास और अन्य सहित 25 प्राकृतिक फाइबर का उपयोग कर साड़ी बनाई थी और लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड्स में अपना नाम दर्ज करवाया था।

चेन्नई (Chennai) के अनाकपुथुर की तीसरी पीढ़ी के बुनकर सी. सेकर ने 2011 में केले (banana), जूट (Jute), बांस (Bamboo), अनानास (Pineapple) और अन्य सहित 25 प्राकृतिक फाइबर का उपयोग कर साड़ी बनाई थी और लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड्स में अपना नाम दर्ज करवाया था। यहां तक कि अपनी हालिया चेन्नई यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनकी सराहना की थी। अनाकपुथुर चेन्नई का एक उपनगर है जो अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से परे अडयार नदी (Adyar river) के तट पर स्थित है। यह स्थान एक समय अपने बुनकरों के लिए जाना जाता था। लेकिन आज, एक प्रतिस्पर्धी इंडस्ट्री और मार्केटिंग की विफलता के कारण, हैंडलूम और बुनकरों की संख्या में गिरावट आई है।

सेकर और उनका परिवार पारंपरिक बुनकर थे, और 1970 में मुख्य रूप से अफ्रीका (Africa) में नाइजीरिया में यहां के उत्पाद निर्यात किए जा रहे थे। मद्रास के चेक कपड़े प्रमुख उत्पाद थे, जिसे अनाकपुथुर बुनकर निर्यात कर रहे थे और अफ्रीका में राजनीतिक माहौल में बदलाव के साथ आयात पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, जिससे अनाकपुथुर बुनकरों को बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ था।

कुछ समय बाद प्राकृतिक उत्पादों और टिकाऊ उत्पादों की मांग में वृद्धि हुई और एक फैशन स्टेटमेंट में बदलाव आ गया। सेकर ने अपने उद्योग को टिकाऊ मोड में बदलने के बारे में सोचा और साड़ियों (Sarees) को केले के फाइबर से बनाने की कोशिश की।

सेकर और उनके अनाकपुथुर बुनकर क्लस्टर में लगभग 100 लोग हैं, जिनमें से अधिकांश महिला (Womens) स्वयं सहायता समूहों के साथ काम कर रही हैं, उन्होंने शुरूआत केले के रेशे से बने धागों से की। केले और पौधे दक्षिण भारत में बहुतायत में हैं और सेकर अपने फाइबर को यार्न में बदलने के लिए केले के पौधों की बड़ी मात्रा का उपयोग करते हैं।

सेकर ने कहा, “वास्तव में, यह एक चुनौती थी और कोई मॉडल नहीं था, लेकिन हमने इस पर काम किया। और हमने केले के तनों से निकाले गए केले के रेशों से धागा बनाया। पिछले कुछ वर्षों में, हमने केले की फाइबर से उत्पादित यार्न से बनी इन सैकड़ों साड़ियों को बेचा है।”

एक साड़ी बनाने में एक ही बुनकर इस पर काम कर रहा है तो उसके लिए 4 से 5 दिन की आवश्यकता होगी। (Pexel)

भले ही केले के तने बड़ी मात्रा में उपलब्ध हों, फिर भी तने से फाइबर (Fiber) को मैन्युअल रूप से निकालने की प्रक्रिया में समय लगता है और केले या अनानास के तने को सूखाना पड़ता है और फिर यार्न बनाने के लिए फाइबर को मैन्युअल रूप से निकाला जाता है।

यहां प्राकृतिक रंगों (Colours) का उपयोग किया जाता है और इन रंगों को बनाने के लिए मुख्य रूप से हल्दी और इंडिगो का उपयोग किया जाता है।

सेकर कहते हैं, “फिर यार्न को विभिन्न जड़ी-बूटियों, मसालों और यहां तक कि गाय के गोबर में उनके जीवाणुरोधी गुणों के लिए इलाज किया जाता है। तुलसी (Tulsi) और पुदीना (Wild mint) जैसी औषधीय जड़ी-बूटियों का भी उपयोग किया जाता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि इन कपड़ों के उपयोगकर्ताओं को स्किन एलर्जी न हो।”

एक साड़ी बनाने में दो बुनकरों को दो दिन लगते हैं और अगर एक ही बुनकर इस पर काम कर रहा है तो उसके लिए 4 से 5 दिन की आवश्यकता होगी। प्रत्येक साड़ी की कीमत 1,800 से 10,000 रुपये के बीच होती है, लेकिन सेकर ने कहा कि उच्च मांग होने के बावजूद, कोविड-19 ने व्यवसाय पर एक चोट किया है, जिससे बेरोजगारी बढ़ रही है।

यह भी पढ़ें :- यूपी सरकार की एक और पहल, कुशीनगर में शुरू हुआ ‘बनाना फेस्टिवल’

सेकर को अपने उत्पाद को दुनिया के सभी हिस्सों में ले जाने और दुनिया के प्रत्येक शहर में अपनी साड़ी का एक रिटेल आउटलेट खोलने की महत्वाकांक्षा है और वह प्रधानमंत्री मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ (Make in India) टैग को वैश्विक बनाने के विजन को आगे बढ़ाना चाहते हैं। (आईएएनएस-SM)
 

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न्यूज़ग्राम डेस्क
संवाददाता, न्यूज़ग्राम हिन्दी

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